ममता को जलील मत करो – सावित्री मल्होत्रा

आरोही मुझे अचरज से देखने लगी। मैंने बात जारी रखी, “बेटा, ब्रांड्स बाजार में मिलते हैं, लेकिन माँ का प्यार किसी शोरूम में नहीं बिकता। तुम्हारी माँ ने पिछले तीन सालों से अपने लिए एक नई चप्पल तक नहीं खरीदी है,

ताकि वो तुम्हारे कॉलेज की फीस भर सकें। आज वो तुम्हारे जन्मदिन के लिए जो सूट लाई हैं, उसके लिए उन्होंने अपनी पसंद और अपनी जरूरत दोनों का गला घोंटा है।”

शाम ढल चुकी थी और मेरे बड़े से घर में हमेशा की तरह एक डरावना सन्नाटा पसर गया था। मेरे पति, राजीव, कंस्ट्रक्शन के व्यवसाय में थे और उनका ज्यादातर समय दूसरे शहरों की साइट्स पर ही बीतता था। इकलौता बेटा राहुल, अमेरिका की एक बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी लगने के बाद वहीं का होकर रह गया था।

शुरू में वह हर दिन फोन करता था, फिर यह सिलसिला हफ्तों और अब महीनों में बदल गया था। दौलत और सुख-सुविधाओं की इस घर में कोई कमी नहीं थी,

लेकिन जो चीज़ नहीं थी, वह थी ‘आवाज़’। इंसानों की आवाज़, किसी के हंसने की, किसी के रूठने की आवाज़। इसी दमघोंटू अकेलेपन और एकाकीपन को दूर करने के लिए मैंने एक दिन फैसला किया कि मैं अपने घर का ऊपरी हिस्सा किराए पर दे दूँगी।

किराएदार के रूप में विशाखा और उनकी बेटी आरोही मेरे घर रहने आईं। विशाखा एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका थीं और आरोही कॉलेज के प्रथम वर्ष की छात्रा। उनके आने से मेरे घर की सीढ़ियों पर फिर से कदमों की आहटें गूंजने लगी थीं, जिससे मेरे मन को एक अजीब सा सुकून मिलता था

। विशाखा बहुत ही सुलझी हुई और शांत स्वभाव की महिला थीं। वह अक्सर शाम को स्कूल से लौटकर मेरे पास बैठ जातीं और हम दोनों सुख-दुख साझा करते।

तभी एक शाम, जब मैं दालान में बैठी अपनी चाय की चुस्कियां ले रही थी, ऊपर के कमरे से एक तेज़ और कर्कश आवाज़ ने मेरे ख्यालों की तंद्रा को तोड़ दिया। वह आवाज़ आरोही की थी।

“आपको समझ में क्यों नहीं आता मम्मी! मेरे सारे दोस्त वीकेंड पर बाहर जा रहे हैं। मुझे भी जाना है। आप हर बार पैसों का रोना लेकर बैठ जाती हैं। अगर आप मेरी ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकती थीं, तो मुझे पैदा ही क्यों किया?”

यह सुनकर मेरे हाथ से चाय का कप छलक गया। मैं सन्न रह गई। आरोही का इस तरह अपनी माँ पर चीखना, उन्हें जलील करना मुझे अंदर तक आहत कर गया। आजकल की इस नई पीढ़ी को आखिर हो क्या गया है? न बड़ों के मान-सम्मान का खयाल, न उनकी मेहनत की कद्र। विशाखा, जो सुबह सात बजे से लेकर दोपहर तीन बजे तक स्कूल में खटतीं और फिर घर आकर ट्यूशन पढ़ातीं, ताकि अपनी बेटी के नखरे उठा सकें, उन्हें अपनी ही बेटी से ऐसे शब्द सुनने पड़ रहे थे। मैं सोचने लगी कि क्या संस्कार अब सिर्फ किताबों तक सिमट कर रह गए हैं?

