अंजलि रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “समीर, दोस्ती निभाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या तुम्हें याद है जब दो साल पहले तुम्हारे पिताजी का एक्सीडेंट हुआ था? तब हमें अस्पताल में तुरंत एक लाख रुपये की ज़रूरत थी। तुमने वैभव को फोन किया था। उसने क्या कहा था? यही ना कि उसके व्यापार में भारी घाटा हो गया है
और उसके पास बच्चों की फीस भरने तक के पैसे नहीं हैं। और उसके ठीक एक हफ्ते बाद उसने सोशल मीडिया पर अपनी नई एसयूवी कार की तस्वीरें डाली थीं। तब भी तुमने यह कहकर उसे माफ कर दिया था कि शायद उसने लोन लिया होगा। लेकिन हकीकत यह है कि वह हमेशा से तुम्हारा फायदा उठाता आया है।”
सर्दियों की एक सर्द रात थी। कमरे में हीटर की हल्की सी गर्माहट के बीच एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। यह खामोशी सुकून वाली नहीं, बल्कि उस तूफान के आने से पहले की थी, जो अक्सर पति-पत्नी के बीच किसी गंभीर असहमति के बाद छा जाती है। पलंग के एक किनारे पर समीर सिर पकड़े बैठा था
और दूसरे किनारे पर उसकी पत्नी अंजलि अपने हाथ में पानी का गिलास लिए उसे घूर रही थी। समीर एक बेहद सीधा, भावुक और रिश्तों को जान से ज्यादा अहमियत देने वाला इंसान था। उसकी यही भावुकता अक्सर अंजलि के लिए परेशानी का सबब बन जाती थी, खासकर तब, जब बात समीर के बचपन के दोस्त वैभव की आती थी।
आज शाम भी कुछ ऐसा ही हुआ था। समीर ऑफिस से लौटा तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। बिना चाय पिए वह अपनी पासबुक और बैंक के कागज़ात खंगालने लगा। जब अंजलि ने कुरेद कर पूछा, तो पता चला कि वैभव की पत्नी को अचानक कोई गंभीर बीमारी हो गई है और उसके इलाज के लिए वैभव को तुरंत तीन लाख रुपयों की ज़रूरत है।
समीर ने बिना कुछ सोचे-समझे वैभव को पैसे देने का वादा कर दिया था और इसके लिए वह अपनी उस फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) को तोड़ने जा रहा था, जो अंजलि और उसने अपने आठ साल के बेटे आरव के भविष्य और पढ़ाई के लिए पाई-पाई जोड़कर बनाई थी।
“समीर, क्या तुम्हारा दिमाग पूरी तरह से काम करना बंद कर चुका है? तुम एक ऐसे इंसान के लिए अपने बेटे के भविष्य की एफडी तोड़ने जा रहे हो, जो अपनी पत्नी की बीमारी का बहाना बनाकर तुमसे पैसे ऐंठने की कोशिश कर रहा है, जबकि असलियत में वह अगले महीने अपने परिवार के साथ यूरोप के टूर पर जाने की तैयारी कर रहा है!” अंजलि ने अपनी आवाज़ को काबू में रखते हुए लेकिन कड़क लहज़े में कहा।
समीर ने झटके से सिर उठाया। उसकी आँखों में अविश्वास और गुस्सा दोनों थे। “अंजलि, तुम पागल हो गई हो क्या? वैभव मेरा बचपन का दोस्त है। हम दोनों ने एक ही थाली में खाना खाया है। वो मुझसे ऐसा घिनौना झूठ क्यों बोलेगा? किसी की बीमारी का मज़ाक उड़ाना तुम्हें शोभा नहीं देता। मैं मानता हूँ कि तुम्हें वैभव कभी पसंद नहीं रहा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम उसके मुश्किल वक्त में ऐसी मनगढ़ंत कहानियां बनाओ।”
अंजलि ने एक गहरी सांस ली। वह जानती थी कि समीर आसानी से नहीं मानेगा। “मैं मनगढ़ंत कहानियां नहीं बना रही हूँ समीर। तुम्हें याद है मेरी चचेरी बहन मीनल? जो उस बड़ी ट्रैवल एजेंसी में काम करती है? आज दोपहर ही मेरी उससे बात हुई थी। उसने मुझे बातों-बातों में बताया कि तुम्हारे दोस्त वैभव ने कल ही अपनी पत्नी और बच्चों के लिए पंद्रह दिन का एक प्रीमियम यूरोप हॉलिडे पैकेज बुक किया है। लाखों रुपये का पेमेंट उसने एडवांस में किया है। और तुम कह रहे हो कि उसकी पत्नी अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ रही है?”
