*अपने हुए पराए* – तोषिका

मां, मां कहा हो तुम? जल्दी बाहर आओ। खुशी में चिल्लाती दिया बोली। उधर रसोई से अपनी साड़ी से हाथ सुखाती हुई बाहर आते हुए उसकी मां रमा बोली “क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है ना?” दिया बोली हा मा सब ठीक है, अरविंद को स्कॉलरशिप मिली है, अब वो अमेरिका जाके अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर सकता है। 

रमा ये सुन कर बहुत खुश हो गई, उसने बोला “देखा बेटा, भगवान ने हमारी सुन ली। अब धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा, साथ ही में घर की आर्थिक स्थिति भी कम हो जाएगी। दिया ने एक दम से अपनी मां से बोला “अब तुम्हे काम करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी मां, बाकी अब तुम आराम करो मैं बाकी लोगों के घरों का काम पूरा कर के आती हू।

” उस रात जब अरविंद घर आया, तो उसकी मां ने उसके लिए मीठे में खीर बनाई थी, जिसको देख अरविंद खुश हो गया और उसने अपनी मां को गले लगाते हुए बोला, तुम फिकर मत करो मां, एक दिन मैं भी तुम्हे बड़ी बड़ी गाड़ियों में घुमाऊंगा।”

महीने गए और १० महीनों बीत गए और अरविंद के जाने का समय आ गया।

उसको एयरपोर्ट पर छोड़ कर रमा और दिया वापिस ही आ रहे थे कि उनको उनकी एक घर की मालकिन दिखी, जो रमा को देखते ही बोली “अरे रमा, अब तुम कैसे हू? दिया ने बताया था कि तुम्हारी तबियत खराब है, इसीलिए तुम्हारी जगह वो काम पर आएगी।

” रमा ये सुन कर चौंकी फिर बोली “मेरी तबियत?” मालकिन बोली “हां, तुम्हारी तबियत रमा, दिया ने मुझे बताया था कि तुम्हारे घुटनों में दर्द रहता है, तो डॉक्टर ने तुम्हे सख्त आराम करने को कहा।” रमा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है, वो दिया कि तरफ देखती, फिर अपनी मालकिन की तरफ लेकिन जब तक वो कुछ पूछे,

मालकिन के पास कॉल आया तो उसने रमा को बोला “चलो रमा मुझे मेरे ड्राइवर का कॉल आ रहा है, मैं चलती हू, अपना ध्यान रखना।”

जब वहां से मालकिन गई तो रमा ने दिया कि तरफ देखा पर उसकी आँखें में क्रोध नहीं था, ममता थी क्योंकि वो जानती थी कि उसके संस्कार गलत नहीं हो सकते। उसका दिमाग कुछ और कह रहा था लेकिन उसका मन जानता था कि बात कुछ और है, इसलिए उसने घर वापिस जाते समय कुछ नहीं बोला।

घर में घुसे और फिर दिया ने रमा को पानी दिया। जब उसने पानी पी लिया जब दिया बोली ” मां आप कुछ कह क्यों नहीं रही, ना ही आप कुछ पूछ रही हो?” रमा की आवाज़ में नरमी थी और फिर वह बोली “मेरा मन अपने दिए हुए संस्कारों पर भरोसा करना चाहता है, और तुमने जो भी किया होगा कुछ सोच के किया होगा।

” दिया ये सुन कर हैरान रह गई और फिर अपना गला साफ करते हुए बोली “मां, मुझे खुशी है कि आपका भरोसा मेरे ऊपर से डगमगाया नहीं। दरअसल बात ये है कि अरविंद और मैं आपकी छोटी उम्र से ही घर घर में काम करते देखते हुए आ रहे है

और यह सब देख कर हमारे दिल में चुभता था कि इतनी कड़कती धूप में चलकर, अपने कुमार हाथों को कठोर बना कर तुम हमारे लिए इतना कर रही हो और जब अरविंद के स्कॉलरशिप का नोटिस नहीं आ रहा था तो उसे लगा कि मां बेवजह ही मेहनत कर रही है,

जिसके चलते वह अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ने वाला था और मां तुम बताओ मैं ऐसे कैसे होने देती, इसीलिए मैने आपको बोला कि उसकी स्कॉलरशिप लग गई है जिसके चलते मैं तुम्हारी जगह काम करने चली जाया करु।”

रमा की आँखें में ये सब सुन कर आंसू आ गए और फिर उसने बोला “बेटा तुम दोनों ने तो बिल्कुल *अपने हुए पराए* वाली बात कर दी। मां हू मैं तुम दोनों की, तुमने मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाई? तुमने अकेले इतने सारे पैसे का इंतजाम कैसे किया?

” दिया बोली “मां दरअसल, बगल वाले घर में जो हरि काका रहते है, उन्होंने हमारी सारी बातें सुन ली थी, जिसके चलते उन्होंने हमारी मदद की और उनको मैं हर महीने धीरे धीरे करके पैसे लौटा रही हू। वो तो कह रहे थे कि बस अरविंद कुछ बन जाए उनके लिए वो ही काफी होगा, उनको पैसों की जरूरत नहीं है।” रमा ने दिया को गले लगा लिया।

*कुछ सालों बाद*

उनके पास एक चिट्ठी आई, वो अरविंद ने भेजी थी। जिसमें एक चाबी थी, रमा और दिया समझ नहीं पा रहे थे कि ये किस चीज की चाबी है, तभी घर की घंटी बजी और वहां अरविंद खड़ा था।

अरविंद बोला “मां ये हमारे नए घर की चाबी है।” अब तुम्हे और दीदी को और कष्ट नहीं उठाने पड़ेंगे।” फिर वो उन दोनों को लेकर हरि काका के घर गया और फिर हरि काका के पैर छुए और बोला “काका आज मैं जो भी बन पाया हू, सब आपकी, मां और दीदी की वजह से है, इसीलिए मैं चाहते हू कि आप हमारे साथ चले रहने और ये आपके पैसे जो आपने उस समय एक बच्चे को अपना बच्चा समझ के दिए थे”।

हरि काका ने ये सब सुन कर उसे गले लगा लिया और फूट कर रोने लगे और आखिर रोना आएगा भी क्यों नहीं उनको पहली बार किसी ने अपने परिवार का हिस्सा बनाया था क्योंकि उनका अपना कभी कोई था ही नहीं इस दुनिया और वृद्ध उमर में उनको एक बेटा मिल गया था।

लेखिका

तोषिका

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