उस रात विशाखा जब नीचे पानी भरने आईं, तो उनकी आँखें सूजी हुई थीं। मैंने उन्हें रोका और पास बिठाकर उनके सिर पर हाथ रखा। मेरे इस छोटे से स्पर्श से ही उनका बाँध टूट गया और वह फफक-फफक कर रो पड़ीं। “सुधा जी, मैं आरोही के लिए दिन-रात एक कर देती हूँ। उसके पिता के जाने के बाद मैंने कभी उसे किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। लेकिन अब वह बड़ी हो गई है, उसकी फरमाइशें मेरी चादर से बड़ी हो गई हैं। जब मैं असमर्थ होती हूँ, तो उसका तिरस्कार मुझसे सहा नहीं जाता।”

एक माँ होने के नाते मैं विशाखा का दर्द बहुत अच्छी तरह समझ रही थी। मैंने मन ही मन तय किया कि इस बच्ची को सही राह दिखाना जरूरी है, डांटकर नहीं, बल्कि समझाकर।

कुछ दिनों बाद आरोही का जन्मदिन था। विशाखा ने अपनी छोटी सी बचत से उसके लिए एक बहुत ही सुंदर सूट खरीदा था। शाम को जब विशाखा ने वह सूट आरोही को दिया, तो आरोही ने उसे देखते ही मुंह बना लिया। “मम्मी, यह क्या गँवारों जैसा सूट ले आईं आप? मैं इसे पहनकर अपने दोस्तों के सामने जोकर नहीं बनूंगी। मुझे वह ब्रांडेड ड्रेस चाहिए थी जो मैंने आपको दिखाई थी।” आरोही ने वह सूट सोफे पर फेंक दिया और पैर पटकती हुई कमरे में चली गई। विशाखा वहीं खड़ी अपने आँसू पीती रहीं।

मुझसे अब रहा नहीं गया। मैं सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गई। आरोही अपने बिस्तर पर लेटी फोन चला रही थी। मुझे देखकर वह थोड़ा सकपकाई। मैं उसके पास जाकर बैठी और बहुत ही शांत स्वर में बोली, “आरोही, तुम्हें पता है मेरे बेटे राहुल का पैकेज करोड़ों में है। वह मुझे दुनिया की सबसे महंगी ड्रेसेस भेज सकता है। लेकिन जानती हो मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश क्या है? कि वह मेरे पास आकर बैठे और मुझे वो एक सूती साड़ी अपने हाथों से लाकर दे, जो उसने अपनी पहली कमाई से खरीदी हो।”

आरोही मुझे अचरज से देखने लगी। मैंने बात जारी रखी, “बेटा, ब्रांड्स बाजार में मिलते हैं, लेकिन माँ का प्यार किसी शोरूम में नहीं बिकता। तुम्हारी माँ ने पिछले तीन सालों से अपने लिए एक नई चप्पल तक नहीं खरीदी है, ताकि वो तुम्हारे कॉलेज की फीस भर सकें। आज वो तुम्हारे जन्मदिन के लिए जो सूट लाई हैं, उसके लिए उन्होंने अपनी पसंद और अपनी जरूरत दोनों का गला घोंटा है।”

मैंने आरोही की आँखों में देखते हुए कहा, “बचपन में जब तुम मिट्टी से सने हाथों से उनकी महंगी साड़ियाँ खराब कर देती थीं, तब उन्होंने कभी तुम्हें नहीं झिड़का। और आज तुम उनके लाए हुए प्यार को कपड़े के ब्रांड से तौल रही हो? याद रखना आरोही, जिस दिन ये माँ नहीं रहेगी, उस दिन तुम्हारे पास सब कुछ होगा, बस ये एहसास दिलाने वाला कोई नहीं होगा कि तुम दुनिया की सबसे खास बच्ची हो।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। आरोही की आँखों से अब आँसू बहने लगे थे। उसे शायद पहली बार उस पर्दे के पीछे का सच नजर आया था, जो विशाखा ने अपने संघर्षों के ऊपर डाल रखा था। आरोही अचानक उठी और बाहर भागते हुए गई। विशाखा रसोई में उदास खड़ी थीं। आरोही ने पीछे से जाकर अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दो मम्मी, मैं बहुत बुरी हूँ। मुझे वो सूट बहुत पसंद है… दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद है।”

विशाखा ने हैरान होते हुए अपनी बेटी को सीने से लगा लिया। उनकी आँखों से बहते खुशी के आँसुओं ने मेरे एकाकी मन को भी भीतर तक तृप्त कर दिया।

उस दिन के बाद से मेरे घर का माहौल ही बदल गया। आरोही अब अपनी माँ का सम्मान करती थी और घर के कामों में उनका हाथ बंटाती थी। और मेरा सूनापन? वह तो जैसे छूमंतर हो गया था। अब शाम को विशाखा और आरोही दोनों मेरे पास बैठतीं। मुझे एक बेटी और एक नातिन एक साथ मिल गई थीं। परिवार खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को समझने और साथ खड़े रहने से बनता है।

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लेखिका : सावित्री मल्होत्रा

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