कुछ ही दिन आए हुए थे कविता को इस शहर में। सबकुछ नया – नया सा था। किसी को जानती नहीं थी, ऑफिस वालों से थोड़ी – थोड़ी जान-पहचान का सिलसिला शुरू हुआ था।
कविता बहुत ही सुलझी, समझदार थी, बहुत जल्दी किसी से घुलती मिलती नहीं थी।उसे इंसानों की बहुत समझ थी जो उसे अच्छा लगता उन्हीं को वो अपनी जिंदगी में शामिल करती और जो उसे नहीं पसंद आते तो बस हाय- हैलो करके आगे बढ़ जाती थी।
घर में जरुरत की सारी चीजें उसने मंगा लिया था और अब धीरे धीरे वो घर में सेट होने लगी थी। आस पड़ोस में अभी कोई दोस्त नहीं बना था,तो काम-धाम में अपना वक्त निकालकर कर बाल्कनी में चाय की प्याली और अपनी पसंदीदा किताबें लेकर घंटों वक्त बिताया करती थी छुट्टियों के दिन में।
बाकी दिन की दिनचर्या तो आफिस के कामकाज में ही निकल जाया करती थी।उसे घर को सलीके से रखने का बहुत शौक था। बालकनी में भी रंग बिरंगे फूलों की सजावट और उनकी ताजगी आसपास तक पहुंचने लगी थी। पड़ोसी अक्सर उसकी बालकनी में निगाह लगाए रहते थे।
रविवार का दिन था। छुट्टी के दिन वो आराम से उठती और अपने दिन की शुरुआत नींबू पानी और शहद से शुरू करती थी। रसोईघर में गई थी की दरवाजे पर घंटी बजी.. वो सोचने लगी कि यहां कौन है जानने वाला जो आया होगा, फिर लगा कोई होगा चल कर देखतीं हूं।
” जी नमस्कार.. मैं केतकी आपकी पड़ोसन।”
नमस्कार!” कहिए कैसे आना हुआ?”
जी… मुझे ‘एक कटोरी चीनी ‘ चाहिए थी।याद ही नहीं रहा कल मंगाने को और सुबह चाय बनाने गई तो चीनी ही नहीं थी।भला बताइए की फीकी चाय से दिन की शुरुआत कौन करता है? सोचा की आपसे मिलना भी हो जाएगा और काम भी बन जाएगा। वैसे आपने अपना नाम नहीं बताया अब तक?”
उफ़!” सुबह-सुबह इतना कौन बोलता है ” मन ही मन बुदबुदाते हुए कविता ने अपना नाम बताया और अंदर चली गई चीनी लेने के लिए।
” आपने घर बहुत अच्छा सजाया है।आप अकेली ही रहती हैं?” केतकी को देखकर लग रहा था कि चीनी तो एक बहाना था वो तो कविता की जन्मकुंडली ही जानना चाहती हो जैसे। कविता थोड़ी झुंझला रही थी पर पहली मुलाकात में वो किसी को बिना अच्छी तरीके जाने कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं देना चाहती थी।
” हां जी मैं अकेली ही रहती हूं। ” कह कर चीनी की कटोरी हांथ में पकड़ाते हुए मुस्कुरा कर बोली।
“आप भी कभी आना मेरे घर, पड़ोस से तीसरा घर है मेरा।कल चीनी वापस कर दूंगी ।धन्यवाद आपका जो आपने मेरी सुबह फीकी होने से बचा लिया। वैसे आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई।”
” मुझे भी ” कविता ने बड़े सलीके से गर्दन झुकाए और अंदर आई। हां… “चीनी वापस करने की जरूरत नहीं है।”
हे! भगवान कैसे – कैसे लोग बनाए हैं आपने इस धरती पर और खिलखिला कर हंस पड़ी। उसने महसूस किया की वो कितने दिनों के बाद आज खुलकर हंसी है। कुछ भी कहो केतकी बड़ी दिलचस्प लगी। किसी – किसी की उपस्थिति आपके घर के माहौल को खुशनुमा तो बनाती है। अकेले घर में तो सन्नाटा ही रहता है। अच्छा लगा उससे मिलकर,भले ही ज्यादा बात कर रही थी। पहली मुलाकात में इतनी सहजता से उसने अपने आप को प्रस्तुत किया।मानना पड़ेगा खासियत तो है उसमें और कविता लग गई अपनी दिनचर्या में।
