किसी पर आखं बद करके भरोसा न करें – मंजू ओमर 

मत रो बेटा अपने आसूं पोछ ले। कैसे पोछ लू अपने आसूं माँ, वन्दना ने मेरे साथ बहुत गलत किया। उसने मेरी दुनिया ही उजाड दी। कोई बहन अपनी सगी बहन के साथ ऐसा करती है क्या। गलती तो मेरी भी है मैंने आखं बदं करके वन्दना के ऊपर भरोसा कर लिया।

मुझे नहीं पता था कि मेरी सगी बहन होकर मेरे ही पीठ मे छुरा घोप देगी। मैने और तेरे पापा ने तो वन्दना को बहुत समझाया लेकिन वो नहीं मान रही है। वो कहती है यदि आप लोगो ने मुझसे जबरदस्ती की तो मै अपनी जान दे दूगीं। 

               सुरेश और संध्या के दो बेटियां और दो बेटे थे। सुनंदा बड़ी बेटी थी और वंदना छोटी। उसके बाद दो भाई आकाश और विकास थे। सुनंदा की शादी अभी दो साल पहले गौरव से हुई थी। गौरव अपने गृहनगर से दूर एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करता था।

सुनंदा भी स्कूल में टीचिंग करती थी। सुनदां और गौरव दिल्ली मे फलैट किराए पर लेकर रहते थे। सुनंदा की शादी को दो साल बीत  हो गए थे अब सुनंदा प्रेग्नेंट थी। शुरू के कुछ महीने तो निकल गए लेकिन डिलीवरी का समय नजदीक आने पर सुनंदा को चितां होने लगी कि कैसे सबकुछ संभेलेगा।

गौरव और खुद सुनंदा की प्राइवेट नौकरी होने से ज्यादा दिन की छुट्टी नहीं मिल सकती थी। सुनंदा को स्कूल से कुछ महीने की छुट्टी तो मिल जाती लेकिन गौरव को नहीं। आजकल प्राइवेट कंपनी मे छुटटी की दीक्कत होती है।

फिर गौरव के खाने पीने की समस्या। सुनंदा को भी बस दो महीने की छुट्टी ही मिलेगी स्कूल से। सरकारी स्कूलों में तो पूरे साल की छुट्टी मिल जाती है एक औरत के मां बनने पर। 

             सुनंदा के सास नहीं थी ससुर छोटे देवर के साथ रहते थे। और इधर सुनंदा के मम्मी संध्या के ऊपर घर परिवार की बड़ी जिम्मेदारी थी। पिता सुरेश का भी आफिस था और तीन बच्चे।

घर मे सभी का खाना पीना और सारी वयवस्था देखनी रहती थी। सुनंदा बार बार माँ से कह रही थी कि तुम आ जाओ माँ कैसे होगा सब अकेले।

संध्या जी तैयार तो हुई पर बस पद्रहं दिन को। इससे ज्यादा उन्होंने रूकने से मना कर दिया। कहने लगी चलो पंद्रह दिन तक‌मै संभाल लेती हू लेकिन उसके बाद तो तुम्हे ही देखना पडेगा। कोई काम वाली की वयवस्था देखनी पडेगी। 

             अब सुनंदा की डिलीवरी का समय आ गया था। एक बेटे को जनम दिया था सुनंदा ने। संध्या जी पहुँच गई थी बेटी के पास। यहाँ घर पर संध्या जी ने खाने पीने की कुछ वयवस्था कर दी थी और फिर छोटी बेटी वन्दना तो थी ही।

अभी वन्दना की पढाई चल रही थी फाइनल एग्जाम होने वाले थे। इधर सुनंदा की अस्पताल से छुटटी हो गई थी और वो घर आ गई थी। संध्या जी ने घर मे सारी वयवस्था कर दी थी बच्चे की मालिश और एक खाना बनाने वाली भी लगा दी थी।

साफ सफाई और बरतन धोने को भी लगा दिया था। पंद्रह दिन बीतने के बाद संध्या जी अपने घर वपस आ गई चूंकि सुनंदा अभी स्कूल से छुटटी पर थी तो सारा काम मैनेज हो जा रहा था। लेकिन दो महीने छुटटी के कैसे निकल गए सुनंदा को पता ही न चला। अब सुनंदा को स्कूल जाना था अब फिर से परेशानी सामने आ रही थी। 

