पिंजरे की खुली उड़ान – मोहिनी मिश्रा

देविका, जो अब तक चुपचाप यह सब तमाशा देख रही थी, उसके भीतर का सोया हुआ ज्वालामुखी अचानक फट पड़ा। उसे उस बंद दरवाज़े के पीछे रोती हुई काव्या में अपनी ही परछाई नज़र आने लगी।

बाइस साल पहले जब देविका ने अपने मायके में कॉलेज ट्रिप पर जाने की ज़िद की थी, तो उसके पिता ने भी ठीक यही शब्द कहे थे—’शादी के बाद पति के साथ चली जाना’। और आज बाइस साल बाद, उसकी बेटी को भी उसी झूठे वादे की चाशनी चटाई जा रही थी।

रविवार की दोपहर थी। सर्दियों की गुनगुनी धूप आंगन में बिछी हुई थी, लेकिन घर के भीतर का माहौल एकदम गरम था। डाइनिंग टेबल के पास बीस साल की काव्या खड़ी थी, जिसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।

उसके हाथ में कॉलेज की तरफ से मिला एक अनुमति पत्र (परमिशन लेटर) था, जिसमें कॉलेज के टूर पर सात दिन के लिए मनाली जाने की बात लिखी थी।

सोफे पर काव्या की दादी, रुक्मिणी देवी, माथे पर सिलवटें डाले बैठी थीं। पास ही काव्या का पिता, प्रकाश, अपने मोबाइल में मग्न था, जैसे इस बहस से उसका कोई लेना-देना ही न हो। और थोड़ी दूर खड़ी काव्या की माँ, देविका, अपने सीने में उठते हुए तूफान को शांत करने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

“दादी, मेरी पूरी क्लास जा रही है। सारे प्रोफेसर्स साथ होंगे। इसमें सुरक्षा की कोई बात ही नहीं है,” काव्या ने सिसकते हुए कहा।

“मैंने एक बार कह दिया ना, मतलब कह दिया!” रुक्मिणी देवी की आवाज़ में एक पुराना और कठोर रुतबा था। “हमारे खानदान की लड़कियाँ ऐसे पहाड़ों पर दोस्तों के साथ धक्के नहीं खातीं। कौन कह रहा है कि अपनी इच्छा पूरी मत करो? शौक पूरे करने हैं तो शादी के बाद अपने पति के साथ जाना।

लड़की की इज़्ज़त कांच के बर्तन जैसी होती है। मायके की चौखट लांघ कर अकेली जाएगी और कोई ऊंच-नीच हो गई, तो ज़िंदगी भर का कलंक हमारे माथे लग जाएगा। जो भी घूमना-फिरना है, अपने ससुराल में और अपने पति की अनुमति से करना।”

काव्या ने एक हताश नज़र अपने पिता पर डाली, लेकिन प्रकाश ने नज़रें चुरा लीं और कहा, “अरे बेटा, जब दादी मना कर रही हैं तो ज़िद क्यों कर रही हो? अभी पढ़ाई पर ध्यान दो। जब तुम्हारी शादी होगी, तो मैं तुम्हारे पति से खुद कह दूंगा कि तुम्हें हनीमून पर मनाली ले जाए।”

ये शब्द सुनते ही काव्या फूट-फूट कर रोने लगी। उसने वो फॉर्म वहीं टेबल पर पटका और भागकर अपने कमरे में चली गई। दरवाज़ा ज़ोर से बंद होने की आवाज़ ने पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पैदा कर दिया।

देविका, जो अब तक चुपचाप यह सब तमाशा देख रही थी, उसके भीतर का सोया हुआ ज्वालामुखी अचानक फट पड़ा। उसे उस बंद दरवाज़े के पीछे रोती हुई काव्या में अपनी ही परछाई नज़र आने लगी।

बाइस साल पहले जब देविका ने अपने मायके में कॉलेज ट्रिप पर जाने की ज़िद की थी, तो उसके पिता ने भी ठीक यही शब्द कहे थे—’शादी के बाद पति के साथ चली जाना’। और आज बाइस साल बाद, उसकी बेटी को भी उसी झूठे वादे की चाशनी चटाई जा रही थी।

देविका ने एक गहरी सांस ली, किचन से पानी का गिलास लाकर रुक्मिणी देवी के सामने रखा और बहुत ही शांत, लेकिन ठहरी हुई आवाज़ में बोली, “मांजी, जब मायके में ही बेटी की ख्वाहिशें यह कहकर पूरी नहीं की जातीं कि ‘ससुराल में कर लेना’, तो फिर उस अनजाने ससुराल से क्या उम्मीद रखना?

कई माता-पिता ऐसे ही बोलकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, पर क्या सचमुच मायके में जिस लड़की के सपने कुचल दिए जाते हैं, ससुराल वाले उसके लिए आसमान के दरवाज़े खोल देते हैं?”

