ज़िन्दगी की दूसरी पारी – बिमला रावत जड़धारी

दिव्या ने कभी नहीं सोचा था कि जिन्दगी की दूसरी पारी इतनी खुबसूरत होगी। कभी शौक से सीखा हुआ योगा आज

उसका व्यक्तित्व ही बदल देगा।कभी घर से बाहर ना निकलने वाली दिव्या अपने घर के काम में ही व्यस्त रहती। दिव्या के

दो बच्चे, दोनों ही अपनी गृहस्थी में व्यस्त रहते। कभी वह अपने बच्चों के साथ घर आते तो मुझे कहते मम्मी बच्चों को पार्क में

घूमा कर ले आओ। परंतु मैं मना कर देती, मुझे नहीं जाना पार्क तुम लोग जाओ और अपने बच्चों को घूमा के ले आओ। मुझे

ऐसे ही पार्क में घूमना पसंद नहीं है।एक दिन बड़ी लड़की बोली हमें कुछ जरूरी सामान लेने बाजार जाना हैं। आप बच्चों

को घूमा कर ले आओ। मैं मन मार कर नाती, नातिन को पार्क में घूमाने ले गयी। पहले तो मुझे बड़ी घबराहट हुई कि क्या

मैं बच्चों को संभाल भी पाऊॅंगी या नहीं? परंतु मैं जैसे ही पार्क में पहुॅंची कुछ बच्चे अपने आप ही नाती नातिन के साथ खेलने

आ गए। दोनों बच्चें भी उन के साथ खेलने लगे। मैंने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो मेरी के उम्र की कई महिला घूम रही थीं। तो

कई महिलाएं  बैठी गप्पे मार रही थी। कहीं पर कुछ महिलाएं और पुरुष योगा कर रहे थे। मैं अपने नाती नातिन को ले कर

उस तरफ चली गयी। मैं बैठ कर उनको योगा करते देखने लगी। वह अपने आप ही योगा कर रहे थे। उन्हें कोई भी नहीं

सीखा रहा था। जिसको जैसा आता वैसे ही कर रहा था। मुझसे रहा नहीं गया और एक महिला को बोला आप गलत कर

रहीं हैं, इसे ऐसे करते हैं। तभी दूसरी महिला बोली क्या आप को योगा करना आता है?हॉं मैंने योगा का कोर्स किया है।

परन्तु मैंने कभी किसी को सिखाया नहीं है। वो तो मैंने योगा गलत करते हुए देखा तो आप को बता दिया।उन्होंने मुझसे

पूछा हमने आपको आज से पहले कभी पार्क में नहीं देखा। आप पहली बार आई है क्या?हाॅं मैं इस तरफ कम ही आती हूॅं ‌।

मैं अपनी सोसाइटी में ही घूमती हूॅं। आप लोग कहाॅं रहते हो?हम सब सामने फ्लैट में रहते हैं। हम सब पार्क में योगा करने

आते है। आप भी आया करो हमें अच्छा लगेगा।ठीक है मैं कोशिश करूॅंगी।दूसरे दिन मैं पार्क में जाने के लिए तैयार होने

लगी। मम्मी हम लोग पार्क में जा रहे हैं। आप भी कहीं जा रही हो क्या?जब मैंने बताया कि कल मेरे साथ ऐसे ऐसे हुआ

और उन्होंने मुझे भी बुलाया है तो बच्चे बहुत खुश हुए और बोले मम्मी अब आप रोज जाया करो। बाहर कई लोगों से जान

पहचान हो जाती है। और मन भी खुश रहता है। क्यों पापा मैं सही बोल रही हूॅं ना?हाॅं बेटा मैंने तो कितनी बार बोला है

कि मेरे साथ चला करो, कहती मुझे नहीं जाना मैं यही घूम लिया करूॅंगी। परन्तु अब अगर जा रही हो तो रोज जाने की

कोशिश करो। अगर कोई तुम से योगासन के बारे में पूछे तो जरूर बताना। परन्तु अपनी तरफ तुम सलाह मत देने

लगना।जरूरी नहीं है कि हर किसी को हमारी सलाह की जरूरत हो, उसे बुरा भी लग सकता है।अब मैं रोज ही पार्क में

जाने लगी और उन लोगों के साथ योगा करने लगी। एक दिन सभी ने मिलकर मुझे बोला अगर आपको कोई परेशानी ना

हो तो आप हमें योगासन सिखा दिया करो। आपको जो फीस लेनी होगी हम दे दिया करेंगे।नहीं – नहीं फीस की कोई

जरूरत नहीं है। मैं आप सब को सीखा दिया करुॅंगी।सब बहुत खुश हुए।मैं पूरी लगन से सभी को योगा सीखने लगी। सुबह

घर में बड़े बच्चों को योग सिखाती और पार्क में सीनियर सिटीजन को योग सिखाती। अब बहुत सारे लोग मुझसे योगा

सिखाने आने ‌लगे। मुझे योगा सीखाते हुए दो महीने हो गए। एक दिन सभी लोगों ने मिलकर मुझे एक लिफाफा दिया।मैंने

पूछा इसमें क्या है?तो सभी बोले इसमें आपकी मेहनत है।क्या मतलब?मैम जितना लगन से आप हमें यह योग सिखा

रही हैं, ऐसा हमें कोई भी नहीं सिखा पाता। यह हमारी तरफ से आपके लिए है। मना मत करना, हमें बुरा लगेगा।पर मैं ये

नहीं ले सकती।मैम अगर आप यह ले लेती हैं तो हमें सीखने में बहुत आनंद आएगा। नहीं लेंगी तो हमारा सीखना का मन

नहीं करेगा, हम आगे भी नहीं सीख पाएंगे।उनके बहुत आग्रह करने पर मैंने वह लिफाफा ले लिया। परंतु महीने के आखिर

में मैं सबको एक छोटी पार्टी देती हूॅं जिसमें सभी अपनी परफॉर्म देते हैं।यह एक छोटा सीनियर सिटीजन योगा क्लब बन

गया । मैं आज बहुत खुश थी क्योंकि मैंने अपनी एक पहचान बना ली थी।समाप्त धन्यवाद- बिमला रावत जड़धारी

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