मोह से मुक्ति – शुभ्रा बैनर्जी 

शिवांश इस अगले हफ्ते सेवानिवृत्त हो रहे थे। छह महीने पहले ही से पार्टी की लिस्ट बना रहे थे।किसे-किसे बुलाना है?कैटरिंग किसे देना है? मेनू में क्या रहेगा? सुषमा अपने पति की आदत से भलीभांति परिचित थी।बस बहाना चाहिए, खिलाने का।अपने पैसे खर्च होने पर इतना खुश होने वाला इंसान शिवांश ही हो सकता था।बच्चों के जन्मदिन को त्योहार बना देते थे वो।

लिस्ट बनाते हुए तिरछी नजर से सुषमा को देखकर चिढ़ाते हुए पूछा था उन्होंने “तुम भी देख लेती एक बार लिस्ट।बाद में मुंह मत बनाना।देखो सुषमा,कोई भी छूटना नहीं चाहिए।जिसे बुलाने का मन हो,बुला लेना।यह मेरी बरसों की तमन्ना है।राजा की तरह रिटायर होना है मुझे।बहुत कर ली नौकरी।

बस अब बच्चों के पास जाकर ,आराम से रहेंगे हम।तुम्हें भी कोई काम करने की जरूरत नहीं।स्कूल जाना बंद कर दो।बहुत दौड़ी हो तुम भी।छह महीने रवि(बेटे)के पास रहेंगे,और छह महीने रिया (बेटी)के पास।” सुषमा चिढ़कर कहती भी”बस-बस,इतने सारे सपने मत पालो।

भविष्य किसने देखा है?चार पैसे बचाकर रखने की भी सोच लिया करो।पैसे रहेंगे पास में,तो हर कोई पूछेगा।ऐसे पार्टी में पानी की तरह पैसे बहाना कोई शाबाशी वाली बात तो है नहीं।अरे,ज़िंदगी भर हाड़तोड़ मेहनत की है तुमने।कभी अपने लिए कुछ नहीं बचाया।घर तक नहीं बनवा सके हम।बच्चों के पास जिंदगी भर तो नहीं रह पाएंगे ना हम।”

हमेशा की तरह शिवांश बिना उत्तर दिए,चले गए।जिस भी बात के लिए सुषमा टोकती,वही करना उनकी भी जिद थी।जानती थी सुषमा,वो टस से मस नहीं होने वाले।करेंगे अपने मन की ही।झुंझलाते हुए सुषमा भी रसोई में चली गई।शाम को रवि(बेटा)बहू निधि और श्रेयस (पोते )के साथ पहुंच रहा है।रात की ट्रेन से रिया भी आ जाएगी पति विशाल के साथ।

सबकी पसंद का खाना तैयार करने की व्यवस्था में जुट गई सुषमा।शिवांश बाहर से ढेर सारा सामान लेकर पहुंचे।भई बेटा-बहू,बेटी दामाद आ रहे थे।अब बच्चों के साथ मिलकर सुषमा को चिढ़ाने में मजा आएगा उन्हें।

रात को खाने की मेज पर बैठते ही सभी खाने की तारीफ करने लगे।रवि ने कहा अपनी पत्नी(बबीता)से” देख लो, खाओ और सीख लो मां से।आलू परांठा बनाने की विधि।वहीं बचपन वाला स्वाद।कुछ भी अतिरिक्त नहीं।साधारण से मसालों से बना यह आलू का परांठा मां की सिग्नेचर डिश है।

” बबीता ने भी खाकर तारीफ ही की।रिया को अपनी मेथी मटर मलाई शांति से खाना था।शिवांश सुषमा को चिढ़ाने की पहल करते हुए बोले”अरे भई, तुम लोग आते रहा करो जल्दी-जल्दी।तुम्हारी मां के हाथों में फुर्ती आ जाती है, तुम लोगों को देखकर, वरना हमें तो एक ही ढर्रे का खाना खाने की आदत पड़ गई है।” सभी हंस पड़े।जानते थे अपने पापा की आदत।

सुबह उठते ही दोनों बच्चों ने शिवांश के साथ बैठकर रिटायरमेंट की पार्टी के बारे में बात करना शुरू किया।नाश्ते की तैयारी में जाती हुई सुषमा को रोककर रिया ने बता दिया कि नाश्ता बाहर से ऑर्डर कर दिया है।यह रिया ही कर सकती थी।सभी बैठकर भविष्य की योजना बना रहे थे।