समीर एक पल के लिए सुन्न रह गया, लेकिन फिर उसने अपने दोस्त का बचाव करते हुए कहा, “नहीं… नहीं, यह कोई और वैभव होगा। मीनल को कोई गलतफहमी हुई होगी। नाम एक जैसे हो सकते हैं।”
“अरे समीर, नाम एक हो सकता है, लेकिन फोन नंबर, घर का पता और तुम्हारे साथ उसकी कॉलेज की वो तस्वीर जो उसने अपने व्हाट्सएप डीपी पर लगा रखी है, वो तो एक नहीं हो सकती ना? मीनल ने जब उसका नाम देखा तो उसे शक हुआ, उसने प्रोफाइल चेक की तो पता चला कि यह वही वैभव है जो हमारी शादी में भी आया था। उसने मुझे कन्फर्म करने के लिए बुकिंग डिटेल्स का स्क्रीनशॉट भी भेजा है।”
अंजलि ने अपना फोन उठाया और मीनल द्वारा भेजे गए वे स्क्रीनशॉट समीर के चेहरे के सामने कर दिए। समीर की आँखें उन कागज़ात पर टिक गईं। वहाँ साफ-साफ वैभव का नाम, उसकी पत्नी का नाम और लाखों रुपये की रसीद थी। समीर का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। जिस दोस्त की रोती हुई आवाज़ सुनकर उसका दिल पसीज गया था, वह असल में एक बहुत बड़ा नाटक था।
अंजलि रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “समीर, दोस्ती निभाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या तुम्हें याद है जब दो साल पहले तुम्हारे पिताजी का एक्सीडेंट हुआ था? तब हमें अस्पताल में तुरंत एक लाख रुपये की ज़रूरत थी। तुमने वैभव को फोन किया था। उसने क्या कहा था? यही ना कि उसके व्यापार में भारी घाटा हो गया है और उसके पास बच्चों की फीस भरने तक के पैसे नहीं हैं। और उसके ठीक एक हफ्ते बाद उसने सोशल मीडिया पर अपनी नई एसयूवी कार की तस्वीरें डाली थीं। तब भी तुमने यह कहकर उसे माफ कर दिया था कि शायद उसने लोन लिया होगा। लेकिन हकीकत यह है कि वह हमेशा से तुम्हारा फायदा उठाता आया है।”
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया। अंजलि की हर बात एक हथौड़े की तरह समीर के दिमाग पर प्रहार कर रही थी। उसे याद आने लगे वो सारे वाकये जब वैभव ने उससे हज़ार-दो हज़ार से लेकर दस-बीस हज़ार तक कई बार उधार लिए, और जब भी समीर ने पैसे वापस मांगे, वैभव ने कोई न कोई नई दुखभरी कहानी सुनाकर उसे टाल दिया। ‘दोस्ती में पैसे का क्या हिसाब यार’—यही कहकर उसने समीर को हमेशा चुप करा दिया था।
समीर का सिर शर्म और ग्लानि से झुक गया। वह समझ गया था कि जिस इंसान को वह अपना भाई मानता था, वह असल में एक स्वार्थी और धोखेबाज़ व्यक्ति था जो समीर की अच्छाई को उसकी बेवकूफी समझता था।
“तुम सही कह रही हो अंजलि,” समीर की आवाज़ में एक कंपन था। “मैं ही अंधा हो गया था। मुझे लगता था कि अगर मैं सच्चा दोस्त हूँ, तो सामने वाला भी वैसा ही होगा। लेकिन तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं। अगर तुम मुझे मीनल की बात नहीं बताती, तो कल सुबह मैं बैंक जाकर एफडी तुड़वा चुका होता। आरव के भविष्य के पैसे मैं एक झूठे इंसान की ऐश-ओ-आराम की भेंट चढ़ा देता।”
