निर्णय – संगीता त्रिपाठी

  “सुलभा तुम ..”एक जानी पहचानी आवाज उसके कानों में टकराई   ,कैसे भूल सकती है इस आवाज को ,जिसकी वो दीवानी थी ,।

   पलट कर देखा तो नितांत अजनबी सा बिखरे  सफेद बालों वाला ,मोटे फ्रेम का चश्मा लगाए ,एक प्रौढ़ व्यक्ति खड़ा था ।

न ये सुशांत नहीं हो सकते……,उसके कानों ने गलत सुना होगा ,कहां घुंघराले बालों वाले  सुकांत ,हमेशा टिप टॉप से रहने वाले ,और कहां ये बेतरतीब सा व्यक्ति ,न कोई मेल नहीं है ।

आगे बढ़ते ही ,”लगता है तुमने पहचाना नहीं … .,”

 “हां मैं पहचान नहीं पाई “

  “मै प्रौढ़ दिखने लगा लेकिन तुम्हारी उम्र तो लगता है ठहर गई “

   दूसरों को रिझाने की आदत आज भी नहीं गई है इनकी …सोचते विगत में पहुंच गई 

   “मिसेज शर्मा क्या हेयर स्टाइल बनाई है आपने ,बहुत सूट कर रहा आप पर  .. भई  हम तो आपके प्रशंसक है ,सुलभा को भी सिखा दीजिए थोड़ा मॉर्डन सोसाइटी के अनुरूप रहने को ,वो तो बस बालों को खींच कर जुड़ा बना कर ही काम चला लेती है….”मिसेज शर्मा की दर्प भरी और सुकांत की व्यंग की हंसी उसे तिलमिला गई , 

माना वो आजकल के हिसाब से फैशन नहीं करती ,पर क्या वो फूहड़ है ,अरे पोस्ट ग्रेजुएट है , हिंदी  की टीचर थी ।ये  एक वाक्या ही नहीं ,अक्सर सुकांत उसे दूसरों के सामने उनकी तारीफ कर सुलभा को फूहड़ बता  जलील करते थे ।

  एक पार्टी में जब उसने “मै सुलभा “कह कर परिचय दिया तो सुकांत  ड्रिंक वाले हाथ  को लहरा कर बोले …”सुलभा …आसानी से  सुलभ रहती है …”उनकी बात सुन उन  महिलाओं के चेहरे पर अवहेलना और व्यंग उभर आई ,जिनकी दिन रात तारीफ के कसीदे सुकांत पढ़ते थे ।

     जब सुलभा पसंद ही नहीं थी तो उन्होंने कॉलेज के टाइम में प्रेम कैसे  किया ,जी हां सुलभा और सुकांत का प्रेम विवाह था ।सुकांत और सुलभा दोनों कॉलेज के एक समारोह में युगल गीत का प्रोग्राम दिया था ,उन्हें फर्स्ट प्राइज मिला …फिर सुलभा और सुकांत का दिल भी तराने गाने लगा    ,लेकिन जब शादी हो गई तो सुकांत को सुलभा में कमियां ही कमियां दिखने लगी …मानव मन की ये विचित्र गुत्थी वो समझ नहीं पाई ,।बाद में काउंसलर रही उसकी सहेली ने बताया ये एक मनोरोग है ,जिसमें पुरुष अपने से आगे स्त्री को देख  नहीं पाता 

  “अरे कहां खो गई “सुकांत की आवाज फिर उसके कानों को टकराई 

“कहीं नहीं “

“क्या मेरे साथ काफी पी सकती हो ,सामने ही काफी शॉप था ,सुलभा कमजोर पड़ गई ,इंकार नहीं कर पाई ।

   काफी का ऑर्डर दे सुकांत बोला ,”एक मिनट्स में आता हूं ,”

      लौटा तो फूलों का एक बुके साथ था ,सुलभा को दे बोला “क्या मुझे एक मौका और दोगी सुलभा , माना मैने बहुत बड़ी गलती की है ,लेकिन एक माफी और मौका तो ईश्वर भी देता है “

  “सुकांत मै वस्तु नहीं नारी हूं ,मेरे अंदर भी एक सामान्य  स्त्री की तरह जज्बात और इच्छाएं है ,अब समय लंबा बीत गया ,मै अपने जीवन में सेट हो चुकी हूं “

काफी और बुके छोड़ सुलभा आगे बढ़ गई ,आंखों के कोर पर लटके आंसुओं को छुपाने के लिए उसे बहुत मशक्कत करनी पड़ी ,पर वो खुश थी कमजोर होने से पहले उसने एक मजबूत निर्णय ले लिया ,।

     जो उसके पहनावे ,व्यवहार को लेकर हमेशा कटाक्ष करता था ,जो उसके मातृत्व के निशानों को बदसूरत समझता था अपने को खूबसूरत और उच्च समझना ,दूसरे को कमतर समझना ,ऐसा व्यक्ति प्रेम के काबिल हो ही नहीं सकता ।

  मन से दोनों कभी एक हुए नहीं लेकिन शादी हो गई है और पति परमेश्वर होता है मां की बात मान वो दुबारा ससुराल लौट आई थी ,बस यही वजह बन गई दूसरे को ऊपर उठने की …,”जाएगी कहां,ठिकाना कहां है इनका , मां – बाप भी रख नहीं पाए , बड़े घमंड से गई थी…”इन जुमलों को पीछे छोड़ वो सामंजस्य करने की पूरी कोशिश करती थी लेकिन उस दिन वो टूट गई थी ,जब बात उसके मातृत्व पर आई ,।

        “शुक्र मनाओ सुमी तुमको नहीं पड़ी ,तुम्हारे पैर और पेट पर कितने दाग हो गए , घिन आती है देख कर   .”और सुलभा उसी दिन पांच महीने की बेटी ले ,घर से निकल गई ,।इस बार सुलभा मायके नहीं गई ,अपने सहेली के घर गई ,पुराने स्कूल जा दुबारा जॉब पा गई ,एक छोटा घर किराए पर ले बेटी के साथ नए सफर पर चल पड़ी ,जीवन की दूसरी पारी आसान नहीं थी लेकिन असंभव भी नहीं है ,ये जान है सुलभा ,

रास्ता थोड़ा कठिन जरूर था लेकिन अपने आत्मविश्वास और लगन से वो इस घड़ी को भी पार कर रही थी ,हर समय कांटों से  लहूलुहान करने वाला कोई नहीं था ,

   सुमी मेडिकल कर रही थी एक साल बचा है वो डाक्टर बन जाएगी ,उसकी जिंदगी भी पटरी पर आ जाएगी  ,अब नहीं चाहिए उसे सुकांत जैसा पति ..।

               —- संगीता त्रिपाठी 

               #मौलिक और स्वरचित 

   #जीवन की दूसरी पारी

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