             उधर वन्दना के बी एस सी फाइनल ईयर के एग्जाम खत्म चुके थे और वो फ्री हो गई थी। सुनदां ने सोचा क्यों न वन्दना को यहाँ बुला ले अभी तो उसके रिजल्ट आने मे बहुत वक्त है। फिर आगे नया एडमिशन लेने मे भी तो समय लगेगा तो हमारे पास रह लेगी। भले ही सब काम को नौकर लगे है लेकिन बच्चे को नौकर के भरोसे छोडना ठीक नहीं है।

कोई एक बंदा घर का होगा तक सही रहेगा। सुनदां ने मां से बात की और माँ ने वन्दना से बात की तो वो तैयार हो गई और फिर क्या था वन्दना आ गई सुनंदा के घर

              सुनंदा भी वन्दना के घर आ जाने से बच्चों लेकर थोड़ा निश्चित हो गई थी। और सुनंदा ने अपना स्कूल फिर से ज्वाइन कर लिया‌घर मे पीछे वन्दना और गौरव रह जाते। सुनंदा तो सुबह सबेरे स्कूल के लिए निकल जाती। और गौरव आफिस के लिए दस बजे निकलता था।

बराबर की साली होने के कारण वन्दना और गौरव मे खूब हंसी मजाक होता रहता था। कहीं बाजार जाना हो या कुछ सामान लाना हो तो सुनंदा वन्दना को गौरव के साथ भेज देती। सुनंदा तो स्कूल और बच्चे को सभालने मे ही लगी रहती थी। इधर वन्दना और गौरव की नजदीकियां बढने लगी थी। क्या किया जाए ये उम्र ही ऐसी होती है। 

         आज गौरव के आफिस के एकल सहकर्मी के यहाँ उसके बच्चे की जनमदिन की पार्टी थी। गौरव और सुनंदा दोनों ही इन वाइट थे। लेकिन एन वक्त पर सुनंदा के बेटे को उल्टी और दस्त लगने लगे तो सुनंदा ने जाने से मना कर दिया। गौरव ने कहा भी कि चलों दोसत ने बुलाया है लेकिन सुनंदा ने साथ वन्दना को ले जाने को कह दिया।

और बच्चे का हवाला देकर खुद जाने से मना कर दिया। वन्दना और गौरव खुशी खुशी चले गए। वन्दना और गौरव को एक दूसरे का साथ अच्छा लगने लगा था। तभी गौरव के किसी दोसत ने वन्दना से आकर कहा भाभी जी नमस्ते, इतने मे गौरव आ गया बोला ये तुम्हारी भाभी नहीं है ये मेरी साली है अच्छा अच्छा कोई बात नहीं साली भी तो आधी घर वाली होती है।

ऐसे मजाक से वन्दना के चेहरे का रग गुलाबी हो रहा था। पार्टी निपट गई तो दोनों घर की ओर रवाना हुए। गाड़ी मे गौरव बोला वन्दना आज तुम बहु सुदंर लग रही हो। अच्छा कहकर वन्दना जोर से हसं पडी। 

              घर जाकर गौरव ने देखा सुनंदा कमरे में सो रही थी। यहाँ गौरव ने वन्दना से दो कप काफी बनाने को कहा और वही सोफे पर पसर गया। काफी लेकर गौरव और वन्दना पास पास ही बैठ गए और

जोर जोर से बाते करने और हंसने की आवाजे आने लगी। सुनन्दा की नीद खुल गई वो कमरे से बाहर आई। इस तरह से गौरव और वन्दना को देखकर थोड़ा हैरान हुईं। अरे तुम लोग कब आए  सुनन्दा बोली बस अभी थोड़ी देर पहले। अच्छा वन्दना जाओ अपने कमरे मे और गौरव तुम चलों कमरे मे सोने

          आज संडे था तो गौरव मूवी के दो टिकट ले आया और वन्दना से बोला चलो हम लोग मूवी देखने चलते है। सुनन्दा आवाक सी देख रही थी हम लोग और मै नहीं, अरे तुम कहाँ चलोगी सुनन्दा छोटे बच्चे को लेकर वो कहाँ मूवी देखने देगा परेशान कर देगा। तुम घर पर ही रहो हम दोनों मूवी देखकर आते है।

