तालियो की तेज गड़गड़ाहट और मंच की ओर से कानों में सुनाई पड़ते अपनी बेटी शुभि के तीन वाक्य ‘जिंदगी की दूसरी पारी ‘… शिखा की आंखों में खुशी व चेहरे पर संतुष्टि के भाव जाग गए।
शुभि ने अपना अवार्ड अपनी मां को देते हुए कहा ,मेरी इस कामयाबी का श्रेय मेरी मां को जाता है। शिखा का सर गर्व से ऊँचा हो गया… वह अतीत की गलियारों में खो गई।
अगस्त का महीना था। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। रोज की तरह शिखा अपनी आंखों में आंसू लिए खिड़की से झांक रही थी। शिखा की शादी को दस साल होने को आए थे। लेकिन उसकी गोद अभी तक सुनी थी। उसके पति राजीव का नौकरी में मन नहीं लगता था,
वह एक मनमौजी वह बेपरवाह आदमी था। ना तो उसे शिखा से कोई प्रेम था ना ही उसे इस बात की परवाह थी कि उसकी मां शिखा का कितना तिरस्कार करती हैं और हर समय उसे ताने देती है। धीरे-धीरे शिखा का आत्म सम्मान व पहचान मिटती जा रही थी।
वह खुद की नजरों में अपमानित महसूस करने लगी थी। अभी हाल ही में उसकी देवरानी माया ने एक बेटी को जन्म दिया। माया भी सास के साथ मिलकर शिखा को खूब परेशान करती थी। वह शिखा से दिन भर रसोई में काम करवाती और खुद ए.सी. मे आराम करती।
शिखा अंदर ही अंदर टूट चुकी थी। आज सुबह ही शिखा ने अपनी सास से कहा ‘मां जी मुझे गर्मी लगती है कमरें में कुलर लगवा दीजिए सास ने दो टूक कहा.. ‘तू अपनी देवरानी को देखकर जल रही है उसकी बेटी छोटी है, उसे ए.सी. की जरूरत है, तू क्या करेगी?
‘ यह सुनकर शिखा दंग रह गई। वह रोते हुए अपने कमरे में आई और खिड़की से बाहर छोटे बच्चों को खेलते हुए देखने लगी। तभी उसने देखा … एक छोटी बच्ची खेलती खेलती गिर गई और वह मां-मां कहकर रोने लगी, तभी उसकी मां उसके पास दौड़ कर आई और उसे गोद में उठा प्यार करने लगी।
अपनी मां की गोद में आते ही वह बच्ची चुप हो गई और मुस्कुराने लगी जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह देखकर शिखा की आंखों में अजीब सी चमक आ गई।
आईने में खुद को निहार, बाल संवारे और अपनी साड़ी का पल्लू बना पर्स हाथ में लिए वह निकल पड़ी। बाहर बूंदा-बांदी शुरू होने लगी। शिखा ने ऑटो रिक्शा वाले को आवाज़ लगाई आटो रिक्शा…..मैडम कहां जाना है?
एक गहरी सांस लेते हुए शिखा ने कहा “बालसदन”। …..जिसका विज्ञापन आज सुबह ही शिखा ने अखबार में देखा था। पूरे रास्ते अपने सुसराल वालो का रूखा व्यवहार उसे याद आने लगा। कैसे उसकी सास ने अभी कुछ दिन पहले माया की गोद भराई में उसे
यह कहकर आने से मना कर दिया कि”‘तुम्हारी परछाई माया के लिए शुभ नहीं है इसलिए तुम उसके सामने मत आना “…….उस दिन शिखा पूरे दिन रोती रही। तभी ऑटो वाले भैया की आवाज आई। ‘मैडम आ गया “बाल सदन”। शिखा का चेहरा आंसुओं से भीग चुका था। बारिश के मौसम में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदे थी।
वह ऑटो से उतरी अपने आंसू पूछे और आत्मविश्वास के साथ बाल सदन की ओर मुड़ गई। उसने अंदर जाकर देखा कि …..कमरे में अजीब सी खुशबू थी, हल्की रोशनी थी ….30-35 साल की महिला जिन्होंने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई थी। आंखों पर चश्मा लगाए फाइल में झांक रही थी।
जैसे ही उन्होंने अपना चेहरा ऊपर किया शिखा के मुंह से निकला ….”रचना तू यहां कैसे?’ रचना और शिखा स्कूल के दिनों से ही बहुत अच्छी सहेलियां थी।
रचना ने भी शिखा को पहचान लिया। शिखा ने रचना को अपने यहां आने का कारण बताया। चाय का घूँट भरते भरते रचना ने शिखा को अभी दो दिन पहले मिली एक नवजात के बारे में बताया जिसे कोई अनाथालय के बाहर छोड़ गया था।
………..दूध जैसा उजला रंग गोल-गोल आंखें ,घुंघराले बाल, छोटे-छोटे हाथ पैर जैसे ही शिखा ने बच्ची को देखा उसके मन में उस बच्ची के प्रति प्रेम उमड़ आया। कागजी कार्यवाही पुरी कर वह बच्ची को अपने साथ घर की और ले चली। जैसे ही उसने घर में प्रवेश किया उसकी सास चिल्लाकर बोली ………….”कहां थी इतनी देर से “?और किसका बच्चा उठा लेकर आई?’
शिखा ने कहा ‘यह मेरी बेटी है…।’ यह सुन राजीव ने कहा “मैं इस बच्ची का खर्चा नहीं उठाऊंगा”… शिखा ने बुलंद आवाज में कहा… “मेरी बेटी मेरी जिम्मेदारी है।” यह बोलकर वह कमरे के अंदर आ गई। सारी रात वह बच्ची को गोद में लिए निहारती रही। एक तूफान बाहर चल रहा था और एक तूफान उसके मन में चल रहा था।
इस रात उसने एक निर्णय लिया शुरुआत – “जिंदगी की दूसरी पारी’। सुबह उठकर उसने कमरे में रखे एक पुराने बक्से से सिलाई मशीन निकाल साफ किया जिस पर काफी धूल जमा थी। शिखा शादी से पहले बहुत अच्छी सिलाई किया करती थी सब उसकी प्रशंसा करते थे,
किंतु शादी के बाद वह घर के कामों में ही उलझ गई और उसे समय ही नहीं मिला। जल्दी से उसने अपना फोन निकाला और स्टेट्स पर विज्ञापन लगाया। अगले ही दिन उसकी सोसाइटी में रहने वाली मिसेज गुप्ता आई और उन्होंने उसे एक ड्रेस सिलने को दिया।
शिखा ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह ड्रेस समय पर सिल कर दे देगी। जब वह ड्रेस तैयार हुआ तो मिसेज गुप्ता उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुई। ड्रेस की तारीफ सभी लोगों ने शादी में की । धीरे-धीरे सोसाइटी में शिखा के काम की चर्चा होने लगी और इतने ऑर्डर आने लगे की शिखा के लिए यह सब अकेले करना कठिन हो गया था।
सोसाइटी में ही किराए पर शिखा ने एक दुकान ली।और अपनी सहायता के लिए एक लड़की रख ली। कुछ ही समय में सोसाइटी की छोटी सी दुकान शहर के नामी बुटीक में तब्दील हो गई।
इधर शुभि भी धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी और अब शिखा की तरह ही होशियार, मेहनती हो गई थी। आज उसी के विद्यालय का कार्यक्रम था जिसमें शुभि को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शिखा के चेहरे पर जिंदगी की दूसरी पारी की सफलता के स्पष्ट भाव झलक रहे थे।
लेखिका -शिवांगी जैन