भरोसा – संध्या सिन्हा 

हेलो जय! भैया की तबियत ठीक नहीं है.. किसी बड़े डॉक्टर को दिखा दो।

ठीक है भा… भी, (जय पूरी बात भी ना कर पाया था कि… उसकी पत्नी नीता ने फ़ोन काट दिया और बोली 

“क्या ठीक है.. तुम भी ना जय समझते नहीं हो… ये भाभी का शहर आने का बहाना है और यहाँ आयेंगे तो डॉक्टर की फ़ीस , दवा पर खर्च नहीं होगा क्या???”

“ कैसी बात करती हो नीता… वो हमारे बड़े भाई है, जिन्होंने हम दोनों छोटे भाईयों जो एक पिता समान हमारी परवरिश की है.”जय बोला ।

“ तो भाभी से कह दो छोटे देवर से बात करे… अभी हमने नया घर लिया है … हमारे पास पैसे नहीं है बड़े भैया के इलाज के लिए।”

“तुम ठीक कह रही हो शायद ।”

रीना को कोई जवाब नहीं मिला तो उसने छोटे देवर विजय को फ़ोन लगाया…”हेलो विजय भैया की तबियत ठीक नहीं है.. किसी बड़े डॉक्टर को दिखा दो।”

“ कल आता हूँ भा… भी 

क्या आता हूँ…बीच में ही मीता ने फ़ोन काट दिया और कहने लगी… कल तुम बच्चो संग गोवा जा रहे है ना.. हमारे ट्रिप का क्या???”

“ अरे यार! बड़े भैया बीमार है… भाभी वहाँ गाँव में अकेले परेशान हो रही… तुम्हें अपने ट्रिप की पड़ी है…”

“अच्छा अभी पिछले हफ़्ते तो भैया-भाभी यहाँ से गए है… इतनी तबियत ख़राब हो गई की…  उन्हें शहर आ कर दिखाना ज़रूरी हो गया… भाभी को यहाँ की आराम तलब की हवा लग गई है लगता है… तभी भैया की बीमारी का बहाना बना रही ।”

“  शायद…तुम सही कह रही हो…।”

इधर रीना हेलो.. हेलो ही करती रह गई.. उसे समझ नहीं आ रहा था कि… वो क्या करे उसके पति रमेश की तबियत बिगड़ती ही जा रही थी,उसे अपने दोनों देवर पर पूरा विश्वास और भरोसा था कि वो दोनों अपने बड़े भाई रमेश को कुछ भी होने नहीं देंगे ।लेकिन फ़ोन पर बात ना हो पाने से वो विचलित हो रही थी …

कहीं फ़ोन काट तो नहीं दिया.. नहीं…सिग्नल चला गया होगा… आख़िर वो ऐसा क्यो करेंगे… छोटे भाई है… अपने बच्चो की तरह पाला है मैंने और रमेश ने ।पर… पलट कर फ़ोन तो करते वो दोनों… किसी का फ़ोन नहीं आया… मैं कहाँ और कैसे लेकर जाऊँ????

रमेश को।कहीं  उनकी पत्नियों नीता  और मीता ने मना तो नहीं कर दिया… हम दोनों के जाने से परेशानी तो होती ही है दोनों को… बड़े घर की आजाद ख़याल की लड़कियां है दोनों…. हम बूढ़े लोगो के रहने से दिक़्क़त तो होती ही होगी…लेकिन रीना को अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था…

नीता और मीता तो दूसरे घर की बेटियां है लेकिन जय-विजय … हमारे है…उन दोनों ने देखा गई हमारा जीवन-संघर्ष… कैसे हमने इन्हें पाला, अपनी औलाद नहीं की, ताकि इनका प्यार ना  बंट जाए,

मैं तो चाहती भी थी कि.. एक हमारा बच्चा हो ताकि कोई मुझे बाँझ ना समझे लेकिन रमेश … माता-पिता के ना रहने पर…  लगते..”यही जय -विजय ही हमारी संतान है रीना… ये अपनी औलाद से बढ़  कर हमे मानेगे रीना देखना एक दिन तुम।”

इसी तरह सोचते-सोचते कई घंटे हो गए…

ना दुबारा फ़ोन ही आया ।

रीना… रीना… कहाँ हो???रमेश की आवाज़ से रीना की तन्द्रा भंग हुई ।

क्या हुआ जी?? कहाँ खो गई थी जय-विजय का फ़ोन आया था  तुम्हारा फ़ोन नहीं लग रहा था तो हमें किए …हमने सारी रिपोर्ट ह्वाट्सऐप पर भेज दी उसे, जय परसों आ रहा है और विजय ने किसी बड़े डॉक्टर से बात कर ली है।  रीना की आँखों से आँसू निकल आए को ख़ुशी से रो पड़ी आज उसका भरोसा जीत गया, उसकी परवरिश पर कोई उंगली नहीं उठा पाएगा।

संध्या सिन्हा 

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