अपराधबोध – उमा वर्मा

मै अनुज अस्पताल के बेड पर पड़ा हुआ हूँ ।डाक्टर ने जवाब दे दिया है ।कैन्सर का आखिरी सटेज है ।डाक्टर ने कहा है कि अपने नजदीकी से मिलने के लिए ।मेरे पास समय बहुत कम रह गया है ।मेरे पास अब है ही कौन?  सारे रिश्ते मैंने बहुत पहले खो दिया है ।माता पिता बहुत पहले ही नहीं रहे।

नलिनी मेरी पत्नी—वह भी तो बहुत दूर हो गई है मुझसे ।शायद मैंने ही दूर कर दिया था उसे ।बहुत सुन्दर और शिक्षित थी नलिनी ।मैने उसे एक बार कहा कि नलिनी जरा लम्बा लगता है तो मै नीलू ही कहूँगा ।वह खुश होकर मान गयी।एक पत्नी को जैसा होना चाहिए नीलू बिलकुल वैसे ही थी।सुन्दर,शिक्षित, परिवार के साथ समर्पित ।

उसका कोई दोष नहीं था।गलती मेरे तरफ से थी।मैंने उससे शादी की थी अपने माता पिता की मर्जी से ।वह मेरे पिता के करीबी मित्र की बेटी थी।लेकिन मेरा मन तो मेरे साथ काम करने वाली अंशिका से बंधा हुआ था ।माँ जानती थी कि शादी हो जायेगी तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा ।एक ओर नीलू बेहद सीधी सादी ।

साधारण रहन सहन, आज्ञाकारी बहू और मै फैशन पर ध्यान देने वाला ।मुझे रोज अच्छे कपड़े पहनकर घूमने का शौक था ।मै सजी धजी माडर्न कन्या के साथ होटलों में पार्टी करना पसंद करता था ।मुझे ड्रिंक का भी शौक रहा ।जिसे नीलू एकदम पसंद नहीं करती।

वह मेरे माता पिता के लिए आदर्श बहू थी।हम दोनों एक दूसरे के उलट थे।कभी कभी इस बात को लेकर हमारी बकझक होती ।उसे आधी रात बाहर रहना, ड्रिंक करना अच्छा नहीं लगता ।नतीजा यह हुआ कि अंशिका मेरे करीब आते गई और नीलू दूर होती गई ।

मैंने उसे साफ कह दिया कि साथ रहना लाचारी है ।मैंने माता पिता के मन रखने के चलते तुम से शादी की है।सारे सुख है तुम्हारे पास ।अच्छा खाओ पिओ ।अच्छा पहनो।जो मन वह करो।बस मुझे छोड़ दो।मै आजाद होना चाहता हूँ ।और उसने मुझे आजाद कर दिया अपने दिल से ।

लेकिन मेरे माता पिता के सेवा में कोई कमी नहीं होती ।उस रात वह बहुत रोयी ।लेकिन मै नहीं पसीजा ।मै रोज आधी रात को घर से निकल जाता ।जहां अंशिका मेरा इन्तजार करती ।माँ ने मुझे बहुत समझाया, पर मेरे उपर तो प्रेम का भूत सवार था।

मुझे सिर्फ अंशिका ही नजर आती ।माँ नीलू को देखकर दुखी होती।चिंता में घुलती माँ बीमार रहने लगी और एकदिन संसार से विदा हो गई ।नीलू पर घर के साथ पिता जी की जिम्मेदारी आ गयी ।उसका मन नहीं लगता था तो एकदिन पिता जी से आज्ञा लेकर नौकरी ज्वाइन कर लिया ।

स्कूल में पढ़ाने लगी थी ।सुबह सात बजे जाती और एक बजे आकर खाना बना देती ।पिता जी को खिलाती ।मै अब अधिकतर बाहर ही रहने लगा था ।मेरा खाना अंशिका के साथ आफिस में होता ।माँ के नहीं रहने पर पिता जी चुप रहने लगे थे ।छःमहीने के बाद एक रात सोये तो फिर उठे ही नहीं ।

पिता जी के लिए बेटा होने का फर्ज निभाया और हमेशा के लिए चला गया घर से।यह भी नहीं सोचा था कि नीलू अकेले कैसे रहेगी ।मै उसे लगभग भूल गया ।और अपनी रंगीन दुनिया में रंगीन सपने सजाने लगा ।बहुत फैशनेबल थी अंशिका ।खूब टाइट कपड़े पहनकर बाहर निकल जाती तो और भी आकर्षक लगती ।

हाथ में हाथ डाले जब हम निकलते तो मै अपने को बहुत काबिल समझता।हम दोनों की कमाई अच्छी थी।लेकिन रोज बाहर खाना, बाहर घूमना ,रोज शापिंग करना हमारी प्राथमिकता थी।अधिक ड्रिंक करता तो वह भी मेरा साथ देती ।मुझे यही तो चाहिए था।आखिर पैसा कितना टिकता?

