दोपहर का समय था। घर के आंगन में सन्नाटा पसरा हुआ था। विमला जी अपने कमरे में दोपहर की नींद लेने जा रही थीं, तभी उन्हें अपनी बहू काव्या के कमरे से बात करने की धीमी-धीमी आवाज़ सुनाई दी।
काव्या फोन पर अपने पति अमित से बात कर रही थी। विमला जी के कदम अचानक रुक गए। वो कोई कान लगाकर सुनने वाली सास नहीं थीं, लेकिन काव्या के मुंह से निकले कुछ शब्दों ने उनके कानों को खड़े कर दिए।
“सुनिए अमित, ऑफिस से आते वक्त वो पैकेट जरूर ले आना। याद है ना आपको? और हां, किसी को पता नहीं चलना चाहिए, खासकर मां जी को तो बिल्कुल भी भनक नहीं लगनी चाहिए। मैं उसे अपनी अलमारी के सबसे नीचे वाले दराज में छिपा दूंगी। हां, थोड़े महंगे हैं, पर कोई बात नहीं, मैंने अपने बचाए हुए पैसों से ही तो मंगवाया है। बस आप सावधानी से ले आना।”
इतना सुनकर विमला जी का माथा ठनक गया। उनके चेहरे का रंग उड़ गया और आंखों में एक अजीब सा गुस्सा तैरने लगा। वो अपने कमरे में आ गईं, लेकिन अब उन्हें नींद कहां आने वाली थी! उनका दिमाग घोड़े की तरह दौड़ने लगा। “ओह… तो ये बात है! मुझसे छुपा-छुपा के अपने कमरे में चीज़ें मंगा कर खाई जा रही हैं।
पता नहीं कितने महंगे मेवे, चॉकलेट और मिठाइयां मंगा कर रखती होगी अपने कमरे में। हम क्या मना करते हैं बहू को कुछ खाने-पीने से? अगर कुछ खाने का मन था तो मुझे बता देती, मैं खुद अपने हाथों से बनाकर खिला देती। पर ये क्या तरीका हुआ कि पति से छुप-छुप कर चीज़ें मंगवाई जाएं और अलमारी में छिपा कर खाई जाएं?”
विमला जी खुद को रोक नहीं पा रही थीं। उन्हें लगने लगा कि काव्या जो बाहर से इतनी सीधी और संस्कारी बनती है, असल में बहुत चालाक है। वो बाहर तो सबके सामने सादा खाना खाती है
और कमरे में जाकर पति के पैसों से महंगे शौक पूरे करती है। “आने दो इसके ससुर को और उस अमित को। आज तो मैं इस बात का फैसला करके ही रहूंगी। शादी को अभी छह महीने ही हुए हैं और इसके ये रंग हैं, आगे चलकर तो ये हमें भूखा ही मार देगी।”
शाम के पांच बज चुके थे। विमला जी के पति, दीनानाथ जी जब अपनी दुकान से लौटे, तो उन्होंने देखा कि विमला जी हॉल में सोफे पर मुंह फुलाए बैठी हैं। काव्या रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थी। दीनानाथ जी ने पूछा, “क्या बात है विमला? आज घर में इतनी शांति क्यों है और तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है?” विमला जी ने सारी बात नमक-मिर्च लगाकर अपने पति को बता दी। दीनानाथ जी ने समझाने की कोशिश की, “अरे भागवान, तुमने कुछ गलत सुन लिया होगा। हमारी बहू ऐसी नहीं है। और अगर कुछ मंगा भी लिया तो क्या हो गया, बच्चे हैं, खाने-पीने का मन कर गया होगा।” लेकिन विमला जी कहां मानने वाली थीं। उन्होंने ठान लिया था कि आज वो काव्या की इस ‘चोरी’ को सबके सामने पकड़ेंगी।
रात के आठ बजे। दरवाजे की घंटी बजी। अमित ऑफिस से थका-हारा लौटा था। उसके हाथ में एक काले रंग का बैग था, जिसे वो थोड़ा छिपाते हुए अंदर ला रहा था।
अमित ने जैसे ही हॉल में कदम रखा, उसने देखा कि विमला जी बीच हॉल में एक कुर्सी डालकर ऐसे बैठी हैं जैसे कोई जज अदालत में बैठा हो। दीनानाथ जी भी पास ही बैठे थे। काव्या पानी का गिलास लेकर अमित के पास आई। अमित ने अपनी आंखों के इशारे से काव्या को बताया कि ‘सामान’ बैग में है।
तभी विमला जी की कड़कदार आवाज़ गूंजी, “क्यों रे बीवी के भक्त… आज बीवी की कौन सी फरमाइश पूरी करके आया है? जरा हमें भी तो दिखा उस काले बैग में ऐसा क्या खजाना छुपाकर लाया है जो इस घर की सास से छुपाया जा रहा है?”
