बड़ी माँ – सविता गर्ग 

“दीदी, आप हमेशा आईने के सामने इतनी देर लगाती हैं! मैं पिछले आधे घंटे से बाहर खड़ी आपका इंतज़ार कर रही हूँ, और आप हैं कि आपकी बिंदी ही सेट नहीं हो रही।”

निहारिका ने अपने हाथों में पहनी कांच की चूड़ियों को खनकाते हुए अपनी बड़ी चचेरी बहन काव्या से शिकायत की। काव्या ने मुस्कुराते हुए आईने से ही निहारिका को देखा और अपनी हल्की गुलाबी चुनरी कंधे पर डालते हुए बोली, “अरे मेरी झाँसी की रानी, आ गई बस। तू तो ऐसे बिगड़ रही है जैसे मेरी वजह से तेरी ट्रेन छूट रही हो।”

दरवाजे पर खड़े निहारिका के पिता, जो काव्या के ताऊ जी थे, दोनों बच्चियों की यह मीठी नोकझोंक सुनकर हंस पड़े। उन्होंने प्यार से निहारिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, तू अपनी दीदी से इतना लड़ती है,

पर एक दिन भी उसके बिना रह नहीं पाती। मुझे तो लगता है कि तुम दोनों की चोटियां एक ही धागे में बांधकर तुम दोनों को एक ही घर में विदा करना पड़ेगा। वरना एक-दूसरे के बिना तुम दोनों ससुराल में भी रो-रोकर बुरा हाल कर लोगी।”

यह सुनकर दोनों बहनें खिलखिला कर हंस पड़ीं। निहारिका ने काव्या का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली, “ताऊ जी, अगर ऐसा हो गया तो समझो हमारे मजे आ गए। हम तो ससुराल को भी मायका बना देंगे।”

बचपन की उस हंसी-ठिठोली में किसी को नहीं पता था कि ताऊ जी के मुंह से निकली वह बात सरस्वती का वरदान बन जाएगी। वक्त पंख लगाकर उड़ा और काव्या व निहारिका बड़ी हो गईं। किस्मत का खेल देखिए, शहर के एक नामी परिवार से दो सगे भाइयों, सुमेध और विहान का रिश्ता इन दोनों बहनों के लिए आ गया।

सुमेध बड़ा था, जिसके लिए काव्या को चुना गया और छोटे विहान के लिए निहारिका को। मायके की वो दोनों चिड़िया सच में एक ही आँगन में जोड़े से उड़कर जा रही थीं। विदाई के वक्त जहाँ बाकी लड़कियां डर और घबराहट से रोती हैं, वहीं काव्या और निहारिका एक-दूसरे का हाथ थामे एक अजीब से सुकून के साथ अपने नए सफर पर निकली थीं।

ससुराल बहुत बड़ा और समृद्ध था। लेकिन हर बड़े घर की तरह वहाँ की दीवारें भी कुछ ठंडी और नियम बेहद सख्त थे। उनकी सास, सावित्री देवी, बहुत ही अनुशासन प्रिय और पुरानी सोच वाली महिला थीं। उनका मानना था कि मायके की दो बहनें अगर एक ही घर में बहुएं बनकर आएं,

तो वो या तो घर पर कब्ज़ा कर लेती हैं या फिर आपस में लड़कर घर का बंटवारा करवा देती हैं। इसीलिए सावित्री देवी ने शुरुआत से ही एक कूटनीति अपनाई। उन्होंने दोनों बहनों के बीच दरार डालने की कोशिश शुरू कर दी।

वह अक्सर काव्या की तारीफ करतीं और निहारिका को नीचा दिखातीं। “काव्या के हाथ के बने खाने में जो स्वाद है, वो तुम्हारी इस जली हुई रोटियों में कहाँ निहारिका? बड़ी बहन से कुछ तो सीखा होता।” ऐसी बातें सावित्री देवी अक्सर मेहमानों के सामने भी कह देती थीं। कोई और बहन होती तो शायद तारीफ सुनकर फूल जाती और छोटी पर रौब झाड़ती, लेकिन काव्या की मिट्टी कुछ और ही थी।

जिस दिन सावित्री देवी निहारिका के खाने की बुराई करतीं, काव्या जानबूझकर अपने बनाए खाने में नमक तेज़ कर देती, ताकि सास उसे भी डांटे और निहारिका को यह न लगे कि उसकी दीदी उसे छोड़कर आगे बढ़ गई है। दोनों बहनें रात को रसोई साफ करते हुए एक-दूसरे के गले लगतीं और मायके की यादों में खो जातीं।

