गौरव आज बहुत खुश है। खुश क्यों न हो उसे आज पहली तनख्वाह जो मिली है। वह खुशी-खुशी लगभग दौड़ता हुआ माँ के पास पहुँचा। उनको अपनी आँखें बंद करने कहा। माँ बोलीं- क्यों? मैं अभी संध्या आरती की तैयारी कर रही हूँ, मेरे पास तुम्हारे साथ खेलने के लिए समय नहीं है।
गौरव ने लाड़ दिखाते हुए कहा- ‘आँखें बंद करो न माँ ‘ सिर्फ एक बार।
मेरे पास समय नहीं है गौरव, शाम हो चुकी है, मुझे भगवान की आरती करनी है।
प्लीज माँ, एक बार, अभी तक तो आप आँख बंद भी कर चुकी होतीं।
अच्छा ले, तू नहीं बोलने से कहाँ मानने वाला है, जल्दी कर क्या करना है?
गौरव झट जेब से अपनी तनख्वाह के रूपये निकालकर माँ के हाथों में रख देता है और उन्हें आँखें खोलने कहता है। माँ आँखें खोलते ही इतने सारे रुपये देख गौरव की ओर आश्चर्य से देखती हैं, वे कुछ बोल पातीं इससे पूर्व गौरव कहता है, तुम्हारे इस नन्हे से बेटे की पहली तनख्वाह है, माँ।
आरती के समय इन रूपयों को भगवान को अर्पण कर देना और उन्हें धन्यवाद देना माँ, कि उन्होंने मुझे इस काबिल बनाया। माँ गौरव को गले लगा लेती हैं दोनों की आँखों से अश्रुधार बह निकलती है।
माँ संध्या आरती के लिए चली जाती हैं। गौरव वहीं बैठा पुरानी यादों मे खो जाता है। जब वह दो साल का था तब उसके पापा की लीवर खराब हो जाने से अचानक मृत्यु हो गई थी।
वे एक बहुत बड़ी स्टील फैक्ट्री में मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। अच्छी तनख्वाह के साथ-साथ, गाड़ी-बंगला सब सुविधाएं प्रदान की गई थी। कंपनी के मालिक को किसी पार्टी के साथ सौदा करना होता तो वे पापा की सलाह के बिना कुछ भी नहीं करते थे।
माँ ने बताया था पापा की मृत्यु के बाद कंपनी की ओर से उनको महिला होने के नाते कंपनी की लायब्रेरी मेें लाइब्रेरियन की नौकरी और पेंशन दोनों दिया गया था।
लेकिन उनके पापा यानि मेरे नाना ने उन्हें नौकरी करने से मना कर दिया और बोले हमारे परिवार की महिलाएँ नौकरी नहीं करतीं। अपने साथ हम सबको गाँव ले आए। सिर्फ दो हजार रुपये पेंशन के मिलते थे जिससे बड़ी मुश्किल से गुजारा हो पाता था।
हम चार भाई-बहन थे। मैं सबसे छोटा और भैया सबसे बड़े थे। चार साल तक हम नाना के घर पर रहे। फिर हम बड़े होने लगे तो माँ को हमारी पढ़ाई की चिंता होने लगी। उन्होंने नाना से बात करके उनके शहर वाले मकान में रहने की अनुमति लेकर हम चारों भाई-बहनों के साथ शहर में रहने लगीं।
पेंशन के पैसों से जैसे-तैसे गुजारा हो रहा था। कभी-कभी नानाजी खेत से अनाज लाकर छोड़ जाते थे। फिर मामा लोगों के साथ बँटवारे के बाद वह भी बंद हो गया। यदि नानाजी अपने पुराने ख़यालात के चलते माँ को नौकरी करने से मना नहीं करते तो हम लोगों को अभाव में जीना नहीं पड़ता।
बड़े भैया पढ़ाई के साथ-साथ
सुबह-शाम किराने की दुकान में काम करने लगे । जैसे-तैसे आठवी पास कर उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। अब पूरे समय दुकान में काम करने से अधिक पैसा मिलने लगा। हम तीनों की पढ़ाई का खर्च वे ही उठाते थे। मैं शुरू से पढ़ने में तेज था। आठवी पास होने के बाद मैं भी अखबार बाँटने का काम करने लगा जिससे मैं अपनी ट्यूशन फीस भरता था। ऐसा करते हुए मैं बारहवीं क्लास में पहुँच गया।
