नंदिनी सुबह के चार बजे से ही उठकर घर के कामों में जुट जाती थी। रसोई से बर्तन खटकने की हल्की सी आवाज भी आती, तो उसे डर लगता कि कहीं उसकी सौतेली भाभी सुलेखा की नींद न टूट जाए। अगर सुलेखा की नींद टूट गई, तो नंदिनी का पूरा दिन तानों और गालियों के साये में गुजरेगा।
नंदिनी के पिता, अभय प्रताप जी के देहांत को अभी दो ही साल हुए थे, लेकिन नंदिनी के लिए ये दो साल दो सदियों के बराबर थे। अभय प्रताप जी के जाने के बाद इस घर में नंदिनी का वजूद एक अवांछित मेहमान या मुफ्त की नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं रह गया था।
घर का मालिक अब उसका सौतेला बड़ा भाई, रमन था। रमन अभय प्रताप जी की पहली पत्नी का बेटा था, जबकि नंदिनी उनकी दूसरी पत्नी की संतान थी। पिता के जीते जी रमन और सुलेखा ने हमेशा दिखावा किया कि वे नंदिनी का ख्याल रखेंगे, लेकिन पिता के आंख मूंदते ही उनके असली चेहरे सामने आ गए।
नंदिनी स्वभाव से जितनी शांत और सुशील थी, ईश्वर ने उसे रूप भी उतना ही सलोना दिया था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें और सादगी भरा निखार किसी को भी अपनी ओर खींच लेता था। लेकिन यही खूबसूरती उसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई थी। सुलेखा को नंदिनी की इसी सुंदरता से चिढ़ थी।
उसे हमेशा यह असुरक्षा सताती थी कि कहीं नंदिनी की वजह से समाज में रमन की बदनामी न हो जाए, या कोई नंदिनी की खूबसूरती पर मोहित होकर उनके घर की संपत्ति में हिस्सा न मांग ले। नंदिनी को अपने पांच साल के भतीजे, कबीर से बहुत लगाव था। कबीर भी अपनी बुआ के बिना नहीं रह पाता था, लेकिन सुलेखा ने साफ हिदायत दे रखी थी कि नंदिनी उसके बेटे के आस-पास भी न फटके।
“दूर रहो मेरे बच्चे से, न जाने कौन सी मनहूसियत लेकर आई है इस घर में। इसके साये से भी मेरे बेटे को नजर लग जाएगी,” सुलेखा अक्सर कबीर को नंदिनी की गोद से छीनते हुए यही जहर उगलती थी। नंदिनी खून का घूंट पीकर रह जाती, क्योंकि उसके पास जाने के लिए कोई और छत नहीं थी।
अभय प्रताप जी अपने अंतिम दिनों में बहुत चिंतित रहते थे। वे जानते थे कि रमन कभी नंदिनी को अपनी सगी बहन का दर्जा नहीं देगा। उन्होंने नंदिनी को अच्छी शिक्षा दिलाई थी, वह स्नातकोत्तर (पोस्ट-ग्रेजुएट) कर चुकी थी। अभय प्रताप जी की अंतिम इच्छा यही थी कि नंदिनी जल्द से जल्द कोई अच्छी नौकरी ढूंढ ले और अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, ताकि उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन उनके जाने के बाद नंदिनी के लिए दुनिया की असलियत बहुत भयानक निकली।
नौकरी पाना नंदिनी के लिए लोहे के चने चबाने जैसा था। उसकी डिग्रियां और उसकी योग्यता अक्सर दफ्तरों की फाइलों में ही दबी रह जाती थीं। जब भी वह किसी इंटरव्यू के लिए जाती, तो वहां बैठे अधिकारियों की नजरें उसके रिज्यूमे पर कम और उसके चेहरे और जिस्म पर ज्यादा होती थीं। कई बार तो उसे साफ शब्दों में ऐसी ‘शर्तों’ का इशारा किया गया, जिन्हें सुनकर किसी भी शरीफ लड़की की रूह कांप जाए। एक बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस में तो मैनेजर ने सीधे तौर पर कह दिया था कि “मैडम, क्वालिफिकेशन तो ठीक है, लेकिन हमारी रिसेप्शनिस्ट को ‘क्लाइंट्स को खुश’ रखना भी आना चाहिए।” नंदिनी उस दिन रोते हुए वहां से भागी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या एक सुंदर और बेसहारा लड़की का इस समाज में सम्मान के साथ जीना नामुमकिन है? उसने अपने लिए बहुत छोटे और साधारण सपने देखे थे—एक ऐसा घर हो जहां उसे प्यार मिले, एक समझदार जीवनसाथी हो जो उसकी इज्जत करे, और छोटे-छोटे बच्चे हों जिन्हें वह अपना सारा प्यार दे सके। लेकिन फिलहाल ये सपने कांच के टुकड़ों की तरह बिखरे हुए थे।