रवि ने सीधे-सीधे कह दिया सुषमा से” मां, अब आप भी स्कूल में रिजाइन कर दो।पापा ने बहुत बार कहा है आपसे, पर आप मानती ही नहीं। दो-तीन साल बचा है, छोड़ दो।अपनी नौकरी के चक्कर में बंधी रहोगी, फिर हमारे पास रहने के लिए आनाकानी करोगी।कल ही जाकर मिल लो प्रिंसिपल से।अब बाकी की जिंदगी , आराम से पापा के साथ हमारे पास रहो।”

सुषमा ने शिवांश की तरफ देखा,समझ रही थी कि उन्होंने ही बेटे से सिफारिश करवाई है।जैसे ही रिया की तरफ देखा तो रिया ने सहज और शांत होकर कहा”नहीं दादा, नौकरी छोड़ने का फैसला मां का होना चाहिए,

हमारे दवाब में नहीं।वो खुश रहतीं हैं स्कूल जाकर।बच्चों के साथ मन लगा रहता है उनका।अभी तबीयत जब तक ठीक है, मन है, करें।जब हमारे पास आने का मन होगा, तो छुट्टी ले लेंगीं।इतने सालों से लगातार काम करते रहने की आदत यूं ही तो नहीं छूटेगी ना?” 

शिवांश ने अब बेटी की बातों के बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा” बेटा,मैं भी तो खाली हो जाऊंगा ना?मेरा समय कैसे कटेगा?अकेले घर में पड़े-पड़े मैं भी तो बीमार हो जाऊंगा।बहुत भाग -दौड़ कर ली तेरी मां ने।अब बस,आराम करें यही मेरी इच्छा है।”

पापा की बातों से सहमत ना होते हुए भी रिया चुप हो गई।सुषमा जानती थी,बेटी उसकी पसंद-नापसंद, इच्छाओं का सम्मान करती है।उसके मन की सारी अनकही पीड़ा वह समझती है।उसने अभी कोई निर्णय नहीं लिया।रात को शिवांश ने फिर वही बात दोहराई, तो सुषमा ने भी मन बना लिया नौकरी छोड़ने का।रिजाइन देने के पहले एक महीने का नोटिस देना पड़ता है,

सो सुषमा जाकर दे आई स्कूल में।अंदर से कुछ टूट रहा था, पर स्वार्थी कहलाना भी नहीं चाहती थी वह।शिवांश ने पहले कभी नहीं कहा, नौकरी छोड़ने को।अब शायद खुद के रिटायर होने से अकेले पन से घबरा गए होंगें।

रिटायरमेंट का दिन भी आ गया।कंपनी की तरफ से पूरे परिवार को बुलाया गया था।शिवांश ने अपने रिटायरमेंट के लिए जैसा सोचा था,वैसा ही किया।रात में भव्य पार्टी का आयोजन भी हुआ।तय हुआ था कि शिवांश और सुषमा , रवि के साथ अभी चले जाएंगे।

कुछ महीने बाद रिया के पास जायेंगें।रिया अपने पति के साथ पहले ही चली गई। सुषमा और शिवांश रवि के साथ बैंगलुरू पहुंचे।एक बड़ी सी कॉलोनी में घर लिया था रवि ने।दो बेडरूम थे।एक में सुषमा और शिवांश के रहने की व्यवस्था कर दी थी, रवि ने।बबीता कम बोलने वाली लड़की थी।

सास-ससुर के प्रति ना ही उदासीन थी, ना ही अत्यधिक संवेदनशील।सुषमा ने घर के कामों में बबीता का हांथ बंटाना शुरू कर दिया था।पोते को संभालने के लिए, किचन का काम करने के लिए और घर की साफ-सफाई के लिए अलग-अलग लोग थे।

सुषमा को बहुत अच्छा लगा अपने बेटे-बहू का निर्णय।दोनों नौकरी करते थे, और घर आकर साथ में समय भी बिता पाते थे।लगभग पंद्रह दिन हो गए उन्हें वहां रहते। नौकर-चाकर ही सब काम कर लेते थे, तो सुषमा के पास ज्यादा काम था नहीं।वह अपनी कुर्सी पर बैठ कर लिखती रहती, कहानी और कविताएं।शाम को मंदिर जाती, शिवांश के साथ।अक्सर कहती शिवांश से”पता है, लंबे समय से सोचती थी मैं, कि जरूरत मंदों के लिए कुछ करूंगी।