दूसरे दिन जैसे ही वो ऑफिस से आ कर दरवाजा खोल ही रही थी कि केतकी चीनी की कटोरी ले कर आ गई।” मैं कबसे आपकी राह देख रही थी की आप आएं तो मैं आपको चीनी वापस कर सकूं।”
अरे!” चीनी वापस करने की जरूरत नहीं है,भला इतनी छोटी सी चीज के लिए आप परेशान क्यों थी?” दरवाजा खोल कर अंदर आते हुए कविता ने कहा।”
” बात छोटी सी नहीं है मदद की है।कल आपने मेरी मदद की मुझे बिना जाने ही। इससे आपके अच्छे व्यवहार का पता चलता है। दूसरी बात आज अगर मैं चीनी वापस ना करती तो कल अचानक ही मुझे कोई जरूरत होती तो किस मुंह से आपसे मागती। आखिर पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है।”एक डिब्बा पकड़ाते हुए केतकी बोली।
” दूसरे डिब्बे में क्या है?” केतकी को अंदर बुलाते हुए कविता मुस्कुराई।
“नहीं – नहीं मैं चलतीं हूं,घर में बहुत काम पड़ा है और हां मैंने पकोड़े बनाए थे सोचा आपको भी खिलाती हूं। बताइएगा कैसा लगा, वैसे सब कहते हैं कि मैं पकोड़े अच्छे बनाती हूं।” केतकी अपने घर चली गई।
कविता को भूख भी लगी थी और सचमुच पकौड़े की खुशबू ने उसकी भूख को दुगना कर दिया था। उसने जल्दी से चाय चढ़ाई और हांथ मुंह धुलने चली गई।
वाह!” लाजवाब बने हैं पकोड़े।” खाते ही उसके मुंह से निकल पड़ा। मेरे पास नंबर नहीं है नहीं तो मैं अभी ही धन्यवाद कहती केतकी को।
पेट काफी भर गया था। कविता ने रात में दूध पीने का सोचा और बैठ गई फोन लेकर।
” कैसी हो मां? “
” कविता तेरी आवाज़ में बड़ी खनक सी है, वरना रोज थकी – हारी सी बात करती है”।
मां!” पडोस में केतकी रहती है, रविवार को उससे मुलाकात हुई बड़ी दिलचस्प है वो। उसने ही मुझे पकोड़े बना कर आज दिए।सच कहूं मां बहुत ही स्वादिष्ट थे दिल खुश हो गया।”” अच्छा तो ये बात है। रश्मि जी ने मुस्कुराते हुए कहा।” लेकिन बेटा तुम तो इतनी जल्दी किसी को दोस्त नहीं बनाती और नए शहर में कौन खुशनसीब है जो तुम्हारा दोस्त बन गया।”
” मां जान-पहचान ही हुई है… दोस्ती-यारी नहीं है अभी तक तो।” कविता हंसते हुए बोली।
बेटी” नई जगह में सोच-समझकर ही दोस्त बनाना। क्या पता कैसे – कैसे लोग होते हैं?” मां की माथे की सिलवटों से कविता को अंदाजा लग गया था की वो उसको लेकर परेशान सी लग रहीं हैं पर उन्होंने अपनी परेशानी जाहिर नहीं होने दिया।
सप्ताह गुजर गया था कामकाज की भागदौड़ में। रविवार का दिन अधूरे काम को खत्म करने का और घर में साफ सफाई का दिन होता है।बस क्या था कविता भी काम में लग गई थी। बालकनी में पौधे को पानी डाल रही थी की उसकी निगाह पड़ी केतकी अपने घर से हांथ हिलाकर उसको सुबह का अभिनंदन कर रही थी। मुस्कुराते हुए उसने भी हाय किया और अपने काम में लग गई।शाम को उसे ऑफिस की एक पार्टी में जाना था तो वो तैयारी में लग गई।
रात को जब वो लौटी तो उसकी निगाह केतकी के दरवाजे पर पड़ी, वहां कुछ लोगों की भीड़ थी। कविता के कदम भी उसी तरफ मुड़ गए।मन में बेचैनी सी हो रही थी कि केतकी को कुछ हुआ तो नहीं? दरवाजे के पास पहुंची तो देखा केतकी बेहोश पड़ी थी और पड़ोसी बातचीत कर रहे थे की क्या करें? ” क्या हुआ? किसी ने डॉ. को क्यों नहीं बुलाया? और घर में कोई नहीं है क्या इनके?
अधेड़ उम्र की एक महिला ने कहा कि अकेली ही रहती है ये तो और ना जाने क्या हुआ है केतकी को? मैं बाहर निकली थी किसी काम से तो देखा की बेहोश है। समझ में नहीं आ रहा की क्या करूं?”