बारहवीं बोर्ड के परीक्षा परिणाम की घोषणा हुई प्राविण्य सूची में मेरा नाम दूसरे स्थान पर था। मुझे बोर्ड की ओर से एक लाख रूपये का चेक प्रदान किया गया।
पी.ई.टी.मेें मेरा चयन हो गया और ईनाम के रूपये से मैने इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश ले लिया और जी जान से अपनी पढ़ाई में जुट गया। मेरे सपनों को पंख जो मिल गए थे। मैं कॉलेज से आने के बाद पड़ोस में रहने वाले पांच लड़कों को गणित पढ़ाता था, जिससे मेरे बस का किराया और पुस्तक-कॉपी का खर्च निकल जाता था।
इस बीच मेरी बड़ी बहन की शादी रिश्तेदारों की मदद से हो गई। छोटी बहन भी स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। इंजीनियर की डिग्री प्राप्त कर मैं नौकरी के साक्षात्कार के लिए गया जहाँ मेरे पापा मैनेजर थे। मेरे अंकों के आधार पर तथा साक्षात्कार से संतुष्ट होकर कंपनी ने मुझे नियुक्ति दे दी।
मैं अभी बाहर निकला ही था कि पीछे से गार्ड दौड़ता हुआ आया और बोला- साहब आपको बुला रहे हैं। मैंने घबरा कर पूछा मुझे, हाँ आपको साहब बुला रहे हैं,
गार्ड ने कहा।मैं पीछे मुड़कर भारी कदमों से ऑफिस की ओर जाने लगा। मन मेें अनेक प्रकार के विचार आ रहे थे। कहीं मेरी नियुक्ति रद्द तो नहीं कर दी गई या मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई आदि
जैसे ही मैं ऑफिस के सामने पहुँचा और और अंदर आने की अनुमति माँगी उनके मुँह से निकला आ जाओ बेटा,आ जाओ। बैठो तुम रमाकान्त शर्मा के पुत्र हो न?
मैने तुम्हारी अंकसूची पर तुम्हारे पिता का नाम और तुम्हारे चेहरे को देखते ही पहचान लिया था लेकिन तुम यह न सोच बैठो कि तुम्हें नौकरी अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि पिता की पहचान से मिली है, यह सोचकर मैंने चुप रहना ही उचित समझा।
गौरव से परिवार की कुशल क्षेम पूछने के बाद उन्होंने गार्ड से काफ़ी लाने कहा। फिर गौरव से बातचीत करने लगे। वे बोले तुम्हारे पापा के जाने के बाद जो जगह खाली हुई थी,
वह जगह आज भी खाली है। मैं चाहता हूँ कि उस काम को तुम ही सम्भालो। इसके लिए कंपनी की ओर से मैं तुम्हें एम.बी.ए. करने के लिए पुणे भेजूंगा। आज मुझे यह अहसास हो रहा है कि कंपनी में जो कमी रह गई थी। अब तुम्हारे आने से पूरी हो जाएगी है।
गौरव…माँ की आवाज सुनकर मेरी तंद्रा टूटी, मैं हड़बड़ाया। माँ बोलीं- क्या हुआ बेटा?
कुछ नहीं माँ पुरानी यादों में खो गया था। उसने माँ को कंपनी के मालिक के साथ हुई बातें बताई। माँ बहुत खुश हुईं ईश्वर को धन्यवाद दिया और गौरव को गले लगाते हुए बुदबुदाई मेरे बच्चे ही तो मेरा “अभिमान” हैं।
एक वर्ष पश्चात छोटी बहन की शादी बड़े ही धूमधाम से हो गई। अब माँ अपने दोनों बेटों के लिए सुयोग्य बहू की तलाश में जुट गई हैं।
लेखिका:- साधना वैष्णव
कहानी स्वरचित है।