पिता का आँगन – गरिमा चौधरी

“हैलो…. पापा! मैं मेघा… प्रणाम। आप …..माँ…..रोहन….और काव्या.. सब कैसे हैं ?”

फोन के रिसीवर को थामे हुए मेघा के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। उसकी आवाज़ में एक ऐसी घुटन थी, जैसे वह अपने आँसुओं के समंदर को होठों के पीछे रोकने की नाकाम कोशिश कर रही हो।

दूसरी तरफ, शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर, एक पुराने से घर के दालान में बैठे साठ वर्षीय रमाकांत जी के हाथ से चाय का प्याला छूटते-छूटते बचा। चार साल… पूरे चार साल बाद उस फोन से वह आवाज़ गूंजी थी, जिसे सुनने के लिए उनके कान दिन-रात तरसते थे।

“हाँ….मेघा….खुश रहो। बेटा .. तुम और आरव कैसे हो? मेघा ! आज इतने सालों बाद अपने पापा की याद आई, बेटा? तीन साल का हो गया हमारा आरव। बेटा, सब ठीक तो है?

” रमाकांत जी की आवाज़ में कोई शिकायत या गुस्सा नहीं था, बल्कि एक पिता की वही पुरानी फिक्र और वात्सल्य था, जिसने मेघा के दिल पर जमे अभिमान के आखिरी पत्थर को भी चकनाचूर कर दिया।

“पापा…. क्या मैं घर ….आ … जाऊँ…?”

मेघा के मुँह से निकले ये चंद शब्द किसी भारी हथौड़े की तरह रमाकांत जी के सीने पर लगे। उन शब्दों में छिपी पीड़ा, लाचारी और टूटन इतनी गहरी थी कि रमाकांत जी समझ गए कि उनकी लाडली पर कोई बहुत बड़ा पहाड़ टूट पड़ा है।

उन्होंने बिना एक पल की देरी किए, रुंधे हुए गले से कहा, “यह भी कोई पूछने की बात है मेरी बच्ची? यह तेरा घर है। आज भी तेरे कमरे में तेरी किताबें उसी तरह सजी हैं। तू बस आ जा, मैं स्टेशन पर इंतज़ार करूँगा।”

फोन कट गया, लेकिन रमाकांत जी की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उनकी पत्नी सुशीला दौड़कर बाहर आईं। “क्या हुआ जी? किसका फोन था? आप रो क्यों रहे हैं?”

रमाकांत जी ने अपनी धोती के खूंट से आँखें पोंछीं और कांपते होठों से मुस्कुराते हुए बोले, “सुशीला, हमारी मेघा आ रही है। हमारी बच्ची घर लौट रही है।” यह सुनते ही सुशीला वहीं ज़मीन पर बैठ गईं और भगवान की मूरत के सामने हाथ जोड़कर सुबकने लगीं। घर के दोनों छोटे बच्चे, रोहन और काव्या भी अपनी दीदी के आने की खबर सुनकर भावुक हो गए।

मेघा का अतीत एक ऐसी भूल भुलैया था जिसमें वह खुद अपनी मर्जी से खो गई थी। चार साल पहले, मेघा घर की सबसे चहेती और होनहार बेटी हुआ करती थी। रमाकांत जी एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन उन्होंने मेघा की पढ़ाई और खुशियों में कभी कोई कमी नहीं आने दी। मेघा का सपना था एक बड़ी नौकरी पाने का,

लेकिन इसी बीच उसकी ज़िंदगी में सुशांत आ गया। सुशांत देखने में आकर्षक था और बड़ी-बड़ी बातें करने में माहिर था। मेघा उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों के जाल में इस कदर फंस गई कि उसे अपने माता-पिता का प्यार और उनका अनुभव सब झूठा लगने लगा।

