समीर तेरी सूरत देखे पूरे पांच साल हो गए । अब तो भारत आजा बेटा। अपने देश जहां अपना इंदौर शहर है। जिसे हम हक से अपना कह सकते हैं। तुम तो कुछ महीनो के लिए गए थे मगर,वे महीने कब साल में बदल गए, पता ही नहीं चला। मुझे तुम्हारी, बहू की और बच्चों की बहुत याद आती है।
यहां मैं और तेरे पापा अब बिल्कुल अकेले हो गए हैं। तुम्हारे पापा को ठीक से आंखों से दिखाई भी नहीं देता है। उनकी आंखों का ऑपरेशन करवाना है। मेरे घुटनों में भी बहुत दर्द रहने लगा है कहते कहते अचानक पूर्णिमा जी रुक गई क्योंकि सामने रवि शंकर जी आकर खड़े हो गए थे।
रवि शंकर जी और समीर दोनों की सोच बहुत अलग थी। जहां रवि शंकर जी सीधे सरल और और अपने इंदौर शहर को बहुत प्यार करने वाले थे ।
वहीं समीर की बचपन से ही बहुत ज्यादा आकांक्षाएं और बड़े बड़े सपने थे इसीलिए उसे इंदौर शहर बहुत छोटा लगता। वह विदेश की चमक धमक को बड़ी लालायित नजरों से देखा करता था और यही लालायित नजरे उसे विदेश तक ले भी गई।
जब से समीर विदेश चला गया था। तब से ही रवि शंकर जी ने एक बार भी अपने बेटे से फोन पर बातें नहीं की और ना ही समीर का कोई फोन आया। देखते ही देखते पांच साल निकल गए।
पूर्णिमा जी कभी भी अपने बेटे समीर से दूर नहीं हो पाई और ना ही समीर अपनी मां से दूर हो पाया इसीलिए जब पूर्णिमा जी घर पर अकेली होती तो ममतावस अपने बेटे को फोन कर लेती।
समीर को भी अपने पिता की रूटिंग पता होती थी इसीलिए जब उसके पिता घर पर नहीं होते तो,वह अपनी मां को फोन कर लेता था और इस तरह दोनों की जिंदगी चल रही थी।
हालांकि रवि शंकर जी को दोनों मां बेटे की बातचीत का सब पता होता था, मगर कभी दोनों मां बेटे के बीच की दीवार नहीं बने क्योंकि आखिर बेटा था उनका । उनके मन में भी समीर के लिए प्यार और आशीर्वाद तो बहुत थे पर अब कहने को कोई शब्द शायद नहीं बचे थे।
फोन उधर से अभी भी चालू था। अपने बेटे समीर की आवाज रवि शंकर जी को साफ-साफ सुनाई दे रही थी । वह कह रहा था मां पापा की याद तो बहुत आती है, मगर अब पापा से बातें करने की हिम्मत नहीं होती है। मैं यहां की चमक धमक देख कर आ तो गया, मगर अब धीरे-धीरे मेरी लालायित भरी नजरे धुंधली पड़ती जा रही है क्योंकि मुझे भी तुम्हारी और पापा की बहुत याद आती है। यहां कोई किसी से रिश्ता रखना ही नहीं चाहता। यहां कोई किसी की तकलीफ में दौड़कर नहीं आता । पता है मां…अभी कुछ दिन पहले मेरा एक्सीडेंड हो गया था तो पुलिस की मदद से ही मैं हॉस्पिटल जा पाया । यहां आसपास के लोगों ने मेरी कोई मदद नहीं की । सच कहूं तो मां यहां चमक धमक तो बहुत है मगर किसी के अंदर अपनापन नहीं। जो हमारे भारत में है, हमारे इंदौर में है।
जब से यहां आया हूं,बहुत अकेलेपन की अनुभूति होती है।
मगर पापा से कुछ कह नहीं पाता क्योंकि जिस तरह मैं पापा का इकलौता बेटा होने के बावजूद भी उनका दिल तोड़ कर यहां आ गया था तो फिर मैं कैसे कहता और क्या कहता।
सच कहूं तो मां शायद इसीलिए मेरे कदम अब इंदौर की ओर बढ़ नही पा रहे हैं। और फिर उधर से धीरे-धीरे सिसकने की आवाज सुनाई देने लगी।
रवि शंकर जी से अपने बेटे की ऐसी हालत देखकर रहा नहीं गया। वह तुरंत फोन को अपने कानों से लगाते हुए बोल उठे । बेटे अभी तुम्हारे पिताजी जिंदा है । मुझे छोड़ कर तुम गए थे। तुमने हमें पराया किया था, हमने नहीं। बेशक मैं तुम्हारा पिता हूं मगर इतना पत्थर दिल भी नहीं हूं। जो अपने बेटे को तकलीफ में देखकर खुद के स्वाभिमान को जिंदा रखूं। और हां बाप बेटे के बीच कैसा मान और कैसा अपमान…
तुम बेशक इंदौर आ जाओ। जिस इंदौर को तुम छोड़ कर गए थे वो इंदौर अब काफी कुछ बदल चुका है। मगर इतना भी नहीं कि तुम्हें पहचान ना पाए । अपने भारत की कुछ बात ही अलग है। यहां से जो भी कोई जाता है। उसे दुखी मन से विदा करता है तो वापस आने पर हंस कर गले भी तुरंत लगा लेता है इसीलिए बेटे जो बीत गई उसे भूल जाओ और अब बस आ जाओ।
पूर्णिमा जी बिल्कुल चुप थी मगर उनकी आंखें नम थी और उधर से रुंधी हुई आवाज में समीर बोल रहा था। हां पापा मैं जरूर आ रहा हूं।
पापा मैं आना तो बहुत पहले चाहता था, मगर हमारे बीच के हालात ने मुझे मजबूर कर दिया । मैं आपका अपना होकर भी आपको ही पराया मान बैठा। जो कि मेरी बहुत बड़ी भूल थी और फिर उधर से आवाज आनी बंद हो गई । शायद समीर आगे कुछ और कह नहीं पाया था इसीलिए उसने फोन कट कर दिया होगा।
पूर्णिमा जी की आंखें नम देखकर रवि शंकर जी मुस्कुरा कर बोल उठे। अरे पूर्णिमा चलो अब अब चुपके-चुपके इन आंखों को बरसने की जरूरत नहीं है ।
जरा देखो आसमान की ओर हमारे दुख के बादल न जाने किस और उड़े चले जा रहे हैं ।
आज मैं बहुत खुश हूं । हमारा बेटा समीर और बहू और हमारे नाती पोते अब अपने देश,अपनी जमीन,अपने घर आ रहे हैं। क्योंकि जहां तक मैं समझता हूं विदेश तो विदेश ही होता है मैं विदेश को गलत नहीं कह रहा मगर वहां की हवा ही वैसी है वहां जाकर अपने भी पराए हो जाते हैं।
अपने पति रवि शंकर जी की बात सुनकर पूर्णिमा जी भी शांत मन से बोल उठी। जी आप बिल्कुल सही कह रहे हैं मगर जो हमारे अपने ही वहां की चमक धमक देख पराए बन गए थे । अब वही फिर अपने बनने को तैयार हैं क्योंकि हमारे भारत की, हमारे इंदौर की मिट्टी की खुशबू ही कुछ अलग है जो किसी न किसी तरह किसी भूले भटके को वापस बुला ही लेती है इसीलिए अब बीती बातें भूलकर हम सब एक नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे कहते हुए पूर्णिमा जी मुस्कुरा पड़ी।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम
#अपने हुए पराए