आज़ादी – विविकता

“अरे बहन जी! आजकल की बहुओं की तो किस्मत खुल गई। हमारे ज़माने में तो बस चाकरी और ससुराल वालों के ताने थे; सुबह से रात हो जाती थी और हमारा काम खत्म नहीं होता था—अपनी मर्ज़ी से तो कुछ कर ही नहीं सकते थे।” पूनम ने पड़ोसन कमला से कहा।

“सौ आने सच कह रही हैं आप बहन जी! हमारे समय में तो ज़ुबान खोली कि कयामत आई। पलटकर जवाब देना तो दूर, आँख उठाकर देखना भी पाप था। आजकल की लड़कियों को तो पर लग गए हैं, बड़ी आज़ादी मिली हुई है इन्हें! दफ़्तर जाने के नाम पर घर के कामों से साफ़ पल्ला झाड़ लेती हैं। दिन भर बाहर घूमो-फिरो, कोई टोकने वाला नहीं,” कमला ने ठंडी आह भरकर कहा।

तभी बहू नेहा रसोई से पसीना पोंछते हुए बाहर निकली—

“मम्मी जी! नाश्ता बना दिया है, दोपहर का खाना भी हो गया। राहुल का और मेरा टिफिन पैक करके रख दिया है। शाम की सब्जी भी काट कर रख दी है—बस दफ़्तर से आकर रोटी बना दूँगी।”

“ठीक है,” पूनम ने बिना मुड़े कहा।

नेहा ने बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ बढ़ी।

“बेटा!”

नेहा ठिठक गई।

“सिर पर घूँघट लेकर निकलो—मोहल्ले में हमारी भी कुछ इज़्ज़त है।”

नेहा ने चुपचाप दुपट्टा सिर पर रखा और निकल गई।

समाप्त 

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