जब मेघा ने सुशांत से शादी करने की बात घर में रखी, तो रमाकांत जी ने सुशांत के बारे में पूरी जानकारी निकलवाई। उन्हें पता चला कि सुशांत की कोई पक्की नौकरी नहीं है और उसके परिवार का मोहल्ले में नाम बहुत खराब है। रमाकांत जी ने मेघा को बहुत समझाया, “बेटा, प्यार और असल ज़िंदगी में बहुत फर्क होता है। जो इंसान अपने पैरों पर खड़ा नहीं है, वह तुम्हारी ज़िम्मेदारी कैसे उठाएगा? तुम भावनाओं में बहकर अपना भविष्य मत बिगाड़ो।”

लेकिन जवानी के अंधेपन में मेघा को पिता की यह सीख दुश्मनी लगी। उसने पूरे परिवार के सामने बगावत कर दी। उस मनहूस रात को मेघा ने अपना सामान बांधा और दरवाज़े पर खड़े होकर अपने पिता से वो शब्द कहे थे, जो आज भी रमाकांत जी के कानों में सीसे की तरह चुभते थे— “पापा, आप मेरी खुशियों के दुश्मन हैं। सुशांत के बिना मैं जी नहीं सकती। और अगर आप हमारी शादी के खिलाफ हैं, तो आज से समझ लीजिये कि आपकी बेटी मर गई। मैं इस घर की चौखट पर अब कभी कदम नहीं रखूंगी।”

और वह चली गई। सुशीला रोती रही, रोहन और काव्या दीदी को रोकते रहे, लेकिन मेघा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने सुशांत से कोर्ट मैरिज कर ली। शुरुआत के कुछ महीने तो किसी मीठे सपने जैसे बीते, लेकिन जैसे ही प्यार का खुमार उतरा, असलियत सामने आने लगी। सुशांत कोई काम नहीं करता था। दिन भर दोस्तों के साथ घूमना और घर आकर मेघा की थोड़ी बहुत कमाई पर ऐश करना उसकी आदत बन गई थी। जब मेघा ने इसका विरोध किया, तो बात-बात पर झगड़े होने लगे।

एक साल बाद मेघा ने आरव को जन्म दिया। उसे लगा कि शायद बच्चे के आने से सुशांत में ज़िम्मेदारी का अहसास जागेगा। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। सुशांत ने बच्चे के खर्चों से चिढ़कर शराब पीना शुरू कर दिया। घर में राशन तक के पैसे नहीं होते थे। मेघा अपनी छोटी सी नौकरी से घर चलाती, बच्चे को पालती और रात को सुशांत की गालियां सुनती। जब भी वह टूटकर बिखरने लगती, उसे अपनी माँ के आँचल की याद आती, अपने पापा के मजबूत कंधों की याद आती। कई बार उसने फोन उठाया कि पापा को कॉल कर ले, लेकिन उसका ‘अभिमान’ और ‘शर्म’ उसके हाथ बांध देते। वह सोचती, “किस मुँह से फोन करूँ? मैंने ही तो कहा था कि मैं कभी वापस नहीं आऊंगी। अब अगर अपनी दुर्दशा बताऊंगी, तो पापा कहेंगे कि मैंने तो पहले ही कहा था।”

लेकिन आज, एक ऐसी घटना घटी जिसने मेघा के सब्र का बांध तोड़ दिया। आरव को पिछले दो दिन से तेज़ बुखार था। मेघा के पास दवा लाने के लिए पैसे नहीं थे। उसने सुशांत से पैसे मांगे, तो सुशांत ने उसे धक्का देकर ज़मीन पर गिरा दिया और घर का बचा-खुचा पैसा लेकर शराब पीने चला गया। ज़मीन पर पड़ी मेघा ने जब अपने तीन साल के बच्चे को तपते हुए देखा, जो बेहोशी की हालत में ‘नाना-नानी’ बड़बड़ा रहा था (क्योंकि मेघा उसे अक्सर अपने बचपन की कहानियाँ सुनाती थी), तो मेघा के अंदर की माँ जाग उठी। उसका सारा अभिमान, सारी शर्म उस बुखार के आगे भस्म हो गई। उसने समझ लिया कि झूठे प्यार की खातिर वह अपने बच्चे की बलि नहीं चढ़ा सकती। उसने उसी पल अपना पुराना सूटकेस निकाला, आरव को सीने से लगाया और चार साल बाद अपने पिता का नंबर डायल कर दिया।