जिम्मेदारी निभाते-निभाते कब उम्र निकल गई, पता ही नहीं चला।मेरे रिटायरमेंट की ग्रैच्युटी से मैं अपने मन की पुरानी इच्छा पूर्ण करूंगी।तुम टोकना मत मुझे।

” शिवांश ने हांथ पकड़कर कहा था, “तुम्हारी ग्रैच्युटी से क्यूं? मेरी ग्रैच्युटी से ही कर सकोगी तुम अपनी इच्छा पूरी। तुम्हारी जो मर्जी हो करना।तुमने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा।मैं जानता हूं, तुम क्या चाहती हो।बस पैसे मिल जाने दो, तुम दिल खोलकर खर्च करना।मेरे पैसों पर सबसे पहला हक तुम्हारा है।” 

यही दरियादिली शिवांश की खासियत थी।कभी खर्च करने के लिए हांथ नहीं पकड़ा,ना ही वजह पूछी।पूरी ईमानदारी से जब सुषमा अपने ससुराल के रिश्ते निभा रही थी,तब बिना बताए शिवांश‌ ने अपने ससुराल की मदद की।

घर वापस आकर कल शिवांश ने रवि से सुषमा के मन की बात बताई।सुनते ही रवि तिलमिला उठा।गुस्से में बड़बड़ाने लगा” पापा,आप मां की इच्छाओं को पूरा करने के चक्कर में बर्बाद हो जाओगे।मैंने सब प्लानिंग करके रखी है।तीन भी एच के का फ्लैट बुक कर लिया है।शेयर में निवेश करूंगा।

बहुत लाभ होगा।दो चार प्लॉट खरीद लेंगे।आप नहीं जानते क्या मां को? हर समय आपको फिजूलखर्ची का ताना देती रहतीं हैं, पर खुद भी पैसे फालतू में खर्च करने से नहीं चूकती।कोई भी बेवकूफ बनाकर उनसे पैसे ऐंठ सकता है। इसीलिए तो मैं आप लोगों को अपने साथ ले आया।

मां तो वादा कर देंगी दूसरों को मदद का, और सोचेंगी भी नहीं।आप इमोशनल होकर इनका मन मत बढ़ाइये।ज़िंदगी भर की कमाई है, आपकी।अभी तो श्रेयस का भविष्य भी है।आप उनकी बातों में बिल्कुल मत आना।” 

सुषमा अंदर  पानी लाने गई थी।वह शिवांश के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रही थी।शिवां‌श ने पानी पीकर रवि से इतना ही कहा बस” हां-हां, मुझसे ज्यादा तुम्हारी मां को कौन जानेगा? पिछले तीस सालों से साथ हैं हम।उसकी आदतों को मैं अच्छी तरह जानता हूं।चलो, फिलहाल अभी इस विषय को यहीं खत्म करते हैं।बाद में बात करेंगें।

रात का खाना खाते समय अपने स्वभाव के विपरीत शिवांश‌ आज चुप थे।सोते समय भी ज्यादा बात नहीं की उन्होंने सुषमा से।पानी की बोतल भरने खुद ही रसोई में गए थे।सुषमा ने भी अपनी कहानी खत्म की।बिस्तर पर जाकर लेटी, तभी शिवांश पानी की 

बोतल भरकर लाए। सोने की कोशिश करती हुई सुषमा को उठाकर कहा शिवांश ने”सुषमा,अब जी भर गया यहां से।चलो कुछ दिन रिया के पास चलते हैं।फिर वापस अपने शहर जाकर कुछ नए इंतजाम करने हैं।” 

” क्या?जी भर गया आपका यहां?क्या बात कर रहें हैं आप?अभी दिन ही कितने हुएं हैं?वापस जाकर फिर मेरे हांथ का सादा खाना खाना पड़ेगा आपको। बेटे-बहू के साथ रहने का मोह कम कैसे हो गया?मैं तो खुश हूं यहां,आप खुश नहीं हैं क्या?” 