अमित और काव्या दोनों के कदम वहीं ठिठक गए। काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया। अमित ने घबराते हुए कहा, “क्या कह रही हैं मां? इसमें मेरी ऑफिस की फाइलें हैं।”
“फाइलें हैं? या तेरी इस चालाक बीवी के महंगे शौक की चीज़ें?” विमला जी अपनी जगह से उठीं और काव्या के पास आकर बरस पड़ीं। “दोपहर को फोन पर जो तुम दोनों की कानाफूसी चल रही थी, वो सब मैंने सुन ली है। अलमारी के पीछे छिपा दूंगी… मां जी को भनक नहीं लगनी चाहिए… महंगे हैं… ये सब क्या है काव्या? इस घर में तुम्हें किस चीज़ की कमी है जो तुम्हें छुप-छुप कर चीज़ें मंगवानी पड़ रही हैं? क्या हम तुम्हें भूखा रखते हैं? या हमारे सामने सादगी का नाटक करके कमरे में बैठकर मेवे उड़ाने की आदत है तुम्हारी?”
विमला जी की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि उनकी सांसें फूलने लगी थीं। दीनानाथ जी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, “विमला, शांत हो जाओ! बहुओं से ऐसे बात नहीं करते।”
“क्यों शांत हो जाऊं? आज अगर इसे नहीं टोका तो कल को ये इस घर को ही बेच खाएगी। ला इधर ये बैग!” विमला जी ने झपट कर अमित के हाथ से वो काला बैग छीन लिया।
काव्या की आंखों से आंसू छलक पड़े। वो कांपते हुए हाथ जोड़कर बोली, “मां जी, मेरी बात तो सुनिए… इसमें मेरे खाने की कोई चीज़ नहीं है। प्लीज आप इसे…”
“तू चुप कर! आज मैं खुद देखूंगी कि ऐसी कौन सी चीज़ है जो मुझसे छुपाई जा रही थी।” विमला जी ने बैग की चेन खोली और उसे सोफे पर पलट दिया।
बैग में से कोई विदेशी चॉकलेट, महंगे मेवे या मेकअप का सामान नहीं निकला। बैग में से एक चौकोर डिब्बा निकला जिस पर किसी आयुर्वेदिक फार्मेसी का नाम लिखा था, और साथ में एक बेहद खूबसूरत, मुलायम और गर्म पश्मीना शॉल थी।
विमला जी उन चीज़ों को देखकर सन्न रह गईं। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। उन्होंने अमित की तरफ देखा। अमित की आंखें भी नम थीं।
“अमित… ये… ये सब क्या है?” विमला जी की आवाज़ अब धीमी और कांपती हुई थी।
अमित ने एक गहरी सांस ली और बोला, “मां, आप हमेशा बिना पूरी बात जाने ही फैसला सुना देती हैं। आज आपने काव्या को बिना वजह इतनी बड़ी-बड़ी बातें सुना दीं। आपको पता है ये क्या है? ये केरल के एक बहुत बड़े आयुर्वेदिक डॉक्टर की बनाई हुई खास दवा है।”
“दवा? किसके लिए?” विमला जी ने हैरानी से पूछा।
“आपके लिए, मां!” अमित ने कहा। “पिछले एक महीने से आपके घुटनों में जो दर्द हो रहा था, जिसके कारण आप रात-रात भर करवटें बदलती रहती थीं और दर्द के मारे सिसकती थीं… काव्या ने वो सब देख लिया था। आपने पापा से ये कहकर डॉक्टर के पास जाने से मना कर दिया था कि मेरे इलाज पर फालतू पैसे खर्च होंगे, लड़कों की नई गृहस्थी है, उन पर बोझ पड़ेगा। लेकिन काव्या को आपका वो दर्द बर्दाश्त नहीं हुआ।”
अमित ने काव्या की तरफ देखते हुए आगे कहा, “काव्या ने इंटरनेट पर रिसर्च की, कई डॉक्टरों से बात की और ये खास दवा आपके लिए मंगवाई है। ये दवा सच में बहुत महंगी थी। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे, तो काव्या ने अपनी शादी के वक्त जोड़े हुए अपने शगुन के पैसों से यह दवा मंगवाई है। और यह शॉल… परसों रात जब आप ठंड से कांप रही थीं और आपने अपना पुराना फटा हुआ स्वेटर पहन रखा था, तो काव्या ने उसी वक्त फैसला किया था कि वो आपके लिए एक अच्छी शॉल मंगवाएगी।”
