**एक अधूरी तस्वीर: दर्द और प्यार का सफर** – मीरा महेश

काव्या ने अपनी माँ, नंदिनी को सिर्फ दीवारों पर टंगी उन बेजान तस्वीरों में ही देखा था। उन तस्वीरों में नंदिनी की आँखें इतनी जीवंत लगती थीं, मानो वो अभी तस्वीर से बाहर आकर काव्या को गले लगा लेंगी। काव्या के लिए उसकी माँ किसी परीकथा की उस रानी जैसी थी,

जिसके किस्से उसने अपनी बुआ, सुमित्रा से बचपन से सुने थे। घर का कोना-कोना आज भी नंदिनी की पसंद की गवाही देता था। ड्राइंग रूम में रखे कुशन के कवर से लेकर, बगीचे में खिले गुलाबों की क्यारियों तक, सब कुछ नंदिनी के हाथों का सहेजा हुआ था।

सुमित्रा बुआ अक्सर बताती थीं कि जब नंदिनी इस घर में ब्याह कर आई थी, तो जैसे इस निर्जीव ईंट-पत्थर के मकान में जान आ गई थी। वो सिर्फ एक पत्नी या बहू नहीं थी, बल्कि इस घर की धड़कन थी। 

नंदिनी में एक अजीब सा जादू था। वो रूठों को मनाना जानती थी, उदास चेहरों पर मुस्कान लाना जानती थी। रिश्तों को कैसे मोतियों की तरह एक धागे में पिरो कर रखा जाता है, कोई नंदिनी से सीखे। और काव्या के पिता, विक्रम… उनके लिए तो नंदिनी ही उनकी पूरी दुनिया थी। विक्रम एक शांत स्वभाव के इंसान थे,

लेकिन नंदिनी की चुलबुली बातों पर उनकी ठहाके मारकर हंसने की आदत पूरे मोहल्ले में मशहूर थी। बुआ बताती थीं कि विक्रम, नंदिनी को पलकों पर बिठा कर रखते थे। अगर नंदिनी को हल्का सा बुखार भी आ जाए, तो विक्रम पूरे घर सिर पर उठा लेते थे। दोनों का प्यार ऐसा था कि लोग उनकी मिसालें दिया करते थे।

लेकिन कहते हैं न, कि हद से ज्यादा खुशियों को अक्सर किसी न किसी की नज़र लग ही जाती है। शादी के सात साल बीत जाने के बाद भी जब नंदिनी की सूनी गोद नहीं भरी, तो समाज की तानेबाज़ी शुरू हो गई। नंदिनी अंदर ही अंदर घुटने लगी थी। हालाँकि, विक्रम ने कभी उसे इस बात का अहसास नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा यही कहा कि उन्हें सिर्फ नंदिनी चाहिए, और कोई नहीं। लेकिन एक औरत का मातृत्व जब जागता है, तो वो किसी भी हद तक जा सकती है। बहुत पूजा-पाठ, मन्नतों और डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद, वो खुशी का दिन आया जब नंदिनी ने विक्रम को अपने माँ बनने की खबर दी। उस दिन विक्रम ने पूरे मोहल्ले में मिठाइयाँ बांटी थीं। वो नंदिनी का ऐसे ख्याल रखते थे जैसे कोई कांच की गुड़िया हो। 

पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। गर्भावस्था के आखिरी महीनों में नंदिनी की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि माँ या बच्चे में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है। विक्रम ने बिना एक पल सोचे डॉक्टरों से चीखकर कहा था कि उन्हें बच्चा नहीं चाहिए, उन्हें सिर्फ अपनी नंदिनी चाहिए। लेकिन नंदिनी ने विक्रम से वो वादा ले लिया था जो विक्रम कभी खुशी से नहीं देना चाहते थे। नंदिनी ने ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले विक्रम का हाथ पकड़कर कहा था, “मेरे अंश को दुनिया में आने से मत रोकना विक्रम। ये मेरी आखिरी निशानी होगी।”