रुक्मिणी देवी ने पानी का गिलास मेज़ पर खट से रखा और अपनी बहू को घूरते हुए बोलीं, “तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है देविका? तुम तो ऐसे बात कर रही हो जैसे हमने तुम्हें इस घर में बेड़ियों में जकड़ कर रखा हुआ है।

और ससुराल में शौक पूरे नहीं होते, इसका क्या मतलब है? जाती तो हो तुम बाहर। कितनी शादियाँ अटेंड करती हो, मोहल्ले की पार्टियों में जाती हो, रिश्तेदारों के यहां मिलने-जुलने जाती हो। क्या वो सब घर के बाहर जाना नहीं है?”

देविका के होंठों पर एक बहुत ही दर्द भरी और व्यंग्यात्मक मुस्कान तैर गई। “घर के लिए महीने भर का राशन लाना, भारी थैले उठाकर बाज़ार से लौटना, और रिश्तेदारों के घर शादी-ब्याह में जाकर दिन-रात रसोई में पूरियाँ बेलने को आप घूमना कहती हैं मांजी? आप एक पल के लिए ठंडे दिमाग से सोच कर बताइए कि इन बाइस सालों में, मैं कभी एक दिन भी अपनी मर्जी से कहीं गई हूँ? क्या मैंने एक भी दिन ऐसा बिताया है जिसमें मुझे यह चिंता न हो कि प्रकाश के नाश्ते का क्या होगा, या आपके ब्लड प्रेशर की दवा का समय तो नहीं हो गया? मेरा भी मन करता है कि कभी बिना किसी चिंता और फिक्र के अपने लिए समय निकालूँ। वो समय, जिसमें सिर्फ मैं हूँ… कोई बहू, कोई पत्नी या कोई माँ नहीं।”

देविका की आँखों में सालों का दबा हुआ दर्द छलकने लगा था, लेकिन उसकी आवाज़ में गज़ब का आत्मविश्वास था।

प्रकाश ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, “अरे देविका, बात काव्या की हो रही है, तुम अपनी शिकायतें क्यों लेकर बैठ गई? घर की औरतों को ये सब शोभा नहीं देता।”

“क्यों शोभा नहीं देता प्रकाश?” देविका ने सीधा अपने पति की आँखों में देखते हुए पूछा। “तुम पिछले महीने ही अपनी कंपनी के टूर के बहाने चार दिन दोस्तों के साथ रिसॉर्ट में बिता कर आए हो। हमारा बेटा, अंशुल, हर दूसरे महीने अपनी बाइक उठाता है और दोस्तों के साथ लद्दाख या गोवा निकल जाता है। तब तो किसी की इज़्ज़त कांच की तरह नहीं टूटती? तब तो कोई नहीं कहता कि शादी के बाद अपनी पत्नी के साथ जाना? नियम सिर्फ मेरे और मेरी बेटी के लिए ही क्यों बने हैं?”

रुक्मिणी देवी थोड़ी असहज हो गईं। उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा, “बहू, तू भूल रही है कि तू एक गृहिणी है। एक संस्कारी घर की औरत के लिए ऐसा समय कभी नहीं आता जहाँ वो सब कुछ छोड़कर अपने लिए जिए। न मैंने ऐसा समय कभी बिताया है, न मेरी सास ने। यही औरतों का जीवन है। त्याग ही हमारा गहना है।”

“तो क्या इसलिए हम काव्या की ख्वाहिशें भी मार दें मांजी?” देविका ने तुरंत पलट कर पूछा। “और आप कहती हैं कि आपने कभी ऐसा समय नहीं बिताया? आप हर साल अपनी कीर्तन मंडली की सहेलियों के साथ दस-दस दिन के लिए काशी, मथुरा, हरिद्वार और रामेश्वरम की यात्रा पर जाती हैं। तब आप इस घर की सारी ज़िम्मेदारी, प्रकाश का खाना, अंशुल की पढ़ाई… सब कुछ मेरे कंधों पर छोड़कर जाती हैं। तब आपको आज़ादी महसूस होती है न? क्या एक औरत को घर से बाहर निकलने की और खुली सांस लेने की अनुमति सिर्फ तब मिलेगी जब वो भगवान के दर्शन करने जाए? क्या मेरी बीस साल की बच्ची को सिर्फ प्रकृति को देखने और दोस्तों के साथ हंसने के लिए बाहर जाने का कोई हक़ नहीं है?”

रुक्मिणी देवी अवाक रह गईं। आज से पहले देविका ने कभी इतने तीखे लेकिन सच्चे तर्क उनके सामने नहीं रखे थे। देविका की हर बात तीर की तरह उनके पुराने और सड़े-गले उसूलों को छलनी कर रही थी।

देविका ने अपने आँसू पोंछे और अपनी बात को खत्म करते हुए कहा, “मांजी, मेरे माता-पिता ने मुझे यह कहकर मायके में कैद रखा कि ससुराल में उड़ना। आपने और प्रकाश ने मुझे यह कहकर कैद रखा कि ‘हमारे घर का यह नियम नहीं है’। मैंने अपनी सारी ख्वाहिशों का गला घोंट दिया, क्योंकि मैं एक ‘आदर्श बहू’ बनना चाहती थी। लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी। अगर कोई मेरी बेटी के सपनों को सिर्फ इसलिए तोड़ेगा क्योंकि वह एक लड़की है, तो मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं नहीं चाहती कि मेरी काव्या कल को किसी अनजान ससुराल में जाकर इस बात के लिए तरसे कि काश उसके मायके वालों ने उसे खुलकर जीना सिखाया होता। मेरी ख्वाहिशें तो इस घर की रसोई में दम तोड़ चुकी हैं मांजी, लेकिन मेरी बेटी की सारी ख्वाहिशें पूरी होंगी।”

