अभिमान के उस पार – सीमा गुप्ता

“ज्ञान का इतना बड़ा भंडार समेटे बैठे हैं आप, पर क्या कभी इस घर की दीवारों में कैद घुटन को भी पढ़ने की कोशिश की है, नीलकंठ?” सुमित्रा जी ने मेज पर कप रखते हुए भारी स्वर में कहा।

नीलकंठ जी अखबार के पन्ने पलटते हुए गंभीर आवाज़ में बोले, “सुमित्रा, मैं अखबार की सुर्खियाँ पढ़ता हूँ, घर की फिजूल की खामोशियाँ नहीं। और जिसे तुम घुटन कह रही हो, वह असल में उस अनुशासन की मर्यादा है जिसे इस घर के तथाकथित ‘आधुनिक वारिस’ ने ठुकरा दिया है।”

“अनुशासन या अहंकार? पाँच साल हो गए। एक ही आंगन में आप दोनों टहलते हैं, पर आपकी परछाइयाँ तक एक-दूसरे को छूने से कतराती हैं। क्या एक पिता का अपनी जीत का अभिमान इतना बड़ा है कि वह अपने बेटे की आवाज़ सुनने को तरस जाए?” सुमित्रा जी ने उनकी आँखों में आँखें डालकर पूछा।

नीलकंठ जी के मन में पुरानी यादों की कड़वाहट ताजा हो गई। उन्होंने अखबार मेज पर पटका, “सुमित्रा, यह अभिमान की नहीं, एक पिता के स्वाभिमान और सम्मान की बात है। उस दिन को कैसे भूल जाऊं जब राघव ने भरे समाज में मेरी तीस साल की मेहनत और साख को मिट्टी में मिला दिया था? मैंने उसे अपने कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करवाया था

ताकि वह मेरी विरासत संभाले। लेकिन उसने सबके सामने जॉइनिंग लेटर की उपेक्षा करते हुए कहा कि उसे ‘पेंटर’ बनना है। मेरे पद, रुतबे और मेरी इच्छा की उसे रत्ती भर परवाह नहीं थी। अगर राघव को लगता है कि वह अपने पिता के अनुभवों से बड़ा हो गया है, तो उसे अपनी दुनिया मुबारक। मैं झुककर उसे यह नहीं बताऊंगा कि वह गलत है।”

“नीलकंठ, आप सही होने का इतना बड़ा बोझ ढो रहे हैं कि आपकी कमर झुक गई है, पर आपकी अकड़ नहीं गई।” सुमित्रा जी की आवाज़ में दर्द और कटाक्ष दोनों थे।

ऊपर के कमरे में राघव अपने कैनवास पर रंगों से खेल रहा था। अपने पिता की वही पुरानी बात “मेरे घर में रहना है तो मेरे नियम मानने होंगे और मेरी साख का ख्याल रखना होगा”, रह-रह कर उसे कचोटती थी। हालाँकि इन पाँच वर्षों में राघव ने अपनी योग्यता और प्रवीणता के दम पर कला जगत में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया था,

उसकी प्रदर्शनियों की चर्चा बड़े अखबारों में होती थी, पर अपने ही पिता की नज़रों में वह आज भी एक ‘विद्रोही’ से अधिक कुछ नहीं था। वह घर छोड़कर जाना चाहता था, पर माँ की ममता और अपनी जड़ों के प्रति मोह ने उसे रोक रखा था।

सीढ़ियों पर सुमित्रा जी की आहट हुई। वे राघव के लिए खाना लेकर आई थीं। “माँ, आप क्यों आती हैं? पिताजी देखेंगे तो फिर एक नया उपदेश शुरू हो जाएगा।” राघव ने ब्रश रखते हुए कहा।

“बेटा, घर अहसासों से चलते हैं। तेरे पिताजी भी अंदर से उतने ही टूटे हैं, जितना कि तू। बस, उन्होंने अपनी टूटन को ‘सिद्धांतों’ के मलबे के नीचे दबा दिया है।” सुमित्रा जी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा।

“सिद्धांत?” राघव हंसा, पर उस हंसी में कड़वाहट थी। “माँ, जो इंसान अपनी झूठी शान के लिए बेटे की पसंद का गला घोंट दे, उसके सिद्धांत कैसे महान हो सकते हैं? आज कला की दुनिया मुझे ‘राघव’ के नाम से जानती है, पर पिताजी के लिए मैं आज भी वही अड़ियल लड़का हूँ। वे चाहते हैं कि मैं उनके हाथ की कठपुतली बन कर रहूं। क्या एक कलाकार अपनी आत्मा को बेचकर ही बेटा कहलाने का हक पाएगा?”

सुमित्रा रुआँसी होकर कमरे से बाहर निकल आई। सीढ़ियों पर उतरते हुए वह मन ही मन सोच रही थी, “अभिमान वह सूक्ष्म पर्दा है जो आँखों के सामने आते ही अपनों के चेहरे धुंधले कर देता है। संवाद का अंत ही रिश्तों की मृत्यु है, और जहाँ शब्द मर जाते हैं, वहाँ सिर्फ खालीपन की प्रतिध्वनि रह जाती है।”

एक रात मौसम ने करवट ली। तेज आंधी और बारिश ने खिड़कियों को झकझोर दिया। नीलकंठ जी अपने स्टडी रूम में एक पुरानी किताब पढ़ रहे थे, तभी अचानक उनके सीने में एक तेज चुभन हुई। वे कुर्सी से उठना चाहते थे, पर शरीर ने साथ नहीं दिया।