शादी के तीन साल बीत गए। काव्या ने एक बहुत ही प्यारे से बेटे को जन्म दिया। पूरे घर में खुशियों की लहर दौड़ गई। लेकिन इसी दौरान निहारिका की ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा तूफान आ गया। लाख कोशिशों और अनगिनत डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद पता चला कि निहारिका कभी माँ नहीं बन सकती।

यह खबर सावित्री देवी के लिए किसी भूचाल से कम नहीं थी। उन्होंने उसी दिन से निहारिका को ताने मारना शुरू कर दिया। “मैंने तो पहले ही कहा था कि यह लड़की हमारे घर के लिए अशुभ है। अब विहान की ज़िंदगी बिना संतान के ही बीतेगी क्या? मुझे तो अपने बेटे का घर फिर से बसाना पड़ेगा।”

निहारिका अंदर ही अंदर घुटने लगी। वह पूरा दिन अपने कमरे में बंद रहती और रोती रहती। सुमेध और विहान दोनों ही अपनी माँ के सामने कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे।

एक दिन घर में सत्यनारायण की पूजा रखी गई थी। काव्या के बेटे का मुंडन था। घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था। जब पूजा शुरू होने वाली थी, तब सावित्री देवी ने निहारिका को सबके सामने टोकते हुए कहा, “तू पूजा की थाली मत छूना निहारिका। शुभ काम है, और वैसे भी बांझ औरतों का इस पूजा में क्या काम?”

यह शब्द किसी तेज़ धार वाले खंजर की तरह निहारिका के सीने में उतर गए। वह फूट-फूटकर रोने लगी और अपने कमरे की तरफ भागने लगी। लेकिन तभी एक हाथ ने उसे मज़बूती से पकड़ लिया। वह काव्या थी।

काव्या ने अपने एक साल के बेटे को अपनी गोद से उतारा और उसे निहारिका की बाहों में सौंप दिया। पूरा घर सन्न रह गया। सावित्री देवी गुस्से से चिल्लाईं, “यह क्या कर रही है तू काव्या? अपना बच्चा उसे क्यों दे रही है?”

काव्या की आँखों में आज एक ऐसी आग थी जो उसने पहले कभी किसी को नहीं दिखाई थी। उसने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “माँ जी, जिस मायके से मैं संस्कार लेकर आई हूँ, वहाँ मुझे सिखाया गया है कि बहन का दुख अपना दुख होता है। आपने निहारिका को बांझ कहा ना? तो आज से मैं भी बांझ हूँ। यह बच्चा आज से मेरा नहीं, निहारिका का है। देवकी ने कृष्ण को जन्म ज़रूर दिया था, लेकिन दुनिया आज भी कृष्ण को यशोदा नंदन ही कहती है। अगर मेरी बहन माँ नहीं बन सकती, तो मेरा यह बेटा आज से इसे माँ कहेगा।”

सावित्री देवी अवाक रह गईं। रिश्तेदार भी काव्या के इस फैसले को सुनकर हैरान थे। काव्या ने निहारिका के आंसू पोंछे और कहा, “तू अकेली नहीं है निहारिका। याद है ना ताऊ जी ने क्या कहा था? हमारी चोटियां एक ही धागे में बंधी हैं। तेरा हर आंसू पहले मेरी आँखों से होकर गुज़रेगा।”

निहारिका ने काव्या को और उस छोटे से बच्चे को कसकर गले लगा लिया। घर के उस बड़े से आँगन में आज दो बहनों के प्यार ने समाज की सबसे कड़वी और रूढ़िवादी सोच को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। विहान और सुमेध की आँखों में भी आंसू थे। उन्होंने भी आगे बढ़कर अपनी पत्नियों का साथ दिया।

सावित्री देवी को पहली बार अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया था कि जो लड़कियां एक-दूसरे के दर्द में अपनी सबसे बड़ी खुशी (अपना बच्चा) कुर्बान कर सकती हैं, वो घर तोड़ती नहीं, बल्कि घर को एक ऐसे धागे में पिरो देती हैं जिसे दुनिया की कोई ताकत नहीं तोड़ सकती। उन्होंने आगे बढ़कर निहारिका के सिर पर हाथ रखा और अपने कहे कड़वे शब्दों के लिए मौन माफ़ी मांगी।

उस दिन के बाद से उस घर में कभी किसी ने निहारिका को कोई ताना नहीं दिया। काव्या का बेटा निहारिका को ‘बड़ी माँ’ नहीं, बल्कि सिर्फ ‘माँ’ बुलाता था और काव्या को ‘मम्मा’। बचपन का वो हंसी-मज़ाक, वो प्यार, जो एक साधारण से घर के आईने के सामने शुरू हुआ था, उसने ससुराल के उस बड़े से मकान को एक असली ‘घर’ बना दिया था।

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लेखिका : सविता गर्ग 

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