और वही हुआ। काव्या ने इस दुनिया में अपनी पहली सांस ली और उसी पल नंदिनी ने अपनी आखिरी सांस छोड़ दी। उस एक पल ने विक्रम की पूरी दुनिया उजाड़ कर रख दी। जिस घर में कभी नंदिनी की हंसी गूंजती थी, वहाँ एक खौफनाक सन्नाटा पसर गया। विक्रम अंदर से पूरी तरह टूट चुके थे। 

काव्या के जन्म के बाद, विक्रम ने खुद को एक ऐसे खोल में बंद कर लिया जिसकी चाबी उन्होंने हमेशा के लिए फेंक दी थी। उन्होंने काव्या की हर आर्थिक ज़रूरत पूरी की, उसे बेहतरीन स्कूल में भेजा, उसके लिए अच्छे कपड़े, खिलौने सब लाए, लेकिन जो एक चीज़ काव्या को सबसे ज्यादा चाहिए थी—अपने पिता का प्यार, वो उसे कभी नहीं मिला। विक्रम काव्या को देखते ही उस दर्दनाक रात में पहुँच जाते थे। उनकी आँखों में काव्या के लिए प्यार की जगह एक अजीब सी शून्यता और कहीं न कहीं एक छिपा हुआ क्रोध नज़र आता था। वे अनजाने में ही सही, लेकिन काव्या को ही नंदिनी की मौत का ज़िम्मेदार मान बैठे थे। उनका मानना था कि अगर काव्या नहीं आती, तो उनकी नंदिनी आज उनके साथ होती।

सुमित्रा बुआ ने ही काव्या को एक माँ की तरह पाला। बुआ ने विक्रम को कई बार समझाने की कोशिश की, “विक्रम, इसमें इस बच्ची का क्या कसूर है? ये तो नंदिनी का ही हिस्सा है। तू नंदिनी की आखिरी निशानी के साथ ऐसा कैसे कर सकता है?” लेकिन विक्रम पर किसी बात का असर नहीं होता था। वो अपने काम में इस कदर डूब गए थे कि घर सिर्फ सोने के लिए आते थे। 

काव्या जैसे-जैसे बड़ी हो रही थी, वो अपने पिता की इस खामोशी और दूरी को शिद्दत से महसूस करने लगी थी। बचपन में वो स्कूल से आकर अपने पिता को दौड़कर गले लगाना चाहती थी, लेकिन विक्रम उसे सिर्फ दूर से एक फीकी मुस्कान देकर अपने कमरे में चले जाते थे। काव्या ने पिता का ध्यान खींचने के लिए हर कोशिश की। वो अपनी क्लास में टॉप करती, पेंटिंग प्रतियोगिताओं में मेडल जीत कर लाती और घंटों दरवाज़े पर खड़ी रहकर विक्रम के लौटने का इंतज़ार करती। जब विक्रम आते, तो वो अपनी ट्रॉफी उनके सामने रखती, इस उम्मीद में कि शायद आज उसके पिता उसके सिर पर हाथ फेरेंगे, शायद आज वो कहेंगे, “मुझे तुम पर गर्व है बेटा।” लेकिन विक्रम बस एक सरसरी निगाह डालते और “शाबाश” कहकर आगे बढ़ जाते। उनकी ये बेरुखी काव्या के कोमल दिल पर हर रोज़ गहरे घाव कर रही थी।

काव्या को लगता था कि शायद उसमें ही कोई कमी है। वो अक्सर रात को नंदिनी की तस्वीर के सामने रोती और पूछती, “माँ, आप मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गईं? पापा मुझसे नफरत क्यों करते हैं? क्या मेरा पैदा होना इतनी बड़ी गलती थी?” सुमित्रा बुआ दरवाज़े के पीछे से काव्या को रोता हुआ सुनतीं और अपने आंसू पोंछ लेतीं। वो जानती थीं कि विक्रम पत्थर नहीं हैं, बस उनका दर्द इतना गहरा है कि वो प्यार करना भूल गए हैं।