“सु… सुमित्रा! सु… सुमित्रा!” उन्होंने पत्नी को आवाज देकर बुलाने का प्रयास किया।

तभी बिजली कड़की और कमरे का दरवाजा खुला। सामने राघव खड़ा था। वह पानी लेने नीचे आया था और पिता का करुण स्वर सुनकर अंदर आ गया। उसने देखा, उसके ‘अजेय’ पिता आज बेबस होकर कुर्सी के हत्थे को कसकर पकड़े हुए थे। राघव ने दौड़कर अपने पिता को संभाला और तुरंत एम्बुलेंस बुलाई।

नीलकंठ जी को शहर के बड़े अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया। शुरुआती तीन दिन बहुत नाजुक थे। अस्पताल के उन दिनों में, नीलकंठ जी ने कुछ ऐसा देखा जिसने उनके ‘बौद्धिक अभिमान’ को झकझोर दिया। उन्होंने देखा कि डॉक्टर और स्टाफ सदस्य राघव को कितनी इज़्ज़त दे रहे थे। उन्होंने सुना कि कैसे लोग बात कर रहे थे, “ये प्रसिद्ध चित्रकार राघव हैं।”

जिस बेटे को वे ‘भटका हुआ’ समझ रहे थे, वह समाज में एक सम्मानजनक मुकाम बना चुका था।

नीलकंठ जी की अर्ध-खुली आँखों ने उन तीन दिनों में वह सब देखा जो सालों के उनके सिद्धांतों ने उन्हें कभी नहीं दिखाया था। उन्होंने देखा कि जिसे वे निकम्मा और विद्रोही कहते थे, वह कैसे बिना सोए, बिना खाए उनके सिरहाने खड़ा रहता था। जब नर्स इंजेक्शन लगाती, तो राघव का हाथ उनके हाथ को इतनी मज़बूती से थाम लेता जैसे वह उन्हें इस दुनिया से जाने नहीं देगा।

एक रात, नीलकंठ जी ने महसूस किया कि राघव खामोशी से रो रहा था और धीरे से बुदबुदाया, “ठीक हो जाइए न पिताजी! अभी तो मुझे आपको यह दिखाना है कि आपकी दी हुई परवरिश बेकार नहीं गई। आपसे दूर होकर मैं अपनी पहचान तो पा सकता हूँ, पर आपके बिना अपना अस्तित्व नहीं ढूँढ पाऊँगा।”

नीलकंठ जी के हृदय में एक हलचल सी हुई। उन्हें अहसास हुआ कि जब साँसें उखड़ती हैं, तो डिग्रियां और सिद्धांत काम नहीं आते, सिर्फ वे हाथ काम आते हैं जो बिना शर्त आपका हाथ थाम लें।

एक सप्ताह बाद नीलकंठ जी घर लौटे। नीलकंठ जी खिड़की के पास लेटे थे। राघव दवा लेकर कमरे में आया। वह दवा रखकर जाने लगा, तो नीलकंठ जी ने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, “रुको, राघव। तुम… तुम अस्पताल में उस रात क्या कह रहे थे?” नीलकंठ जी के शब्दों में आज विद्वत्ता का भार नहीं, पिता का संकोच था। राघव मुड़ा, “मैं… मैं बस चाहता था कि आप ठीक हो जाएं।”

नीलकंठ जी ने गहरी सांस ली, “अस्पताल के उन सात दिनों ने मुझे वह पढ़ा दिया जो सात सौ किताबें नहीं पढ़ा सकीं, राघव। यह मेरे लिए आत्ममंथन का अवसर था। तुम्हारे ‘बड़प्पन’ के समक्ष मेरा ‘अभिमान’ बहुत छोटा पड़ गया। मैंने तुम्हें अपना अनुयायी बनाना चाह कर बहुत बड़ी भूल की है। मैं भूल गया कि तुम मेरे अंश हो पर तुम्हारी अपनी स्वतंत्र उड़ान है।”

राघव की आँखों से आंसू बह निकले। “पिताजी, मैंने भी आपसे बहुत कुछ सीखा है। मैंने आपसे ‘अडिग’ रहना सीखा, पर अफसोस, मैंने उसे गलत जगह इस्तेमाल किया। मैंने अपनी ऊर्जा आपसे लड़ने में गँवा दी, जबकि मुझे आपके साथ मिलकर लड़ना चाहिए था।”

नीलकंठ जी ने राघव का हाथ अपने कांपते हाथों में लेकर कहा, “रिश्तों में ‘सही’ और ‘गलत’ की कोई जगह नहीं होती, राघव। वहाँ सिर्फ ‘अपनापन’ होना चाहिए। सुमित्रा सही कहती थी, मेरा झूठा अभिमान मुझे केवल अपनी नजरों में महान बना रहा था, पर मैं अपने ‘दिल के टुकड़े’, अपने ही राघव को खो रहा था।”

राघव ने झुककर पिता के हाथ को चूम लिया। “नहीं पिताजी, आज हम दोनों जीत गए। आज हमारे बीच की दीवारें गिर गई हैं।”

सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए खिड़की का पर्दा हटाया। बाहर बारिश थम चुकी थी और सुबह की पहली किरण कमरे में प्रवेश कर रही थी। वह किरण केवल प्रकाश नहीं थी, वह उस नए सवेरे का प्रतीक थी जहाँ ‘अभिमान’ की जगह ‘आत्मबोध’ ने ले ली थी।

-सीमा गुप्ता (मौलिक व स्वरचित)

साप्ताहिक विषय: #अभिमान

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