अब सुनन्दा परेशान होने लगी। गौरल और वन्दना की नजदीकियां बढ रही थी और वो कुछ नहीं कर पा रही थी। दूसरे दिन सुनन्दा ने वन्दना से पूछा और तुम्हारी आगे की पढाई का क्या हुआ कब से चालू हो रही है। तभी गौरव बीच मे बोल पडा अरे वन्दना यही पर एडमिशन ले लेगी यहाँ पर अच्छे कालेज है।

अरे नहीं वहाँ मम्मी पापा भी परेशान हो रहे होगें अकेले मम्मी को भी तो सहारे की जरूरत होती है। वन्दना देखै तुम पता कर अपने कालेज का कब से शुरू हो रही है अपने जाने की तैयारी करो। 

                एक दिन सुनन्दा स्कूल से घर आई तो घर में बड़ी जोर जोर से हसंने की आवाज आ रही थी। अधरं जाकर देखा तो गौरव और वन्दना आपतिजनक हालत मे थे। सुनन्दा का पारा चढ़ गया बड़ी जोर से चिल्लाई वन्दना, वन्दना हडबडा कर उठ बैठी। और गौरव तुम, तुम आफिस नहीं गए क्या, नहीं आज घर से काम कर रहा हू गौरव बोला।

तो मेरी अनुपस्थिति मे घर मे ये सब हो रहा है। वन्दना तुम अपने जाने की तैयारी करो मै अभी आकाश को फोन करती हू कि आकर तुम्हे ले जाए। बहुत है चुका मैने तो तुम्हें घर मे थोड़ा सहारा देने को बुलाया था और मुन्ने की देखरेख को। आखें बद करके तुम पर भरोसा किया था पर, तुम तै मेरा ही घर उजाड़ने को तुली हुई हो। 

          तभी गौरव बीच मे बोल पडा नहीं वन्दना कहीं नहीं जाएगी और वो जाना भी नहीं चाहतीं, क्यों सुनन्दा ने पूछा बोल गौरव क्यों क्योकि हम दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे है और शादी करके साथ साथ रहना चाहते है।

शादी, शादी कैसे कर सकते है मेरे होते हुए वो मै देख लूगां। ये क्या कर दिया वन्दना तुमने एक बहन होकर बहन का ही घर उजाड रही हो। शादी करना चाहते हो एक पत्नी के रहते दूसरी शादी कैसे कर सकते हो। वो मै कुछ नहीं जानता कोई रास्ता निकाला जाएगा। 

                सुनन्दा ने भाई को बुला कर वन्दना को घर भेज दिया। वन्दना और गौरव की फोन पर लगातार बात होती थी। वन्दना ने घर मे बगावत कर दिया कि वो गौरव से शादी करना चाहती है और कही शादी नहीं करेगी। और मेरे साथ कहीं और शादी करने की जबरदस्ती की गई तो मै अपनी जान दे दूगीं।

अब वन्दना के मम्मी पापा परेशान है एक बहन ही बहन का घर बरबाद कर रही है। सुनन्दा का रो रो कर बुरा हाल है। लाख कोशिश कर  ले सुनन्दा पर गौरव तो उसके हाथ से फिसल गया है। बस वो घर मे रह रहा है लेकिन उसका दिल तो वन्दना के पास है। यहाँ सुनन्दा ने बच्चे को सभांलने को एक आया रख ली है। 

            कुछ दिनों बाद सुनने मे आया कि वन्दना ने घर से भागकर गौरव से शादी कर ली है और कहीं दूसरी जगह पर फलैट लेकर रह रहे है। अभी समाज मे उजागर नहीं हुआ है कि दोनों ने शादी कर ली है। पता तो चलेगा ही आखिर कब तक छुपा रहेगा। और जब उजागर होगा तो सुनन्दा को तलाक़ देगा बस यही एक रास्ता बचा है। 

          दोस्तों ऐसी घटनाए समाज मे अकसर होती रहती है। छोटी बहन बड़ी बहन की डिलीवरी में आती है और जीजा के साथ मिलकर बहन का ही घर उजाड देती है। आखं मूंदकर किसी पर भरोसा न करे चाहे वह सगी बहन ही क्यों न हो। क्योंकि जीजा साली हम उम्र होते है ऐसे में साथ साथ रहना कब क्या ह़ो जाए कुछ नहीं पता होता। इस लिए सावधान रहें और आखें खुली रखें। 

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश

17 मार्च

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