शिवांश के चेहरे पर नाखुशी साफ झलक रही थी।

अगले सप्ताह सुषमा और शिवांश रिया के पास पहुंचे।रिया ऑफिस से छुट्टी लेकर पहुंची थी एयरपोर्ट,उन्हें लेने।बहुत खुश थी वह समय से पहले उसके यहां हमारे जाने से।घर पर सब सुषमा और शिवांश की पसंद का खाना बनवाया था रिया ने,मेड से।पापा का चेहरे को भाव पढ़ चुकी थी वह।रात जब सुषमा आदतन लिखने बैठी,

तो रिया शिवांश के साथ बाहर बगीचे में बतियाने गई।जानती थी सुषमा,बेटी और पापा में खूब पटती थी।काफी देर तक जब दोनों नहीं लौटे तो वह खुद बरामदे की तरफ चली आई।उसने देखा ,रिया के सीने से लगकर शिवांश रो रहे थे।रिया,एक मां की तरह पापा की पीठ सहला रही थी,और कह रही थी” बिल्कुल ठीक सोचा पापा अपने,मैं तो शुरू से यही कह रही थी।

आप दोनों के लिए यह ज़िंदगी की दूसरी पारी है।आप दोनों ही अपनी टीम के बैटर हैं।आप लोगों को किसी और के सहारे की जरूरत ही नहीं।आप हैं तो, मां मजबूत है,।मां के होने से आप सशक्त ।क्यों अपने या मां के रिटायरमेंट वाले पैसों का हिसाब देंगे आप ?

नहीं देंगे, किसी को भी।औलाद के लिए जितना करना था, कर चुके आप।अब हम दोनों भाई-बहन अपने परिवार की जिम्मेदारी खुद निभाएंगे।सारी जिंदगी, मां ने कभी कुछ नहीं मांगा किसी से।अब उन्हें अपने मन की करने देना पापा।” 

“हां-हां बेटा,अपने मन की ही करेगी वह।क्या सोचा था रवि ने कि मां के रूप में एक आया मिल जाएगी उसे,और फाइनैंस करने के लिए मैं।हमारे पैसे कैसे और कहां खर्च करना है,इसका फैसला लेने का हक तो नहीं दिया मैंने उसे।रही बात तेरी भाभी की,तो उसकी कोई ग़लती नहीं।

एक बहू को जितना करना चाहिए उतना वह करती है।हम दोनों का अच्छे से ख्याल रखा उसने।उस रात जब मैं पानी लेने रसोई की तरफ गया,तब मैंने रवि की बात सुनी।तभी मैंने निर्णय ले लिया कि अब हम वहां और नहीं रहेंगे।अरे अपनी पत्नी से वह खुद ही कह रहा था

नैनी को हटा देने के लिए।खाना बनाने वाली को निकाल देने के लिए। मां तो तंदरुस्त है, अच्छे से ये सब काम कर लेगी।उनका मन भी लगा रहेगा।वाह रे! औलाद वाह।अपनी मां के लिए ऐसी भावना।कल को जब मैं नहीं रहूंगा , तो वह नौकरानी बना देगा मां को।

नहीं -नहीं मैं तेरी मां का अपमान कभी सहन नहीं कर सकता।तू भी तो बेटी है, कभी भी तूने नहीं पूछा हमारे पैसों के बारे में।वह कैसे ऐसा हो गया ? मैंने तो खुद यह सोच रखा था कि फंड के पैसों में से तुम दोनों के लिए कुछ रुपए एफ डी कर दूंगा।

उसने तो इस बात का भी इंतजार नहीं किया।अपनी ही मां की कमियां गिनाने लगा मुझे।तू मुझसे वादा कर, कि कभी मां को ये सारी चीजें पता नहीं चलने देगी।बहुत सदमा लगेगा उसे।मेरा मोह भंग हो गया लिया, अब हम वहीं वापस जाकर रहेंगे एक साथ बस हम दोनों।”

रवि के बारे में बताते हुए बड़ी सतर्कता से इधर -उधर देखने वाले शिवांश‌ को जरा भी आभास नहीं हुआ था कि सुषमा सब सुन रही है वहां।अपनी आंखें पोंछते हुए शिवांश जल्दी से घर के अंदर घुस गए।पलटती हुई सुषमा को रिया ने देख लिया था।इससे पहले कि वह कोई सफाई देती,सुषमा ने भी हंसकर कहा” तेरे पापा का मोहभंग आज हुआ है,मैंने तो बहुत पहले ही मोह से मुक्ति पा ली है।मेरे लिए सारे बच्चें एक हैं।

