जो बोया वही पाया – विनीता सिंह

धूल भरी गलियों वाले उस छोटे से गांव में रामदीन बहुत मेहनती था। सुबह हो या शाम, खेत में हल चलाता, बीज बोता। पसीना बहाता, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद की चमक।

“थी जो बोया, वही पाया,”उनके पिता का यह कथन उसके खून में घुला था। पत्नी सुशीला दो मासूम बच्चों—लल्ला और गुड़िया—के साथ घर संभालती। गुड़िया की हंसी घर की रौनक थी, लल्ला का सपना बड़ा आदमी बनना। लेकिन किस्मत ने खेल खेला।

गांव का ठाकुर हरिया लालची शेर था। सैकड़ों एकड़ जमीन, फिर भी रामदीन के छोटे उपजाऊ खेत पर नजर लगाये था उसने रामदीन को कई बार कहा अपने खेत बेच दे” उसने धमकाया। रामदीन ने सिर झुकाया, “यह मेरी मां की अंखिरी निशानी है मैं इसे नहीं बेचूंगा।ठाकुर का चेहरा सख्त, “गुस्से से लाल हो गया 

” रातें काली हो गईं। ठाकुर के गुर्गों ने खेत में जहर मिला दिया। सुबह रामदीन चीखा—बीज सड़े! सुशीला रो पड़ी, गुड़िया डर गई। “पापा, भूख लगी।” रामदीन का दिल चूर-चूर। आंसू पोछे, बोला, “सब ठीक हो जाएगा बेटी।”

बारिश आई, रामदीन ने फिर बोया। लेकिन ठाकुर ने नहर रोकी। खेत बिना पानी के सूख गए। सुशीला की सांसें उखड़ने लगीं। डॉक्टर बोला, “दवा लाओ, वरना…” रामदीन ने अपने आखिरी बैल बेचा। बच्चे रोते, “मां को बचा लो।” एक रात ठाकुर का बेटा बाबू आया। उसने रामदीन के ऊपर लाठियां बरसाईं।

रामदीन खून में लथपथ। सुशीला चीखी, “मत मारो मेरे पति को!” लल्ला ने ठाकुर को गालियां दीं। गांव चुप। रामदीन बिस्तर पर तड़पता, सुशीला का सिर उसके सीने पर। “राम हम मर जाएंगे।” रामदीन आंसू बहाता, सुशीला ने कहा अच्छाई बोई है। फल मिलेगा।”

रामदीन ठीक हुआ, लेकिन सुशीला की आंखों में उदासी। गुड़िया रातें कांपती सोती। ठाकुर हंसता, “अब घुटने टेकेगा।” एक दिन भागवान जागे। सूखा आया। ठाकुर के खेत मरने लगे। मजदूर भूखे। फिर बाढ़—संपत्ति बह गई। बाबू शराब पीकर गाड़ी पटककर मरा। ठाकुर की बेटी भूख से तड़पती। ठाकुर सड़कों पर भटकता, चेहरा काला, आंखें सूजीं। “मेरा सब छिन गया।”

एक सर्द रात ठाकुर रामदीन के दरवाजे पर गिरा। “रामदीन… भाई… माफ कर। मेरी बेटी मर रही। थोड़ा अनाज।” उसकी आवाज टूट रही, आंसू बह रहे। सुशीला ने देखा—वही ठाकुर जो घर जला देना चाहता था। “” लेकिन रामदीन उठा, सुशीला का हाथ थामा। और बोला”देखो सुशीला, उसके आंसू सच्चे हैं।” अनाज का बोरा दिया। ठाकुर घुटनों पर। “तू भगवान है। मैंने बुराई बोई, दर्द पाया। अब अच्छाई बोऊंगा।” रोते-रोते चला।

रामदीन ने फिर खेत सींचा। गांव ने साथ दिया। फसल लहलहाई। सुशीला हंसने लगी, गुड़िया गीत गाने। लल्ला पढ़ाई में अव्वल। ठाकुर छोटे खेत में मजदूरी करने लगा। धीरे-धीरे उसका दिल पिघला। एक दिन आया, हाथ जोड़े। “रामदीन मेरी बेटी को गुड़िया से मिलवा।” बच्चियां खेलीं, हंसी गूंजी। ठाकुर रोया, “यह खुशी मैंने कभी न देखी।”

बूढ़े रामदीन खेत किनारे बैठे। सुशीला सिर पर हाथ फेरती। “रामदीन, तेरी अच्छाई ने सब जीता।” रामदीन बोला, “नहीं सुशीला , जो बया, वही पाया। बुराई के बीज कांटे देते हैं, अच्छाई फूल।” सूरज डूबा, लेकिन उनके जीवन में उजाला फैला। ठाकुर भी मुस्कुराया—नया जीवन मिला

विनीता सिंह

error: Content is protected !!