एकदिन मना कर दिया तो बिफर गई ।बोली मै ऐसी ही जिंदगी जीती रही हूँ ।मुझे मना मत करो ।अब रोज रोज पीने से मेरे पेट में दर्द रहने लगा।अंशिका को बताया तो उसने कहा ऐसा होता है कभी-कभी ।चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा ।फिर मै अपने दर्द को टालता रहा ।दस साल बीत गया ।

मेरे पास पैसे खत्म हो रहे थे ।खर्च पर लगाम लगाने के कहता तो लड़ाई होती  हमारी ।मै अपने दर्द से परेशान सिर्फ आफिस जाता और घर आकर लेट जाता ।उसके ही घर में रहने लगा था मै।भूल ही गया था कि मै शादी शुदा हूँ और मेरी एक पत्नी नीलू भी है।मै घर आता तो तुरंत अंशिका बनठन कर बाहर निकल जाती ।

मै पूछताछ करता तो जवाब सुना देती कि मै तुमहारी बीवी नहीं हूँ जो कंट्रोल में रहूँ ।मुझे उसके रंग ढंग ठीक नहीं लगते।मेरी बीमारी बढ़ती गई ।डाक्टर ने कैन्सर बताया ।एक तरह से हम लिव इन रिलेशनशिप में थे।मुहल्ले के लिए हम बदनाम थे।किसी से मिलना जुलना नहीं था।हमारे बालों में सफेदी आने लगी थी ।

लेकिन अंशिका अब भी मेक अप में जवान दिखती ।मै बीमार लाचार हो कर नौकरी कर रहा था।लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था ।आफिस में बाॅस ने कहा कि अब मुझे वालंटरी रिटायरमेंट ले लेना चाहिए कयोंकि मै ठीक से काम नहीं कर पा रहा था ।

मैंने नौकरी छोड़ दी ।आफिस से मिले पैसे को बैंक में फिक्स कर दिया ।सूद से हर महीने पैसे लाता तो खाना खर्च चलता ।अंशिका को खाना बनाना पसंद नहीं था।वह रोज होटल जाती खुद खाकर मेरे लिए भी साधारण रोटी सब्जी ला देती ।अधिक तेल और मिर्च मसाला वाली सब्जी से पेट का जलन बढ़ता गया तो अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ गई ।

अंशिका ने भर्ती करा दिया ।लेकिन दो चार दिन के बाद ही गायब हो गई ।मैंने फोन किया तो कहा कि ऐसे बीमार के साथ जीवन नहीं बिता सकती।मैंने तुम को आजाद कर दिया है ।मै दूसरे शहर जा रही हूँ ।मत खोजना मुझे ।यह कैसी आजादी मिली थी मुझे ।

शायद नीलू को मैंने जो आजादी दी थी उसी का  प्रतिफल मिल रहा था मुझे ।मेरी सुनने के लिए ईश्वर भी साथ नहीं थे।मुझे मेरा अपराध बोध कचोटता था।मैंने अपनी पत्नी के साथ बहुत गलत किया था ।मै बहुत कमजोर हो गया था ।हालत बिगड़ रही थी ।

डाक्टर ने कहा कि किसी अपने को बुला लूं ।किसे बुलाता और किस मुंह से बुलाता ।फिर मैंने सिस्टर को नीलू के बारे में बताया और घर का पता दिया ।सिस्टर ने शायद पता लगा  लिया है ।सामने से मेरी नलिनी आ रही है ।आ गई वह ।उसने मेरे कमजोर हाथ थाम लिया है “कैसी हालत बना लिया है आपने?

यह क्या हो गया है आपको?वह फूट फूट कर रोने लगी ।”नीलू,मै तुमहारा अपराधी हूँ ।बहुत कष्ट दिया है तुम को।इस अपराध बोध से मै तिल तिल कर मरने के लिए आ गया हूँ “मुझे हो सके तो माफ कर देना ।नीलू सिसकती रही ।वह मेरे सीने से लग गई ।

न जाने किस मिट्टी की बनी थी वह ।इतना तकलीफ सहकर भी मोम सा पिघल रही है ।मेरी आखों के आगे अंधेरा छा रहा है ।बहुत जोर की प्यास लगी है ।उसने पानी लाकर होठों से लगा दिया ।असीम तृप्ति मिल रही है ।शायद मेरा आखिरी समय आ गया है ।

कानों में आवाज़ गूंजने लगी “डाक्टर,चार नम्बर बेड पर पेशेंट की हालत खराब हो रही है ।मुझे नीलू ने अपनी बाहों में थाम लिया है “मै हूँ ना आपके साथ “—और अब सबकुछ विस्मृत हो रहा है—ओम शांति—!अनुज का अपराध बोध खत्म और शान्त हो जाता है ।—

उमा वर्मा ।नोयेडा ।स्वरचित ।

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