जब तक हम अपने मोह से नहीं निकलते, तब तक भटकन बनी रहती है।तेरे पापा तो अभी बना रहें हैं भविष्य की योजना,मैंने तो अपनी योजना बहुत पहले बना कर रखी है।बस अब उसे साकार करने का समय आ गया है।अपनी संतान के मोह से निकलकर ही अपनी जिंदगी को दूसरा मौका दे सकतें हैं हर मां-बाप।

ना तो बच्चों से कोई अपेक्षा रखना सही , और ना उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करना चाहिए।तूने हमेशा अस्पष्ट रूप से मुझे यही समझाने की कोशिश की थी ना, देख अब मैं समझ सकती हूं।मैं बुद्धू नहीं रही अब।तुझसे ही मुझे सारी सीख मिली।

जब तू आई थी पापा की रिटायरमेंट पार्टी में, कितने सरल तरीके से मुझे मेरे फैसले लेने की स्वतंत्रता समझाई थी तूने।मैंने वह भी देखा और सुना था जब तूने विशाल के पूछने पर कहा था कि, मेरे पापा का पैसा कहां और कैसे खर्च करना है,

यह सिर्फ मेरे पापा और मां निर्णय लेंगें।हमारे लिए जितना करना था कर चुके।रिटायर हो रहें हैं वो, तो हम उनके पेरैंट्स बनने की कोशिश कभी ना करें।”

” अच्छा ,तो तुम छिपकर अपनी बेटी और दामाद की बातें सुनती हो? “रिया ने सुषमा को गले लगाकर कहा।

अब सुषमा, शिवांश के साथ अपने शहर वापस लौटी।एक छोटा सा घर बनवाया।ऊपरी हिस्सा  किराऐ में देना था सुषमा को।शिवांश जानते थे, बातें करने के लिए भी तो चाहिए ना।घर के सामने बारामदे में एक शेड डालकर छोटा सा कैंटीन बनाया शिवांश ने सुषमा के लिए।

यहां पचास रुपए में भरपेट खाना मिलता है, जरूरत मंदों को।एक लड़का और एक लड़की को रखा है सहायक के रूप में।खाना सिर्फ दिन के लिए है।शाम को रोज सुषमा और शिवांश बाहर घूमने चले जातें हैं।कभी पैदल तो कभी कार से।मंदिर के आसपास झुग्गी में रहने वालों, अनाथालयों और वृद्धाश्रम में अपनी ग्रैच्युटी का पैसा दान कर दिया है सुषमा ने।

स्कूल में रिजाइन स्वीकृत तो हो गया पर, सप्ताह में तीन दिन स्पेशल मॉरल क्लास लेने के लिए ऑनरेरियम पोस्ट पर रखा है स्कूल प्रबंधन ने।ज़िंदगी की यह दूसरी पारी सुषमा को ज्यादा रास आ रही है।अपनी औलाद  की जगह अब दूसरों के बारे में भी कुछ सोच पा रही है, कुछ कर पा रही है।

शिवांश अपना समय कैंटीन के आय और व्यय का हिसाब लगाने में निकाल रहे हैं।हां उन्होंने अपनी पसंद का बड़ा सा झूला लगवाया है बरामदे में, जहां सुबह की चाय दोनों, लगभग बत्तीस सालों बाद साथ में पीते हैं अब।रवि और रिया आते हैं उनके अपने माता-पिता के घर।

ना अब कोई सवाल पूछता है सुषमा और शिवांश से, ना ही दोनों जवाब देने की सोचते हैं।सुषमा अपनी खिड़की से झांकती माधवी लता से हर रोज बातें करती है,लिखते समय।अब एक महान मंच से भी जुड़ गाई गई है सुषमा।उस मंच ने,सुषमा की लेखनी को एक नई उड़ान और पहचान दी।आम के पेड़ से रोज एक गिल्लू(गिलहरी)उसे महादेवी वर्मा जी की कहानी याद दिला देता है।

सुषमा के शरीर में सोना पहले भी नहीं होता था अभी,पर अब बालों में चांदी और सोने की चेन वाली चश्में में खुद को ज्यादा सुंदर महसूस करती है सुषमा।

शुभ्रा बैनर्जी 

वाक्य आधारित कहानी-जिंदगी की दूसरी पारी 

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