आदित्य एक अनाथ लड़का था।जो अनाथाश्रम में रहता था।वही के जो मैनेजर थे वो ही वहां रह रहे बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते थे।कभी कोई रहीस आदमी आ जाता तो ढंग से खाना पीना मिल जाता नहीं तो वही रुखा सुखा। एक अपमान भरा जीवन जिया था उसने कभी कोई प्यार करने वाला नहीं कोई प्यार से बोलने वाला नहीं अकेला पन स्कूल में भी बच्चे अपने माता पिता की बातें करते पर वो अकेला बैठा सुनता रहता।उसका भी मन करता उसका परिवार होता पर वो उसके भाग्य में ही नहीं था। इसीलिए वो अपना सारा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाता ताकि जीवन में कुछ बन सके।
१२ तक तो सरकारी स्कूल में पढ़ाई होगई फिर आगे की पढ़ाई उसने स्कॉलर शिप और ट्यूशन पढ़ा कर की। जी वन आगे बढ़ा और उसे अच्छी नौकरी लग गई और वो पीजी में रहने लगा ।उसके साथ उसका रूम पार्टनर था सतीश जिसके परिवार में माता पिता भाई बहन सब थे।उसकी मां का फोन आता तो वो उठाता ही नहीं था कभी कोई भाई बहन करता या पिता करते तो वो व्यस्त होने का बहाना बना देता।
एक बार उनके ऑफिस में पार्टी थी ।बार बार सतीश के घर से फोन आ रहा था पर वो उठा नहीं रहा था।आदित्य ने कहा भी यार फोन उठा कोई जरूरी बात करनी होगी।सतीश बोला पता है मुझे बेटा तूने खाना खाया तेरा दिन कैसा था कब आयेगा रोज के सवाल उकता चुका हूं मैं ।नहीं सतीश ऐसा नहीं कहते माता पिता है फ़िक्र करते हैं इसलिए वरना किसी को क्या ज़रूरत है।अच्छा तू भाषण मत दे ।सतीश ने फोन उठाया हेलो दूसरी तरफ उसके पिताजी थे बोले बेटा मां की तबियत अच्छी नहीं है तुम हों सके तो आ जाओ।पापा अभी तो मै बिजी हूं।बेटा मां से ज्यादा क्या जरूरी है तुरंत पोहचों ।
आदित्य ने पूछा क्या हुआ अरे मां कि तबीयत ठीक नहीं है तो मै क्या करूंगा।बुला रहे हैं? तो यार जा सोचना क्या चल मै भी चलता हूं।वो दोनों रात की कैब कर रुड़की पहुंच गए।सतीश की मां हॉस्पिटल में थी।शुगर लो हो गई थी।बेटे को देख खुश हुई ।उन्हें लग रहा था कि बेटे का दोस्त आया है और वो कुछ नहीं कर पा रही है।3-4 दिन वो अस्पताल में थी।आदित्य ने घर में खाना बनाने में सतीश की बहन मधु की मदद की।पहली बार वो परिवार को इतने पास से देख रहा था।शाम को राहुल सतीश का भाई कॉलेज से आता तो सतीश की जगह आदित्य के साथ बैडमिंटन या चैस खेलता।
सतीश लिए दिए ही रहता।सतीश की मां घर आई अभी उन्हें आराम करना था।वो चाहती थी कि सतीश अभी यही रहे पर सतीश दो टूक बोल आया हम परसो चले जाएंगे।आदित्य ने सतीश से कहा तुम इतने रूखे क्यों हो अपने परिवार के प्रति ।यार बचपन से टोका टाकी सात बजे ही फोन आ जाता बेटा कहा हो अंधेरा हो रहा है।ट्यूशन में लेट होता तो पापा लेने पहुंच जाते।मै 12 में था दोस्तों के साथ बर्थडे पार्टी बाहर करना चाहता था।पर मां ने घर पर ही सबको बुला पार्टी ऑर्गनाइज कर दी।कॉलेज गया वहां भी यही हाल इसलिए मुझे नफरत है।
तुम बेवकूफ हो सतीश मुझे पूछो रिश्तो की कीमत मेरे माता पिता नहीं थे।मै अनाथालय में पला।बिना रिश्तों के कैसे जिया जाता है।मां बाप चिंता करते हैं इसलिए बार बार पूछते है।तुम बीमार हो बॉस तो नहीं पूछेगा पर मां दिन में दस बार फोन कर हाल पूछेगी।तुम इतना कमाते हो तुमने अपने पिता से पूछा हॉस्पिटल के बिल में आपको मदद चाहिए तुम्हे वो रंगीन दुनिया अच्छी लगती हैं।तुम्हारे भाई बहन तुमसे बात करना चाहते हैं पर डर के कारण बोलते नहीं।रिश्तों की कीमत समझो सतीश कल ये नहीं होंगे तो पछताओगे।सतीश बोला मुझे भाषण मत दे तू जा यहां से।
आदित्य अगली सुबह चला गया उसने पीजी और कंपनी दोनों बदल ली।कुछ सालों बाद आदित्य का विवाह रागिनी से हुआ जो स्कूल में अध्यापिका थी।उसके माता पिता ने आदित्य को उसके गुणों और स्वभाव के कारण परखा था।रागिनी का एक भाई रजत बैंगलोर था इसलिए आदित्य ने अपने सास ससुर को अपने पास ही रखा था।वो भी आदित्य और रागिनी के बच्चों का ध्यान रखते और हर फैसले में आदित्य उन्हें आगे रखता।
कुछ सालों बाद आदित्य को सतीश मिला और उसके गले लग रोया यार मैने तेरी बात नहीं मानी।मां चल बसी।भाई बहन मुझसे बात नहीं करते।पिताजी का मैने अपमान किया वो मेरी शक्ल नहीं देखना चाहते।डाइवर्स केस चल रहा हैं पत्नी एलुमनी मांग रही हैं आज मेरा कोई नहीं है।जब सब थे तो मैने उनकी कीमत नहीं समझी आज कोई नहीं है।आदित्य बोला जाओ पिताजी से माफी मांग लो वो माफ़ कर देंगे।और पैसे के गरूर में आदमी को इतना नहीं उड़ना चाहिए कि वो अपने परिवार को भूल जाए ।जाओ कोशिश करो कि अपने संबंध सुधार सको।तभी आदित्य का फोन बजा उसकी बेटी थी पापा कब आओगे।आदित्य बोला बस बेटा आ गया।आदित्य चला गया और सतीश उसे देखता रहा।
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