इतना कहकर देविका ने मेज़ पर रखा वह परमिशन लेटर उठाया और सीधे प्रकाश के सामने कर दिया। “साइन करो इस पर प्रकाश। काव्या इस ट्रिप पर जाएगी, और उसके सारे खर्चे मेरे उन पैसों से पूरे होंगे जो मैंने इतने सालों में बचा कर रखे हैं। और अगर तुम्हें या मांजी को इससे कोई ऐतराज़ है, तो आज से आप लोग अपने नियम अपने पास रखिए, मैं अपनी बेटी के साथ इस घर के घुटन भरे नियमों का बहिष्कार करती हूँ।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर गया। प्रकाश के हाथ कांप रहे थे। उसने कभी अपनी शांत पत्नी का यह दुर्गा रूप नहीं देखा था। उसने चुपचाप पेन उठाया और उस फॉर्म पर हस्ताक्षर कर दिए।

रुक्मिणी देवी अभी भी अपनी जगह पर सुन्न बैठी थीं। उन्हें देविका के शब्दों ने उनके खुद के अतीत में धकेल दिया था। उन्हें याद आया कि जब वे छोटी थीं, तो उन्हें भी पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन उनके पिता ने उन्हें चूल्हे-चौके में झोंक दिया था यह कहकर कि ‘ससुराल जाकर कौन सा राज करना है’। जिस घुटन को उन्होंने अपनी नियति मान लिया था, वे अनजाने में उसी घुटन का ज़हर अपनी पोती की रगों में भी उतार रही थीं। उन्हें एहसास हुआ कि देविका सिर्फ काव्या के लिए नहीं लड़ रही थी, बल्कि वह उस हर औरत के लिए लड़ रही थी जिसके पंख ‘समाज’ और ‘परंपरा’ के नाम पर काट दिए जाते हैं।

रुक्मिणी देवी धीरे से उठीं। उनके चेहरे का कठोरपन अब एक गहरी समझ और वात्सल्य में बदल चुका था। वे देविका के पास आईं और उसके कंधे पर बहुत ही नरमी से हाथ रखा।

“सच कहती है बहू… बिल्कुल सच कहती है,” रुक्मिणी देवी की आवाज़ भर्रा गई थी। “ज़रूरी नहीं कि जो अन्याय हमने सहा, जो घुटन हमने झेली, वो हमारी बेटी भी सहे। हम पीढ़ियों से अपनी बेटियों को बस डरना और सहना सिखाते आए हैं। मैंने पूरी ज़िंदगी जो खोया, आज तूने मुझे उसका आईना दिखा दिया। मैं एक अंधी परंपरा ढो रही थी। पर अब नहीं। अब से मैं अपनी काव्या को कभी किसी चीज़ के लिए नहीं टोकूंगी।”

देविका हैरानी से अपनी सास को देख रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बातों ने पत्थर में भी दरार पैदा कर दी थी।

रुक्मिणी देवी ने देविका के हाथ से वो परमिशन लेटर ले लिया और मुस्कुराते हुए बोलीं, “जा, तू जाकर रसोई में अपनी लाड़ो की पसंद की केसर वाली खीर बना। तब तक मैं जाकर अपनी पोती को मनाती हूँ और उसे ये लेटर खुद अपने हाथों से देती हूँ। और सुन, सिर्फ काव्या ही नहीं, अगले महीने तू और मैं भी किसी ट्रिप पर चलेंगे… बिना प्रकाश और अंशुल के। आखिर हमें भी तो अपने लिए एक दिन जीने का हक़ है।”

देविका के चेहरे पर एक ऐसी खुशी और सुकून भरी मुस्कान खिल उठी जो पिछले बाइस सालों में इस घर ने कभी नहीं देखी थी। वह खुश थी कि उसकी बेटी के सपने अब किसी झूठे वादे या बंदिशों के तले दम नहीं तोड़ेंगे। कम से कम अपने मायके में तो उसकी बेटी को अब कभी अपने पंख सिकोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। और उससे भी बड़ी बात यह थी कि आज सिर्फ काव्या ही आज़ाद नहीं हुई थी, बल्कि दो पीढ़ियों की औरतें एक पुरानी ज़ंग लगी बेड़ी को तोड़कर बाहर आ गई थीं।

आपके लिए एक सवाल:

क्या आपको भी लगता है कि लड़कियों को हमेशा ‘शादी के बाद ससुराल में शौक पूरे कर लेना’ कहकर उनके बचपन और जवानी की इच्छाओं को दबा दिया जाता है? क्या माता-पिता को अपनी बेटियों को विवाह से पहले खुलकर दुनिया देखने और आज़ादी से जीने का पूरा मौका नहीं देना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : मोहिनी मिश्रा

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