वक्त अपनी रफ्तार से बीतता गया। काव्या अब अठारह साल की हो चुकी थी। वो बिल्कुल अपनी माँ नंदिनी की तरह दिखती थी। वही बड़ी-बड़ी आँखें, वही घुंघराले बाल और वही कला से प्यार। काव्या ने फाइन आर्ट्स के कॉलेज में दाखिला लिया था और अब वो एक बेहतरीन चित्रकार बन चुकी थी। कॉलेज के अंतिम वर्ष में, एक बड़ी कला प्रदर्शनी (Art Exhibition) का आयोजन होने जा रहा था, जिसमें शहर के बड़े-बड़े लोग आने वाले थे। काव्या को भी इस प्रदर्शनी में अपनी पेंटिंग्स लगाने का मौका मिला था।

प्रदर्शनी से एक महीने पहले, सुमित्रा बुआ ने काव्या को एक पुरानी डायरी दी। यह नंदिनी की डायरी थी, जो उसने काव्या के जन्म से पहले लिखी थी। बुआ ने कहा, “ये तेरी माँ की आखिरी अमानत है बेटा। मैंने इसे आज के दिन के लिए ही संभाल कर रखा था।” 

काव्या ने कांपते हाथों से उस डायरी को खोला। पन्नों पर नंदिनी की लिखाई देखकर उसकी आँखें भर आईं। डायरी के आखिरी पन्ने पर नंदिनी ने विक्रम के लिए एक खत लिखा था। काव्या ने जब वो खत पढ़ा, तो वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसे समझ आ गया कि उसे अपने पिता के दिल की उस जमी हुई बर्फ को कैसे पिघलाना है। उसने अपनी प्रदर्शनी के लिए एक ऐसा मास्टरपीस बनाने का फैसला किया जो उसके पिता की रूह तक उतर जाए।

प्रदर्शनी वाले दिन, काव्या ने विक्रम की टेबल पर एक इनविटेशन कार्ड और एक लाल गुलाब रखा—ठीक वैसे ही जैसे नंदिनी रखा करती थी। विक्रम ने जब वो गुलाब देखा, तो उनके हाथ ठिठक गए। शाम को, जब प्रदर्शनी शुरू हुई, काव्या की आँखें दरवाज़े पर ही टिकी थीं। उसे लगा था कि हर बार की तरह विक्रम इस बार भी उसके किसी खास मौके पर नहीं आएंगे। लेकिन तभी, भीड़ को चीरते हुए विक्रम वहां दाखिल हुए। उनके चेहरे पर वही पुरानी गंभीरता थी, लेकिन आज उनकी आँखों में एक अजीब सी उलझन थी।

काव्या उन्हें लेकर अपनी गैलरी की तरफ गई। वहां कई खूबसूरत पेंटिंग्स थीं, लेकिन हॉल के बिल्कुल बीचों-बीच एक बहुत बड़ी पेंटिंग सफेद कपड़े से ढकी हुई थी। काव्या ने विक्रम को उस पेंटिंग के सामने खड़ा किया और धीरे से वो कपड़ा हटा दिया।

पेंटिंग देखते ही विक्रम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनकी सांसें जैसे गले में अटक गईं। वो पेंटिंग किसी और की नहीं, बल्कि विक्रम और नंदिनी की थी। लेकिन उस तस्वीर में एक खास बात थी। तस्वीर में विक्रम एक कुर्सी पर बैठे थे, उनके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी, और नंदिनी उनके पीछे खड़ी होकर उनके कंधे पर सिर रखे हुए थी। और सबसे बड़ी बात—विक्रम की गोद में एक छोटी सी बच्ची थी, जिसे विक्रम बहुत प्यार से चूम रहे थे। वह बच्ची काव्या थी। यह वो हसीन सपना था जो विक्रम ने कभी नंदिनी के साथ देखा था, लेकिन जो हकीकत में कभी पूरा नहीं हो पाया। 

