बेटी यह तुम्हारे संस्कारों की परिक्षा है। – परमा दत्त झा

मां जीजाजी,-इससे आगे ट्विंकल बोल नहीं पाई और रोने लगी।

क्या हुआ क्या किया रोहित ने?-मां ने आशंकित होकर पूछा।

वे मेरे साथ अजीब व्यवहार करते हैं,माना कि मैं उनकी साली हूं मगर इसका क्या मतलब?-वह अपनी बात मां के सामने रखी।

अच्छा,ऐसी बात है मां सब बातें समझ गयी।यह समस्या सुलझाना जरूरी है।

मां यानि गीता देवी एक गृहिणी हैं जो पिछले तीस सालों से इलाहाबाद के अल्लाहपुर में फ्लैट में रहती हैं।इनके पति सूरज बैंक से सेवा निवृत्त हैं जबकि दो बेटियां हैं।बड़ी निशा जिसकी शादी बैंक में काम करनेवाले रोहित से हुई है।पास में ही दोनों रहते हैं वहीं ट्विंकल बी ए की छात्रा है। थोड़े खुले दिमाग की वह जीजा का बहुत आदर करती है मगर कुछ दिनों से उनका व्यवहार अजीबोगरीब है।कभी कमर छूते हैं,कभी  बाजू और कभी-कभार नाजुक अंगों पर हाथ फेर देते हैं।

पहले सोची धोखे से छू गया होगा। मगर नहीं धोखे से नहीं,बार बार धोखा नहीं होता।

यदि कोई नहीं था सड़क पर या बाहरी देख ले तो। दीदी को बताया और उसने बात का बतंगड़ बना दिया तो।यह सोच नहीं पा रही थी कि क्या करें?

इधर इसकी मां जबसे सुनी उनका दिमाग खराब हो गया।एक ओर बेटी दूसरी ओर दमाद।ऐसा दिमाग लगाना है कि सांप भी मरे और रस्सी भी न टूटे।

अरे जीजाजी आप भी -कहती उस दिन इसने सारी घटना मोबाइल में रेकार्ड कर ली।अब तो मां के पास ले जाकर दिखा दिया।

जैसे ही रोहित को पता चला वह हाथ पैर जोड़ने लगा।

मांजी,बात को खत्म करें, मैं समझ गया।

आपके समझने से क्या होगा,मेरी बेटियों को भी समझ में आना चाहिए।

अब वह और घबड़ा गया और तबसे दुबारा ससुराल नहीं आया।इस प्रकार सुझबूझ से बेटी ने समस्या का समाधान निकाल लिया।इस प्रकार मां के द्वारा कहा यह वाक्य “बेटी यह तुम्हारे संस्कारों की परिक्षा है “उसमें वह खड़ी उतरी।उसने चुपचाप समस्या का समाधान भी किया और परिवार की लाज भी रख ली।

#दिनांक-1-6-2026

#शब्द संख्या -500कम से कम 

#रचना स्वरचित और मौलिक है जिसे मात्र यही प्रेषित कर रहा हूं।

#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।

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