आज उपासना और अखिलेश जी बेटे की शादी की बधाई देने प्रमोद जी के घर पर आए थे। क्योंकि उपासना और अखिलेश जी प्रमोद और आशा के बेटे की शादी में आ नही पाए थे। और आंटी अकंल कैसी रही रोहित की शादी बहुत मजा आया होगा। क्या बताऊ हम लोग आ नहीं पाए थे अखिलेश जी की तबियत ठीक नहीं थी।
तभी रोहित की मम्मी आशा जी बोली हां मजा तो बहुत आया। लेकिन हालत खराब हो गई , इतना थक गई हू कि क्या बताऊँ। सबकुछ खुदी को करना है तो थकान तो हो ही जाएगी। और अंकल आपको तो ज्यादा थकान नहीं हुई होगी क्योकि आंटी ने ही सब कुछ सभालांथा।
इतना सुनना था कि प्रमोद जी बिफर पडे हां हां सबकुछ आंटी ने ही तो सभालां था मैने क्या किया। मुझे तो तुम्हारी आंटी ने बस एक किनारे कर दिया और सारा क्रेडिट खुद ही ले लिया।
आशा को बहुत बुरा लगा। नहीं अंकल वो बात नहीं है आप तो घुटनो से परेशान हो आप तो ज्यादा देर खड़े भी नहीं हो पाते हो। तो दोनों मे से एक इंसान को तो मजबूत बनना ही पड़ेगा न। इसलिए आंटी ने सबकुछ सभालां और कोई बात नहीं है।
प्रमोद जी की आदत थी स्वयं तो कुछ कर नहीं पाते थे क्योंकि दोनों घुटने खराब थे ठीक से चल भी नहीं पाते थे। हां फोन करके बस जो काम करवाना होता था तो करवा देते थे और कुछ नहीं। बेटे की शादी थी घर मे और कोई भी नहीं था मदद करने को प्रमोद और आशा ही थे घर मे। बेटा रोहित मद्रास में नौकरी करता था।
तो वो बस शादी के एक हफ्ते पहले ही बस आ सकता था। और आशा जी के एक बेटी भी थी वो भी हैदराबाद में नौकरी करती थी। इसलिए किसी से भी कोई मदद मिलने वाली नहीं थी। सब शादी के एक हफ्ते पहले ही मेहमानों की तरह आ पाएगें। इसलिए काम का बोझ आशा जी पर बहुत था। घर बाहर सबकुछ अकेले ही देखना था।
शादी नजदीक आ गई, आज गोद भराई की रसम होने वाली थी। सभी रिश्ते दार आ चुके थे। शाम को होटल में र्पाटी रखी गई थी। शादी के रीति रिवाज या और भी किसी विषय पर बातचीत करनी है, या कुछ दिखाना या पूछना है तो काजल बहू की मम्मी आशा जी से ही पूछती। बार बार उन्हीं को बुलाकर ले जाती।
अब शायद ये सब कुछ प्रमोद जी को अच्छा नहीं लग रहा था। अब प्रमोद जी इस तरह बार बार किसी काम के लिए उठ कर नहीं जा सकते थे। थोड़ा सा ही चलने फिरने मे उनके घुटने में तकलीफ बढ जाती थी। उसी का गुस्सा आज वो शायद उपासना और अखिलेश जी पर दिखा रहे थे।
लेकिन प्रमोद जी की आदत थी वो हर वक़्त आशा जी को जलील करते रहते थे। ताना मारते रहते थे। आशा जी प्रमोद जी के बातो से बहुत आहत होती थी लेकिन क्या करे पति पत्नी जो ठहरे साथ तो रहना ही था। कहने को तो जीवन साथी थे लेकिन प्रमोद जी कुछ ऐसा हर वक़्त बोल देते थे कि आशा जी के मन पर घाव बन जाता था।
प्रमोद जी के घुटनों की समस्या कुछ ज़्यादा ही बढ गई थी तो प्रमोद जी के दोनों घुटनों का आपरेशन कराना पडा। अब आपरेशन तो करा दिया लेकिन उसके बाद छै महीने तक अच्छे से देखभाल करनी थी। जो बराबर आशा जी करती रही। शुरू के पंद्रह दिन तो बहुत भारी थे।
बार बार बाथरूम ले जाना, नहला ना धुलाना और हाथ पकडकर टहलाना सब करना पड़ता था। और आगे भी बहुत अच्छे से ध्यान रखना था। और जब प्रमोद जी थोडे ठीक हो गए तो आशा से कहने लगे तुमने क्या स्पेशल कर दिया थोड़ी देखरेख कर दी और क्या कर दिया।
ये तो हर पत्नी का फर्ज होता है। घर पर कोई मिलने आता और वो कहता अरे भाभी जी आपने तो भाई साहब की बड़ी सेवा की तो तुरन्त प्रमोद जी बोलते अरे क्या बड़ा काम कर दिया ये सब तो पत्नी का ही काम होता हैं न। आशा जी को बहुत बुरा लगता कि प्रमोद जी कभी कोई अपना पन नहीं दिखाते नही कोई अहसान मानते है हर वक़्त बस ताने ही देते रहते है।