दिन बीतते जा रहे थे और सुलेखा का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। रमन सुबह दुकान चला जाता और रात को लौटकर सिर्फ खाना खाकर सो जाता। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उसकी बहन किस हाल में है। एक दिन हद तो तब हो गई जब सुलेखा ने नंदिनी के लिए एक रिश्ता खोज निकाला। वह आदमी कोई और नहीं, बल्कि सुलेखा के मायके के गांव का एक पैंतालीस साल का अधेड़ ठेकेदार, गजेन्द्र था। गजेन्द्र की पहली पत्नी उसे छोड़कर भाग गई थी और अब वह अपने पैसों के रौब पर एक सुंदर और कम उम्र की लड़की खरीदना चाहता था। गजेन्द्र ने सुलेखा को एक अच्छी-खासी रकम का लालच दिया था। जब यह बात रमन के सामने आई, तो उसने भी बिना किसी विरोध के हामी भर दी। आखिर उनके लिए नंदिनी एक ऐसा बोझ थी, जिसे वे जल्द से जल्द अपने कंधों से उतारना चाहते थे।
“देख नंदिनी, गजेन्द्र जी बहुत पैसे वाले हैं। तू वहां रानी बनकर रहेगी। वैसे भी तेरे लिए कोई राजकुमार तो आने से रहा। कल वे लोग तुझे देखने आ रहे हैं, ढंग से तैयार हो जाना,” सुलेखा ने फरमान सुना दिया।
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने रमन के आगे हाथ जोड़े, रोई, गिड़गिड़ाई। “भैया, वह आदमी उम्र में मेरे पिता के बराबर है। आप मुझे ऐसे कैसे बेच सकते हैं? मैं जीवन भर आपके घर की नौकरानी बनकर रह लूंगी, मुझे दो रोटी कम दे देना, लेकिन मेरी जिंदगी इस तरह नर्क में मत धकेलिए।”
रमन ने झिड़कते हुए कहा, “ज्यादा ड्रामा मत कर। पिताजी तेरे लिए कोई खजाना छोड़कर नहीं गए हैं। जो मिल रहा है, चुपचाप सिर झुकाकर कर ले, वरना इस घर के दरवाजे तेरे लिए आज ही बंद हैं।”
उस रात नंदिनी एक पल के लिए भी नहीं सोई। पिता की तस्वीर सीने से लगाए वह सारी रात रोती रही। लेकिन जैसे-जैसे सुबह की किरणें फूट रही थीं, नंदिनी के आंसुओं ने एक दृढ़ निश्चय का रूप ले लिया। उसने तय कर लिया कि वह किसी भी कीमत पर गजेन्द्र जैसे इंसान के हाथों अपनी जिंदगी नीलाम नहीं होने देगी। उसे अपने पिता की बात याद आई—”बेटी, आत्मसम्मान से बड़ा कोई गहना नहीं होता।”
अगली सुबह, जब सुलेखा गजेन्द्र के स्वागत की तैयारियों में लगी थी, नंदिनी ने चुपचाप अपने कपड़ों का एक छोटा सा बैग तैयार किया। उसने घर के मंदिर में हाथ जोड़े और बिना किसी को बताए घर की दहलीज हमेशा के लिए पार कर ली। उसे नहीं पता था कि वह कहां जाएगी, लेकिन वह इतना जानती थी कि अब वह पीछे मुड़कर नहीं देखेगी।
सड़कों पर भटकते हुए उसे एक परिचित का ख्याल आया, जो एक महिला आश्रम (वर्किंग विमेंस हॉस्टल) चलाती थीं। नंदिनी वहां पहुंची और अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने तरस खाकर नंदिनी को कुछ दिनों के लिए वहां रहने की जगह दे दी। अब नंदिनी के लिए करो या मरो की स्थिति थी। उसने अगले ही दिन से अखबारों में छपे हर विज्ञापन पर जाना शुरू कर दिया। उसे अब कॉर्पोरेट ऑफिसों से डर लगने लगा था, इसलिए उसने अपना रुख स्कूलों की तरफ मोड़ा।
किस्मत ने उसका साथ दिया और उसे शहर के एक प्रतिष्ठित ‘ज्ञान कुंज विद्यापीठ’ में शिक्षिका के पद के लिए इंटरव्यू का मौका मिला। इस स्कूल के संचालक एक बेहद सुलझे हुए और आदर्शवादी इंसान थे, जिनका नाम देवव्रत था। देवव्रत की उम्र पैंतीस वर्ष थी। उनकी पत्नी का कुछ साल पहले एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था और उनकी एक छोटी सी बेटी थी, मिष्टी।
जब नंदिनी इंटरव्यू के लिए देवव्रत और स्कूल की प्रिंसिपल के सामने बैठी, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सा डर और हिचकिचाहट थी। लेकिन देवव्रत ने उसकी खूबसूरती को नहीं, बल्कि उसकी डिग्रियों और उसके बात करने के सलीके को परखा। नंदिनी के उत्तरों में जो गहराई और बच्चों के प्रति जो संवेदनशीलता थी, उसने देवव्रत को बहुत प्रभावित किया।
“नंदिनी जी, आपकी योग्यता हमारे स्कूल के लिए बहुत उपयुक्त है। आप कल से ही प्राइमरी क्लासेस के लिए जॉइन कर सकती हैं,” देवव्रत ने सम्मानपूर्वक कहा।