अंजलि ने आगे बढ़कर समीर का हाथ पकड़ लिया। “समीर, मदद हमेशा उसकी करनी चाहिए जिसे वाकई उसकी ज़रूरत हो, न कि उसकी जो आपकी मदद का इस्तेमाल अपने शौक पूरे करने के लिए करे। ऐसे स्वार्थी और मतलबी लोग किसी के दोस्त नहीं होते। जो इंसान अपने फायदे के लिए अपनी ही पत्नी की बीमारी का झूठा नाटक रच सकता है, वह तुम्हारा सगा कैसे हो सकता है? अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हें आगे क्या करना है।”
समीर ने एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर अब कोई असमंजस नहीं था। उसने अपना फोन उठाया और वैभव का नंबर डायल किया। रात के ग्यारह बज रहे थे। दो घंटी बजने के बाद ही वैभव ने फोन उठा लिया।
“हाँ मेरे भाई समीर! क्या हुआ? एफडी का क्या सोचा? यार, कल सुबह ही अस्पताल में पैसे जमा करने हैं, वरना डॉक्टर ऑपरेशन शुरू नहीं करेंगे। मैं तो बहुत परेशान हूँ भाई, बस तेरा ही आसरा है,” वैभव ने बेहद रुंधे हुए और नाटकीय स्वर में कहा।
समीर ने अंजलि की तरफ देखा, अंजलि मुस्कुरा रही थी। समीर ने एकदम शांत और दृढ़ आवाज़ में कहा, “वैभव, मैंने सब हिसाब लगा कर देख लिया है। मेरी एफडी अभी मैच्योर नहीं हुई है और उसे तोड़ने पर बहुत पेनल्टी लग रही है। मेरे पास सच में इतने पैसे नहीं हैं कि मैं तुम्हारी मदद कर सकूं। सॉरी यार, मैं यह पैसे नहीं दे पाऊंगा।”
फोन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड के लिए एकदम सन्नाटा छा गया। जो वैभव अभी तक रोने का नाटक कर रहा था, उसकी आवाज़ अचानक सख्त और रूखी हो गई। “अरे यार समीर, तू कैसा दोस्त है? मुसीबत के वक्त ही तो दोस्त काम आते हैं। थोड़ा और दिमाग लगा, किसी रिश्तेदार से मांग ले। मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता?”
“नहीं वैभव, मैं नहीं कर सकता। और वैसे भी, मुझे लगता है कि तुम्हें पैसों की कोई खास ज़रूरत है नहीं। यूरोप टूर की एडवांस बुकिंग के बाद इंसान का बजट थोड़ा तो हिल ही जाता है, मैं समझ सकता हूँ। तुम अपनी पत्नी के ‘ऑपरेशन’ और ‘हॉलिडे’ दोनों को एन्जॉय करो। शुभ रात्रि।”
यह कहकर समीर ने बिना वैभव का जवाब सुने फोन काट दिया और नंबर को हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया। उसने एक लंबी राहत की सांस ली। ऐसा लग रहा था जैसे उसके कंधों से सालों का कोई भारी बोझ उतर गया हो।
अंजलि पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसने न केवल अपने परिवार की मेहनत की कमाई को लुटने से बचाया था, बल्कि अपने पति को एक ऐसे स्वार्थी और ज़हरीले रिश्ते के चुंगल से भी आज़ाद कर दिया था जो दीमक की तरह उन्हें खोखला कर रहा था। समीर ने अंजलि का हाथ चूमा और कहा, “थैंक यू अंजलि। अगर आज तुम मुझे आईना नहीं दिखाती, तो मैं ज़िंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाता।”
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी में माता-पिता और जीवनसाथी से बड़ा कोई शुभचिंतक नहीं होता। बाहर की दुनिया अक्सर हमारे सामने एक मीठा मुखौटा पहनकर आती है, लेकिन हमारे अपने ही वह ढाल होते हैं जो हमें हर धोखे से बचाते हैं। इसलिए अपनों की बातों, उनके विचारों और उनकी सलाह को कभी अनसुना न करें, क्योंकि वे हमेशा हमारा भला ही चाहते हैं।
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लेखिका : हर्षिता सिंह