इसी बीच देश में करोना महामारी ने अपने पैर पसार लिए। आशा जी की बेटी सोनल हैदराबाद से छुटटियों मे घर आई हुई थी। और अचानक से लाक डाउन लग गया। सारी ट्रेन और फ्लाइटस सब कैसिल हो गई और बेटी वापस नौकरी पर नहीं जा पाई। कुछ समय के बाद आफिस मे नौकरी से छटनी होने लगी।
उसमें सोनल की नौकरी भी चली गई। महीना भर हो गया। अब करोना मे कोई घर से बाहर नहीं जा रहा था, बहुत जरूरी हो तुम बाहर जाता था। प्रमोद जी ने तो साफ मना कर दिया कि मै तो बाहर नहीं जाऊंगा। बड़े बुजुर्गों को ज्यादा खतरा था। लेकिन अकसर कभी दवाइयों या कुछ और सामान की जरूरत पड जाती थी तो सोनल जाती थी।
हलाकि सोनल बडे एहतियात से मास्क लगा कर बाहर जाती थी और घर आकर भी सब सेनिटायजर करती थी। लेकिन इतने बचाव के बाद भी सोनल करोना संक्रमित हो गई। सर्दी खासीं हो गई उसको। दवा दी जा रही थी लेकिन उसको खांसी में राहत नहीं मिल रही थी।
प्राइवेट अस्पतालों में डाक्टरों ने देखने से मना कर दिया। परेशानी ज्यादा बढने लगी तो सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ दो दिन बाद सोनल की मौत हो गई।
अब घर मे हाहाकार मच गया। जवान बेटी के जाने का गम आशा और प्रमोद जी बरदास्त नहीं कर पा रहे थे। फिर दो चार दिन में ही बेटी के सारे काम निपटाने पडे कयोकि वो समय ऐसा था कि कोई भी किसी के घर आ जा नहीं रहा था। ऐसे ही एक दिन फिर प्रमोद जी ने आशा को अपनी बातों से घायल कर दिया।
कहने लगे तुमने ही मेरी बेटी को मार डाला। आशा जी सुनकर दगं रह गई कि ऐ कैसा इलज़ाम लगा रहे है। ये मेरे पति है और कह रहे है कि मैंने बेटी को मार डाला। बताओ क्या सिर्फ इनकी बेटी थी मेरी नहीं थी। और मैने तो उसे नौ महीने अपनी कोख मे रखा पाला पोसा है। आशा ने कहा कैसी बात कर रहे हो तुम अपनी बेटी को मैने ही मार डाला।
कुछ तो समझ बूझ कर बोलो। हाँ तो गलत क्या कह रहा हू तुम ही तो उसको घर के बाहर भेजती थी। अरे जब तुम नहीं जा रहे हो किसी सामान की बहुत जरूरत है तो कोई तो लाएगा ही न। घर मे और कोई तो है नहीं सोनल चली जाती थी। उसमे मेरा क्या कुसूर है।
वैसे तो सोनल बहुत एहतियात से जाती थी लेकिन तब भी करोना हो गया। करोना तो सबको ही हो रहा था चाहे कोई बाहर जा रहा है या नहीं ।
आशा जी प्रमोद जी से बोली तुमने मेरा दिल आज छलनी कर दियाकि मैने सोनल को मार दिया। अब तो तुम्हारी शक्ल देखने की भी मेरी इच्छा नहीं हो रही है लेकिन क्या करू पति हो मेरे क्या कोई जीवन भर का साथ निभाने वाला अपने जीवन साथी के साथ ऐसा करता है इस तरह का इलज़ाम लगाता है। एक ऐसा घाव दे देता है जो जीवन भर नहीं भरता है।
सच ही तो है जीवन का सबसे बड़ा घाव अपने ही तो देते है। तुमसे बढकर मेरा कौन अपना है लेकिन आज तुमने मेरे पर ये इलज़ाम लगाकर साबित कर दिया कि कोई अपना नहीं होता। दुख से ये मन जब भी छलनी हुआ है उसका कारण कोई अपना ही निकला है। परायो मे कहाँ इतना दम होता है कि वो ऐसी हिम्मत कर सके।
अब कहने को प्रमोद और आशा पति पत्नी है, ये ऐसा बधंन है जो कभी नहीं टूटता। जीवन भर साथ रहना है लेकिन अपने पन के साथ नहीं एक गहरी टीस के साथ। लेकिन प्रमोद जी के कहे हुए शब्द आशा के मन मे यदा कदा टीस बनकर उभरते है और आशा आज भी अपने जीवन साथी के प्रति वितृष्णा से भर जाती है और नफरत करने लगती है कि क्या ये मेरे पति है। लेकिन मजबूरी में सब कुछ करना पड़ता है जिसके साथ आप रहना ना भी चाहो तो भी रहना पड़ता है। कुछ अपनो के दिए घाव जीवनभर नहीं भरते है।
मंजू ओमर
झांसी उतरप्रदेश