“दुनिया का सबसे सुंदर परिवार कौन-सा है?”
पाँचवीं कक्षा की शिक्षिका ने बच्चों से यह प्रश्न पूछा तो पूरी कक्षा में उत्साह भर गया।
किसी ने कहा, “जिसके पास सबसे बड़ा घर हो।”
किसी ने कहा, “जिसके पास बहुत पैसा हो।”
एक बच्चे ने कहा, “जिस परिवार के लोग कभी झगड़ा न करते हों।”
कक्षा के एक कोने में बैठी नन्ही रिया चुप थी। शिक्षिका ने मुस्कुराकर पूछा, “रिया, तुम बताओ।”
रिया ने धीरे से उत्तर दिया, “मैडम, हमारा परिवार सबसे सुंदर है।”
सारी कक्षा हँस पड़ी। रिया के पिता एक साधारण कर्मचारी थे। परिवार एक छोटे से घर में रहता था। न कोई बड़ी कार थी, न कोई आलीशान बंगला।
शिक्षिका ने प्यार से पूछा, “ऐसा क्यों कहती हो?”
रिया बोली, “क्योंकि हमारे घर में सब एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं।”
उस दिन शिक्षिका ने बच्चों को गृहकार्य दिया—”अपने परिवार के बारे में एक कहानी लिखकर लाना।”
रिया घर पहुँची तो उसने अपनी दादी के पास बैठकर पूछा, “दादी, क्या सचमुच हमारा परिवार सबसे सुंदर है?”
दादी ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, सुंदरता चेहरे, कपड़ों या घरों में नहीं होती। सुंदरता तो दिलों में होती है।”
रिया सोच में पड़ गई।
कुछ दिनों बाद उसके दादाजी अचानक बीमार पड़ गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।
पिता दिन-रात अस्पताल और नौकरी के बीच दौड़ते रहे। माँ घर और अस्पताल दोनों संभाल रही थीं। दादी रातभर जागकर दादाजी की सेवा करती थीं।
रिया ने पहली बार देखा कि मुश्किल समय में उसका पूरा परिवार एक-दूसरे का सहारा बना हुआ है।
एक रात अस्पताल में दादाजी की दवा के लिए पैसों की आवश्यकता थी। पिता परेशान दिखाई दे रहे थे।
तभी माँ ने चुपचाप अपनी बचत की गुल्लक उनके हाथ में रख दी।
दादी ने अपनी पुरानी जमा-पूँजी निकाल दी।
रिया ने भी अपना छोटा-सा गुल्लक लाकर पिता को दे दिया।
पिता की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा, “यह पैसे नहीं, तुम सबका प्यार है जो मुझे मजबूत बना रहा है।”
कुछ सप्ताह बाद दादाजी स्वस्थ होकर घर लौट आए।
उस दिन घर में किसी त्योहार जैसा माहौल था। दादी ने खीर बनाई। माँ ने घर सजाया। रिया और उसका छोटा भाई आरव खुशी से झूम रहे थे।
रात को खाना खाते समय दादाजी ने कहा, “मैं अस्पताल में एक बात सोचता रहता था।”
सबने उत्सुकता से उनकी ओर देखा।
दादाजी बोले, “मैंने जीवन में बहुत अमीर लोगों को देखा है, लेकिन सबसे अमीर वही होता है जिसके पास प्यार करने वाला परिवार हो।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
दादी की आँखों में चमक थी। माँ मुस्कुरा रही थीं। पिता गर्व से अपने परिवार को देख रहे थे।
कुछ दिनों बाद स्कूल में बच्चों को अपनी कहानी पढ़कर सुनानी थी।
कई बच्चों ने बड़े घरों, महँगी कारों और विदेश यात्राओं की बातें बताईं।
जब रिया की बारी आई, तो उसने अपनी कहानी पढ़ना शुरू किया।
उसने बताया कि कैसे उसके परिवार ने बीमारी, चिंता और कठिनाइयों का सामना मिलकर किया। कैसे उसकी माँ ने अपनी बचत दे दी, दादी ने अपना संचित धन निकाल दिया और कैसे उसके छोटे-से गुल्लक ने भी परिवार का साथ दिया।
कहानी सुनते-सुनते पूरी कक्षा शांत हो गई।
शिक्षिका की आँखें भी नम हो गईं।
उन्होंने रिया से पूछा, “अब बताओ, तुम्हारे अनुसार सबसे सुंदर परिवार कौन-सा है?”
रिया मुस्कुराई और बोली,
“सबसे सुंदर परिवार वह नहीं होता जिसके पास सबसे अधिक धन हो। सबसे सुंदर परिवार वह होता है जहाँ दादा-दादी का स्नेह हो, माता-पिता की ममता हो, भाई-बहनों का साथ हो और जहाँ हर खुशी-दुःख मिलकर बाँटा जाता हो।”
पूरी कक्षा तालियों से गूँज उठी।
शिक्षिका ने कहा, “आज रिया ने हम सबको एक बहुत बड़ा पाठ सिखाया है।”
उस शाम रिया घर लौटी तो दादी आँगन में बैठी थीं।
रिया दौड़कर उनके गले लग गई और बोली, “दादी, अब मुझे समझ आ गया कि हमारा परिवार सबसे सुंदर क्यों है।”
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “क्यों?”
रिया मुस्कुराकर बोली,
“क्योंकि हमारे घर में अपनापन रहता है। यहाँ कोई अकेला नहीं है। यहाँ सब एक-दूसरे के लिए जीते हैं।”
दादी की आँखें भर आईं।
आँगन में ढलता सूरज अपनी सुनहरी किरणें बिखेर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति भी उस छोटे-से परिवार की सुंदरता को निहार रही हो।
उस दिन रिया ने जाना कि परिवार की असली पहचान बड़े घर, महँगी चीज़ें या ऊँचा पद नहीं है।
जहाँ प्रेम हो, सम्मान हो, दादा-दादी का आशीर्वाद हो, माता-पिता की ममता हो और रिश्तों में अपनापन झलकता हो—वही परिवार सबसे सुंदर होता है।
“अपनापन जहाँ मुस्कुराता है, स्नेह जहाँ महकता है, ममता जहाँ बरसती है—वही परिवार सबसे सुंदर कहलाता है।”
सुदर्शन सचदेवा