कविता ने गाड़ी बुलाई और पड़ोसियों की मदद से केतकी को पास के नर्सिंग होम में एडमिट कराया। डॉ. ने बताया की उसका बीपी लो हो गया है। थोड़ी देर बाद हास्पिटल से घर आ गए दोनों। कविता ने केतकी को बिस्तर पर लिटाया और रसोई घर में चली गई काॅफी बनाने।दो कप कॉफी लेकर आई, दोनों ने बात करते – करते काॅफी खत्म किया।केतकी..” तुमने कुछ खाया नहीं था क्या? क्यों बेहोश हो गई थी? पहले भी कभी ऐसा हुआ है क्या तुम्हें?” कविता ने फिक्र जताते हुए केतकी से पूछा।
धन्यवाद कविता ” तुमने आज मेरी बहुत मदद की।तुम मुझे कितना ही जानती हो,एक दो मुलाक़ात हुई है हमारी। फिर भी तुम मुझे अस्पताल ले गई और बिना सोचे समय पर मेरा इलाज करवाया।आज खाने को कुछ नहीं था क्योंकि कई दिनों से बुखार आ रहा था तो काम नहीं कर पाई।”
अरे!” तुमने बताया क्यों नहीं? और क्या काम करती हो तुम?” कविता परेशान सी पूछ रही थी।
कविता मैं एक अच्छी कंपनी में काम करती थी, मगर कुछ महीनों पहले बिना नोटिस के काम से निकाल दिया और घर भी किस मुंह से जाऊं क्योंकि मम्मी पापा रहे नहीं और भैया भाभी खास लगाव नहीं रखते हैं। किसी पर बोझ बनने के बजाय मैंने यहीं घर से ही टीफिन बनाने का काम शुरू किया है। अच्छा चल रहा है पर तबियत बिगड़ी तो वो भी नहीं कर पा रही थी, इसलिए थोड़ी दिक्कत आ गई।”
केतकी ने टेक लगाकर बैठते हुए कहा।
ओह!” तुमने मुझे पराया ही कर दिया फिर तो। तुमने ही तो कहा था की पडोसी ही पड़ोसी के काम आते हैं तो कहती मुझे” कविता बोली।
” हमारी पहली मुलाकात ही मांगने से शुरू हुई थी। मुझे लगा तुम मेरे बारे में गलत राय ना बना लो। इसीलिए कुछ कह नहीं पाई। यहां आस पड़ोस वाले कोई मतलब नहीं रखते हैं।” केतकी की आवाज में दर्द साफ साफ सुनाई दे रहा था।
” मैं खाना आर्डर करती हूं हम दोनों के लिए और तुम्हें एतराज ना हो तो चलो मेरे घर पर ही सोना क्यों कि अभी तुम कमजोर लग रही हो “।
अरे नहीं…” तुम परेशान नहीं हो मैं ठीक हूं।खाना खा कर आराम करूंगी और अपना फोन नंबर दे दो, कुछ जरूरत पड़ी तो फोन कर लूंगी और हां बहुत बहुत धन्यवाद तुमने आज बहुत मदद की।देखो ना ईश्वर अपने बंदों को भेज ही देता है मदद के लिए और मैं तुम्हारे किसी काम आ सकूं तो निसंकोच कहना मुझसे” केतकी ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर आ कर लेट गई।
कविता का मन आज बेचैन सा हो गया था केतकी को देखकर। उसने सोचा ही नहीं था कितनी मस्तमौला सी केतकी अपनी जिंदगी में कितना संघर्ष कर रही थी। कितनी अकेली थी वो, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी थी और सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जी रही थी। कविता मन में विचार करने लगी कि वो केतकी की मदद कैसे करे।
सोचते – सोचते उसे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। सुबह उठते ही केतकी को फोन करके हाल खबर लिया और चाय – नाश्ता बना कर उसको देते हुए ऑफिस निकल गई। उसके दिमाग में एक ही बात चल रही थी की वो कैसे मदद करे केतकी, जिससे उसका जीवनयापन हो सके। उसने ऑफिस में बात किया तो केतकी को नौकरी पर रखने को तैयार हो गए उसके बाॅस।
घर पर पहुंचते ही उसने केतकी को बताया तो केतकी के खुशी का ठिकाना नहीं रहा।” कविता तुमने इतना सोचा मेरे बारे में। मेरा तो विश्वास ही डगमगाने लगा था कि भगवान जी कितनी परीक्षा लेंगे मेरी।ये सच है कि ईश्वर किसी ना किसी रूप में आपकी मदद करते हीं हैं। धन्यवाद नहीं कहूंगी क्योंकि बहुत छोटा लगेगा लेकिन एक वादा करतीं हूं कि हमेशा तुम्हारा ख्याल रखूंगी और इस दोस्ती को जीवनपर्यंत निभाऊंगी।ये एक दोस्त का दोस्त से वादा है।”
कविता को नए शहर में कोई अपना मिल गया था।अब दोनों साथ – साथ रहने लगी थी तो बचत भी होने लगी थी घर खर्च और किराए में भी। सबसे बड़ी बात एक साथ मिलकर रहने से एक दूसरे के सुख-दुख के साथी भी बन गई थी। एक कटोरी चीनी से शुरूआत मिठास ने जिंदगी में भी मिठास घोल दी थी। कविता के घर वालों से भी बहुत प्यार मिला था केतकी को। कहीं ना कहीं बचपन के अधूरेपन के प्यार में एक छोटी सी परत कविता के मम्मी पापा से पूरी होने लगी थी।अब वो अच्छ सहेलियां बन गई थी।
” कुछ रिश्ते खून के भले हीं ना हों लेकिन ईश्वर के द्वारा चुने हुए होते हैं।कब कौन किसकी जिंदगी में आता है और क्यों आता है ये बात तो खुदा ही जानें।”
प्रतिमा श्रीवास्तव
नोएडा