विमला जी के हाथों से वो शॉल छूटकर नीचे गिर गई। उनके पैरों तले से जैसे किसी ने ज़मीन खींच ली हो।
काव्या ने रोते हुए ज़मीन से वो शॉल उठाई और विमला जी के पास आकर बोली, “मां जी, मैंने अमित को आपसे छुपाने के लिए इसलिए कहा था क्योंकि कल आपका जन्मदिन है। मैं कल सुबह मंदिर से आने के बाद आपको यह एक सरप्राइज के रूप में देना चाहती थी। मुझे पता था कि अगर आपको आज ही पता चल जाएगा कि मैंने इतने महंगे पैसे खर्च किए हैं, तो आप मुझे डांटेंगी और इसे वापस करने को कहेंगी। इसलिए मैंने अलमारी में छुपाने की बात कही थी। मेरा कोई और गलत इरादा नहीं था मां जी… मुझे माफ कर दीजिए।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया था। सिर्फ विमला जी की सिसकियों की आवाज़ आ रही थी। जिस बहू को वो एक लालची, कामचोर और छुप-छुप कर खाने वाली औरत समझ रही थीं, वो असल में उनके दर्द को अपना दर्द मान बैठी थी। वो बहू जिसने उनके लिए अपने खुद के पैसे खर्च कर दिए थे, बिना किसी को जताए, बिना किसी पर एहसान किए।
दीनानाथ जी ने अपनी चश्मा उतारा और अपने आंसू पोंछे। उन्होंने विमला जी से कहा, “देख लिया विमला? तुम जिस घर की नाक कटने का डर पाल रही थीं, उसी घर में साक्षात एक देवी आ गई है। हमारी बहू ने हमें वो दिया है जो शायद हम कभी सोच भी नहीं सकते थे—सच्चा सम्मान और फिक्र।”
विमला जी से अब खड़ा नहीं रहा जा रहा था। वो वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गईं और उन्होंने काव्या के दोनों हाथ पकड़ लिए। उनके आंसू काव्या के हाथों पर गिर रहे थे।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ कर दे,” विमला जी फूट-फूट कर रोने लगीं। “मैं कितनी अंधी और स्वार्थी हो गई थी। मैंने समाज की देखा-देखी और पुरानी सोच के कारण अपनी ही बेटी पर ऐसा घटिया इल्जाम लगा दिया। तू मेरे दर्द के लिए अपने पैसे लुटा रही थी और मैं अभागिन तुझे ही गालियां दे रही थी। मेरा शक मेरे ही मातृत्व पर भारी पड़ गया काव्या। मुझे सजा दे दे बेटा, पर मुझसे मुंह मत फेरना।”
काव्या ने तुरंत ज़मीन पर बैठकर अपनी सास को कसकर गले लगा लिया। “मां जी, आप ऐसा मत कहिए। मां की डांट का भी कोई बुरा मानता है भला? मुझे आपकी बातों का बिल्कुल बुरा नहीं लगा। बस आप जल्दी से ये दवा लगाना शुरू कर दीजिए, मैं आपको रोज़ सुबह अपने हाथों से मालिश कर दूंगी। मुझे आपके घुटनों का दर्द ठीक करना है।”
उस रात विमला जी ने काव्या के हाथों से बना खाना खाया और उसे अपने पास सुलाया। उस काले बैग और छुपकर मंगाए गए पैकेट ने एक सास और बहू के बीच की उस अदृश्य दीवार को हमेशा के लिए तोड़ दिया था, जो अक्सर शक और गलतफहमियों से बन जाती है। विमला जी को समझ आ गया था कि हर बहू पराई नहीं होती, और कभी-कभी बंद दरवाज़ों के पीछे साजिशें नहीं, बल्कि अपनों के लिए खामोश प्यार पनप रहा होता है।
क्या आपके घर में भी कभी किसी छोटी सी गलतफहमी ने बड़ा रूप लिया है? क्या आपको लगता है कि रिश्तों में शक से पहले एक बार प्यार से पूछ लेना चाहिए? अपने अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : महक दुआ