होली का त्योहार आते ही मेरे बचपन की यादें ताज़ा हों जाती है. ये बात है ज़ब में कॉलेज मे पढ़ता था. मेरा दोस्त राहुल अपने ही कॉलेज की एक लड़की सुनीता से दिल ही दिल प्यार करता था, पर इज़हार करने से डरता था. उसने होली पर सुनीता के साथ होली खेलने ओर प्यार का इज़हार करने का ठान लिया. लेकिन डर इतना की अकेले उसके मोहल्ले मे जाने की हिम्मत नहीं. राहुल ने मुझे अपना प्लान बताया और मुझे साथ चलने के लिए रिक्वेस्ट की. मुझे भी डर लग रहा था कि अगर पकड़े गये तो? वो बोला घर से ही मुँह पर रंग लगाकर जायेंगे, कोई पहचान नहीं पायेगा.
होली के दिन हम दोनों अच्छी तरह रंग लगाकर सरिता के घर चले गये.
सरिता के घर के पास बहुत से लोग होली खेल रहे थे, हम भी सबके साथ होली खेलने लगे. बहुत देर तक उसके घर के आस पास होली खेलते खेलते ज़ब थक गये तो सरिता से बिना मिले वापस हॉस्टल आ गये.
अगले दिन कालिज में राहुल ने सरिता क़ो बताया कि हम तुम्हारे घर होली खेलने आये थे पर तुमने हमारी तरफ देखा तक नहीं. तो सरिता ने बताया कि कॉलेज के बहुत लोग आये थे ओर होली खेलकर गये पर तुम तो कहीं नहीं दिखे. जब मैंने हमारे मेकअप के बारे में बताया, तो सरिता कि हँसी छूट गई जो रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. इधर मेरा और राहुल का चहरा देखने लायक था. शायद, खुद तो रंग लगाने का फैसला गलत साबित हुआ.
आज भी जब होली कि बात होती है, तो अनायास ही ये किस्सा याद आ जाता है ओर चेहरे पर मुस्कान छा जाती है.
एम. पी. सिंह, कोटा
मौलिक, स्वरचित