पेंटिंग के ठीक नीचे, कैनवास पर ही नंदिनी की डायरी का वो आखिरी पन्ना हूबहू पेंट किया गया था। विक्रम की नज़रें उन शब्दों पर पड़ीं:

*”मेरे प्यारे विक्रम, मुझे पता है कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो तुम टूट जाओगे। तुम खुद को अंधेरे में धकेल दोगे। लेकिन मेरी जान, याद रखना कि वो बच्चा सिर्फ मेरा नहीं, हम दोनों के प्यार की निशानी है। वो मेरी आखिरी सांस है जो उसके रूप में ज़िंदा रहेगी। अगर मैं न रहूं, तो उससे मुंह मत मोड़ना। क्योंकि जब तुम उसे गले लगाओगे, तो वो गर्माहट मुझे स्वर्ग में भी महसूस होगी। मेरे हिस्से का सारा प्यार तुम्हें उसे देना होगा। ये मेरी आखिरी ख्वाहिश है… तुम्हारी नंदिनी।”*

शब्दों को पढ़ते ही विक्रम की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। अठारह सालों का बांध आज टूट गया था। विक्रम फर्श पर घुटनों के बल बैठ गए और दहाड़ें मारकर रोने लगे। वो तस्वीर को ऐसे छू रहे थे जैसे सच में नंदिनी उनके सामने खड़ी हो। उन्हें अचानक इस बात का खौफनाक अहसास हुआ कि अपने दर्द और अहंकार में उन्होंने नंदिनी की आखिरी ख्वाहिश का ही गला घोंट दिया था। जिस निशानी को उन्हें प्यार से सींचना था, उन्होंने उसे अनाथों जैसी ज़िंदगी दी। उन्होंने अपनी उस बेटी को ठुकराया, जिसमें उनकी नंदिनी ज़िंदा थी।

काव्या भी रोते हुए अपने पिता के पास ज़मीन पर बैठ गई। “पापा…” अठारह सालों में पहली बार काव्या की आवाज़ में वो डर नहीं था, बल्कि एक अधिकार था। 

विक्रम ने अपने आंसुओं से भीगे चेहरे को उठाया और काव्या को देखा। आज उन्हें काव्या के चेहरे में सिर्फ नंदिनी का अक्स नहीं, बल्कि अपनी वो बेटी नज़र आ रही थी जो सालों से उनके प्यार के लिए तरस रही थी। विक्रम ने आगे बढ़कर काव्या को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया। 

“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ कर दे,” विक्रम रोते हुए बस यही दोहरा रहे थे। उन्होंने काव्या का माथा चूमा और उसे ऐसे गले से लगाया जैसे वो कभी उसे खुद से अलग नहीं होने देंगे। प्रदर्शनी में मौजूद हर शख्स की आँखें इस मार्मिक दृश्य को देखकर नम हो गई थीं। सुमित्रा बुआ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थीं, उनके गालों पर भी खुशी के आंसू थे। 

आज काव्या को उसकी खोई हुई माँ भी मिल गई थी और वो पिता भी, जिसका वो बचपन से इंतज़ार कर रही थी। सालों से खामोश पड़े उस मकान की दीवारों ने आज फिर से ज़िंदा होने की सांस ली थी, क्योंकि आज एक अधूरा रिश्ता आखिरकार मुकम्मल हो गया था।

**क्या आपने भी कभी अपने किसी करीबी के जाने के बाद उसके हिस्से का प्यार किसी और में ढूंढा है? या कभी किसी गलतफहमी की वजह से अपने ही खून से दूरी बनाई है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर साझा करें।**

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

 लेखिका : मीरा महेश

error: Content is protected !!