भरोसे की डोर – सुदर्शन सचदेवा

“मम्मी जी, आप आराम कर लीजिए… दुकान मैं संभाल लूंगी।”

रिया ने धीरे से कहा तो सविता जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा।

चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन मन में सवाल भी था। आजकल की बहुएँ कहाँ घर और कारोबार दोनों संभालती हैं? दो दिन जोश दिखाती हैं, फिर अपने फोन और दुनिया में खो जाती हैं।

सविता जी ने अपने पति के साथ मिलकर कपड़ों की छोटी-सी दुकान खड़ी की थी। पति के जाने के बाद उन्होंने बेटे आरव के साथ मिलकर उसे संभाला। जब आरव की शादी रिया से हुई, तो मोहल्ले की औरतों ने कान भरने शुरू कर दिए—

“बहुत पढ़ी-लिखी बहू है…”

“देखना, कुछ महीनों में अलग घर मांग लेगी…”

“आजकल की लड़कियाँ कहाँ सास को पूछती हैं…”

सविता जी ऊपर से मुस्करा देतीं, मगर अंदर कहीं डर बैठ गया था।

रिया कोशिश बहुत करती। सुबह जल्दी उठना, सास की दवाई समय पर देना, दुकान का हिसाब सीखना… लेकिन सविता जी हर काम में कमी निकाल देतीं।

“आटे में पानी ज्यादा है।”

“ग्राहक से ऐसे बात नहीं करते।”

“दुकान कोई खेल नहीं है।”

रिया चुप रह जाती।

कई बार रात को तकिए में मुँह छुपाकर रोती भी थी। मगर उसने कभी आरव से शिकायत नहीं की। उसे लगता था, रिश्ते शिकायतों से नहीं, भरोसे से बनते हैं।

एक दिन दुकान में बहुत भीड़ थी। सविता जी को अचानक चक्कर आ गया। आरव शहर से बाहर गया हुआ था। सविता जी गिरते-गिरते बचीं।

रिया घबरा गई, लेकिन खुद को संभाला। पहले डॉक्टर को बुलाया, फिर दुकान भी संभाली। पूरे दिन ग्राहकों को मुस्कराकर सामान दिखाती रही। रात को सविता जी के सिरहाने बैठकर उनके पैर दबाने लगी।

सविता जी ने पहली बार गौर से बहू को देखा।

थकी हुई आँखें… माथे पर पसीना… मगर चेहरे पर शिकायत नहीं।

धीरे से बोलीं,

“थक गई होगी बेटा…”

रिया मुस्करा दी,

“मां अपने घर के लिए थकती नहीं।”

“मां…”

यह शब्द सविता जी के दिल में कहीं गहरे उतर गया।

अगले दिन मोहल्ले की कमला चाची आईं और बोलीं,

“अरे सविता, तेरी बहू तो दुकान पर बड़ी हँस-हँसकर लड़कों से बात कर रही थी।”

सविता जी कुछ पल चुप रहीं। पहले वाली सविता होतीं तो मन में शक पाल लेतीं। मगर इस बार उन्होंने शांत स्वर में कहा—

“वो मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। और मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है।”

कमला चाची का चेहरा उतर गया।

दरवाजे के पीछे खड़ी रिया की आँखें भर आईं।

शायद पहली बार उसे लगा कि उसने इस घर में जगह बना ली है।

समय बीतता गया। अब दुकान पहले से ज्यादा चलने लगी थी। रिया ने ऑनलाइन ऑर्डर शुरू कर दिए थे। सविता जी को मोबाइल चलाना भी सिखा दिया।

एक दिन सविता जी ने हँसते हुए कहा,

“पहले लगता था ये फोन रिश्ते तोड़ देते हैं… लेकिन तूने तो इसी फोन से दुकान और रिश्ते दोनों जोड़ दिए।”

रिया खिलखिला पड़ी।

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

एक शाम दुकान का कैश कम निकला। पूरे पचास हजार रुपये गायब थे। आरव परेशान हो गया।

“दुकान में तो सिर्फ हम तीनों ही रहते हैं…”

उसकी बात अधूरी रह गई, मगर इशारा साफ था।

रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

सविता जी ने बेटे की तरफ देखा और सख्त आवाज़ में बोलीं—

“रिया पर शक करने से पहले खुद पर करना सीखो।”

“लेकिन मां…”

“बस। जिस लड़की ने इस घर को अपना समझा, उस पर मैं उंगली नहीं उठने दूंगी।”

दो दिन बाद पता चला कि पैसे गलती से पुराने ड्रॉअर में रख दिए गए थे।

आरव शर्मिंदा था।

रिया कुछ नहीं बोली, मगर उसकी आँखों में दर्द साफ दिख रहा था।

उस रात सविता जी उसके पास आईं। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—

“रिश्ते खून से नहीं, विश्वास से चलते हैं। अगर भरोसा टूट जाए ना… तो घर सिर्फ मकान रह जाता है।”

रिया की आँखों से आँसू बह निकले। उसने सास का हाथ पकड़ लिया।

उस दिन के बाद उनके रिश्ते में सास-बहू वाला ताना-बाना कम और मां-बेटी वाला अपनापन ज्यादा हो गया।

मोहल्ले की औरतें आज भी हैरान होती थीं कि आखिर दोनों में इतना प्यार कैसे है।

और सविता जी मुस्कराकर बस एक ही बात कहतीं—

“जहाँ भरोसा होता है, वहाँ रिश्तों को सफाई नहीं देनी पड़ती।”

सुदर्शन सचदेवा

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