ख्वाहिश का दर्द – अंजना ठाकुर

सुनो जी इस बार मेरी बहन गुजरात घूमने जाने का प्रोग्राम बना रही मुझे द्वारकाधीश के दर्शन करने का बड़ा मन है मुझसे भी पूछ रही इस बार हम चलें क्या नीलम ने डरते -डरते अपने पति गिरीश से पूछा ‘हर बार की तरह गिरीश का बही जवाब, अभी पहले घर की जिम्मेदारी तो पूरी कर लो घूमने के लिए जिंदगी पड़ी है ।

अभी पैसा बचाना जरूरी है बच्चों की पढ़ाई में कब क्या जरूरत पड़ जाए कुछ कह नहीं सकते और उठकर चल दिए नीलम का मन हमेशा की तरह दुखी हो गया उसे अपने ऊपर गुस्सा भी आया कि क्यों ही पूछा पर इंसान का मन अपनी खुशी तो चाहता ही है और उम्मीद भी रहती है कि शायद कभी उसकी इच्छा का भी कोई मान होगा लेकिन …

नीलम और गिरीश की शादी को 20 साल हो गए थे नीलम के मायके मै साल में एक बार सब घूमने जाते थे बाद में उसकी बहन और जीजाजी भी शामिल हो गए नीलम को खुशी होती जीजाजी भी बिल्कुल परिवार के सदस्य की तरह ही घुलामिल जाते तो मां और पिताजी भी चिन्ता मुक्त रहते दामाद की आवभगत वाली बात नहीं थी

नीलम और उसका छोटा भाई भी खुश थे उनकी हर मुराद जीजाजी पूरी कर देते ।नीलम भी अब बड़ी हो रही थी उसके मन में भी यही इच्छा थी कि जीजाजी जैसा ही जीवनसाथी मिल जाए तभी उसके लिए गिरीश का रिश्ता आया गिरीश देखने में स्मार्ट और अच्छे पद पर कार्यरत था

नीलम को पसंद आ गया गिरीश को भी नीलम पसंद आ गई जल्दी दोनों की शादी हो गई गिरीश के घर में एक छोटी बहन और माता पिता थे जो गिरीश की जिम्मेदारी थे गिरीश के पास पैसों की दिक्कत नहीं थी पिताजी की भी पेंशन आती थी पर उनकी सोच थी कि जो जिम्मेदारी है बाकी घूमने या अपने शौक के लिए पैसे खर्च करना उन्हें बरबादी लगता था।

शादी के बाद भी कहीं घूमने नहीं गए और अपने माता -पिता को भी कहने के बाद कोई तीर्थ नहीं कराया ना जाने दिया बोले पहले गीता (बहन ) की शादी हो जाए तब देखेंगे बहन की शादी के बाद मां को अटैक आया और वो चल बसी पिताजी मौन हो गए नीलम ने कई बार कहा कि चलो कहीं घूम आते है

इस से पिताजी का भी मन बदलेगा और हमारा भी गिरीश बोले चार दिन घूमने से या मन बदलेगा बल्कि आ कर और चिंता हो जाएगी कि बचे पैसे खर्च हो गए नीलम चुप हो गई और अपनी गृहस्थी में बस गई नीलम के पहला बच्चा हुआ फिर दूसरा और गिरीश के बहाने बढ़ते गए जब भी मायके से घूमने जाने की बात होती गिरीश यही कहते अभी बच्चे छोटे है

इनकी पढ़ाई है इनका भविष्य देखना है नीलम ऐसे चक्र से कभी आजाद नहीं हो पाई और साल गुजरते गए .. नीलम के बड़े बेटे निकेश की शादी तय हो गई शादी के बाद उसने सबके घूमने के टिकट करा लिए जब गिरीश  को पता चला तो उन्होंने बबाल कर दिया अभी कितनी जिम्मेदारी बची है अभी छोटी बहन की शादी करनी है तुझे घूमने की पड़ी है।

निकेश बोला पापा जिम्मेदारी तो चलती रहती है कभी कभी तो सबकी खुशी का सोच लिया करिए

मां कितने साल से मन मार कर रह रही आपको तो कुछ समझ नहीं आता जैसे आपके माता पिता 

यही इच्छा ले कर चले गए वैसे में नहीं चाहता मेरी मां भी चली जाए आपको नहीं चलना तो हम लोग जाएंगे  इतना सुनते ही गिरीश आग बबूला हो गए बोले तुमको लगता है में तुमको मन मार के जीने पर मजबूर कर रहा हूं पैसे का सदुपयोग करना कितना जरूरी है आज तुम इसी वजह से काबिल बन पाए मेरी बहन की शादी अच्छे घर में हो पाई और तुम्हारी बहन की ही तभी हो पाएगी तुम्हारे ऊपर अभी जिम्मेदारी नहीं इसलिए बातें आ रही है कोई कहीं नहीं जाएगा ये मेरा हुक्म है

निकेश भी  जिद्द पर अड़ गया और तर्क करने लगा गुस्से में गिरीश हाथ उठाने वाले थे कि नीलम बीच में आ गई उन्होंने धक्का दिया तो नीलम के सर में चोट आई और वो बेहोश हो गई

अस्पताल जाते में उसकी मृत्यु हो गई ..गिरीश जी जड़ हो गए उन्हें समझ नहीं आ रहा क्या हुआ उन्हें तो लगा था जिंदगी उनके हिसाब से चलेगी 

नीलम की अंतिम यात्रा निकल रही थी गिरीश ने नीलम को देखा जैसे वो कह रही हो इस यात्रा के लिए भी रोक लो अभी तो कितनी जिम्मेदारी बाकी है मैं जा रही हूं ख्वाहिश का दर्द ले कर..।।

दर्द। । 

स्वरचित 

अंजना ठाकुर

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