नंदिनी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। यह पहली बार था जब किसी पुरुष ने उसकी आंखों में सम्मान और उसकी प्रतिभा में विश्वास देखा था। नंदिनी ने खुशी के आंसुओं के साथ वह नौकरी स्वीकार कर ली।
स्कूल में नंदिनी ने अपनी पूरी लगन से पढ़ाना शुरू किया। वह बच्चों के साथ बच्ची बन जाती। इसी दौरान उसकी मुलाकात मिष्टी से हुई। मिष्टी अपनी मां के गुजर जाने के बाद बहुत गुमसुम रहने लगी थी। लेकिन नंदिनी के मातृत्व से भरे स्पर्श और प्यार ने मिष्टी के मुरझाए हुए चेहरे पर फिर से मुस्कान ला दी। नंदिनी मिष्टी को अपनी बेटी की तरह प्यार करने लगी। वह उसके साथ टिफिन खाती, उसे कहानियां सुनाती और उसके बाल संवारती।
देवव्रत यह सब चुपचाप देखा करते थे। उन्होंने महसूस किया कि नंदिनी के रूप से कहीं ज्यादा सुंदर उसकी आत्मा है। जिस घर में मिष्टी की हंसी गूंजनी बंद हो गई थी, वहां नंदिनी के स्कूल आने मात्र से एक नई ऊर्जा का संचार होने लगा था। देवव्रत के मन में नंदिनी के प्रति एक गहरा आदर और आकर्षण पैदा होने लगा। उन्हें नंदिनी के अतीत के बारे में हॉस्टल वॉर्डन से पता चल चुका था। उन्होंने नंदिनी के संघर्ष और उसकी हिम्मत को सलाम किया।
एक साल बीत गया। नंदिनी अब पूरी तरह से आत्मनिर्भर थी। उसका आत्मविश्वास लौट आया था। एक शाम, स्कूल की छुट्टी के बाद देवव्रत ने नंदिनी को अपने ऑफिस में रोका।
“नंदिनी जी,” देवव्रत ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ शुरुआत की, “मैंने पिछले एक साल में आपको सिर्फ एक बेहतरीन शिक्षिका के रूप में नहीं, बल्कि एक बेहद कोमल और मजबूत इंसान के रूप में देखा है। मिष्टी को जो मां का प्यार आपने दिया है, वह कोई और नहीं दे सकता। मैं जानता हूं कि आपने जीवन में बहुत दुख सहे हैं। अगर आप इजाजत दें, तो क्या मैं आपके इस संघर्ष के सफर में आपका जीवनसाथी बन सकता हूं? मैं आपसे यह वादा करता हूं कि मेरे घर में आपको हमेशा वह सम्मान और प्यार मिलेगा, जिसकी आप हकदार हैं।”
नंदिनी स्तब्ध रह गई। जिस जीवनसाथी और परिवार का सपना उसने हमेशा देखा था, वह आज पूरे सम्मान के साथ उसके सामने खड़ा था। देवव्रत की आंखों में कोई हवस या लालच नहीं था, बल्कि एक सच्चा समर्पण था। नंदिनी की आंखों से आंसू छलक पड़े और उसने सिर झुकाकर देवव्रत के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
कुछ ही दिनों में, देवव्रत और नंदिनी विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए। नंदिनी जब विदा होकर देवव्रत के घर पहुंची, तो मिष्टी ने दौड़कर उसे गले लगा लिया और पहली बार उसे “मां” कहकर पुकारा। नंदिनी को लगा जैसे उसे दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो। उसके वे कांच के सपने, जिन्हें रमन और सुलेखा ने कुचलने की कोशिश की थी, आज एक खूबसूरत हकीकत बन चुके थे। खूबसूरती उसके लिए अभिशाप नहीं, बल्कि उसके अच्छे कर्मों और पवित्र आत्मा का एक दर्पण बन गई थी।
उधर, रमन और सुलेखा का व्यापार घाटे में चला गया और गजेन्द्र ने उन्हें पैसों के लिए पुलिस थाने तक घसीट लिया। कर्मों का फल उन्हें यहीं भुगतना पड़ रहा था। लेकिन नंदिनी इन सबसे दूर, अपने नए परिवार के साथ एक खुशहाल और सम्मानजनक जीवन जी रही थी। उसने साबित कर दिया था कि अगर एक बेसहारा लड़की अपनी हिम्मत और चरित्र पर अड़ी रहे, तो ईश्वर भी उसके लिए नए और खूबसूरत रास्ते खोल देता है।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या समाज में अकेली और सुंदर लड़की को हमेशा संदेह और गलत नजर से ही देखा जाता है? नंदिनी के संघर्ष पर आपके क्या विचार हैं? अपने अमूल्य विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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लेखिका : आर्या विनोद