पहला प्यार – एम. पी. सिंह

स्कूल की पढ़ाई पूरी कर कॉलेज में एडमिशन लिया. कॉलेज का पहला दिन, नये साथी, नये टीचर, नये चेहरे, नई जगह बस शहर वहीं पुराना. इन नये चेहरों में एक चेहरा ऐसा भी था जो मेरे सपनो की राजकुमारी से मिलता था. मेरे दिल ने अपनी राजकुमारी के चहरे क़ो पहचान लिया और उसके पीछे खिचा हुआ क्लास रूम तक पहुंच गया.

लगभग सभी लोग एकदूसरे से अनजान थे और चुपचाप चले जा रहे थे. मैं चलते हुए उसके एकदम करीब पहुंच गया ताकि उसके  साथ ही बैठ सकूँ. आखिर मुझे मौका मिल ही गया. बहुत डरते डरते मैंने मुस्कुरा कर “हेलो” बोला. वो भी मुस्कुराई और बोली, मैं कोयल, और तुम?

मैं बस उसे देखता ही रहाँ , जैसा नाम वैसी ही मधुर आवाज. मैं ख्यालो में खो गया, बार बार बस एक ही आवाज कानो में गूंज रही थीं, मैं कोयल, मैं कोयल… तभी उसने मेरी पीठ पर मारा और बोली, क्या नाम है तेरा? तभी टीचर क्लास में आ गये और हम दोनों छुप हो गये. टीचर ने अपना इंट्रो दिया

और हमारा पूछा. ज़ब मेरा नम्बर आया और मैं खड़ा हुआ और बोला, सर , मैं एम पी., 81%. कोयल मुझे घूर के देखती रही और धीरे से बुदबुदाई, ओह, 81% ? पहले दिन जो उसका साथ शुरू हुआ, जल्दी ही उसे किसी की नज़र लग गई, उसके पिताजी का तबादला हो गया

और वो कॉलेज छोड़ कर इंदौर चली गई. जाने से पहले उसने कॉपी के एक पेज पर अपने दादाजी के घर का पता लिख कर दिया, और बोली अब मैं और मम्मी दादाजी के साथ ही रहेंगे, पापा अकेले मुंबई जायेगे.

फाइनल परीक्षा के बाद मैं एक बार इंदौर गया और कोयल से मिलने उस पते पर गया. वहाँ जाकर पता चला की उसके दादाजी का स्वर्गवास हो गया है और वो पापा के पास मुंबई शिफ्ट हो गये है. 

आज बरसों बीत गए उससे बिछड़े लेकिन अपने पहले प्यार की निशानी, वो कॉपी का पेज और उसपर उसकी लिखावत, मैंने सूटकेस मैं संभाल कर रखा है. 

कुछ सालों बाद ऑफिस के काम से मेरा फिर से इंदौर जाना हुआ. ना चाहते हुए भी मैं उस पते पर खिचता चला गया, बहुत देर तक बाहर खड़ा उसकी यादो मैं खोया उस मकान क़ो देखता रहा. तभी मेरे दिल से एक आवाज आई, पगले, उधर क्या देखता है, वो तो तेरे दिल मैं है. मैं मुस्कुराता हुआ वापस चल दिया अपने पहले प्यार कि यादो के साथ.

एम. पी. सिंह, कोटा 

(Mohindra Singh)

स्वरचित, 

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