ट्रेन का सफर मेघा के लिए सदियों लंबा लग रहा था। आरव उसकी गोद में सोया हुआ था। खिड़की से बाहर देखते हुए मेघा को वो सारी पुरानी बातें याद आ रही थीं। कैसे पापा उसे अपने कंधों पर बिठाकर मेला घुमाते थे, कैसे माँ उसकी एक छींक पर पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। “क्या वो मुझे सच में माफ़ कर पाएंगे? क्या रोहन और काव्या मुझसे बात करेंगे?” ये सवाल मेघा के दिल को कचोट रहे थे।

आखिरकार ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुंची। मेघा ने कांपते पैरों से स्टेशन पर कदम रखा। भीड़ के बीच उसकी नज़रें किसी को ढूंढ रही थीं। तभी उसे प्लेटफार्म के एक कोने में एक बूढ़ा शरीर दिखाई दिया। रमाकांत जी के बाल अब पूरी तरह सफेद हो चुके थे, उनकी कमर थोड़ी झुक गई थी और उन्होंने एक पुराना सा स्वेटर पहन रखा था। मेघा को देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गई। वे तेज कदमों से मेघा की तरफ बढ़े।

मेघा से और रुका नहीं गया। वह दौड़कर गई और अपना सूटकेस वहीं छोड़कर सीधे अपने पिता के पैरों में गिर पड़ी। प्लेटफार्म पर लोगों की भीड़ थी, लेकिन मेघा को किसी की परवाह नहीं थी। वह फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दीजिये पापा… मुझे माफ़ कर दीजिये! मैं बहुत घमंडी थी, बहुत अंधी थी। आपने सही कहा था पापा… दुनिया में माँ-बाप से बढ़कर कोई सगा नहीं होता। मैंने आपको बहुत दुख दिया है…”

रमाकांत जी की आँखों से भी आँसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उन्होंने झुककर अपनी बेटी को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। “पागल लड़की… एक पिता अपनी संतान से कभी रूठ सकता है क्या? तूने जो किया वो तेरा बचपना था, लेकिन मेरा प्यार तो कोई कच्चा धागा नहीं जो टूट जाता। रोना बंद कर मेरी बच्ची, अब तू अपने पापा के पास आ गई है, अब कोई तुझे रुलाने की हिम्मत नहीं कर सकता।”

रमाकांत जी ने फिर अपनी नज़र नीचे की, जहाँ तीन साल का मासूम आरव बड़ी-बड़ी आँखों से उन्हें देख रहा था। रमाकांत जी ने आरव को अपनी गोद में उठा लिया। आरव ने अपने छोटे-छोटे हाथों से उनके गालों को छुआ। रमाकांत जी ने उसे चूमते हुए कहा, “मेरा शेर बेटा! आज मेरे घर में फिर से खुशियों की किलकारी गूंजेगी।”

जब मेघा घर पहुंची, तो दरवाज़े पर माँ सुशीला आरती की थाल लिए खड़ी थीं। रोहन और काव्या भी दीदी को देखकर रो पड़े। किसी ने मेघा से कोई सवाल नहीं किया, किसी ने सुशांत का नाम तक नहीं लिया। उस घर में कोई ताना नहीं था, कोई उलाहना नहीं था, बस एक खोई हुई बेटी के लौटने का जश्न था। सुशीला ने आरव को अपनी गोद में लेकर उसे ढेर सारा प्यार किया और मेघा को अपने आँचल में छुपा लिया।

रात को जब मेघा अपने पुराने कमरे में सोने गई, तो उसने देखा कि उसकी किताबों की शेल्फ, उसका गिटार, उसकी बचपन की तस्वीरें सब कुछ बिल्कुल वैसे ही सजी थीं जैसे वह चार साल पहले छोड़कर गई थी। रमाकांत जी रोज़ उस कमरे की सफाई करते थे, इस उम्मीद में कि उनकी चिड़िया एक दिन जरूर अपने घोंसले में लौटेगी।

अगले दिन सुबह मेघा जब आँगन में आई, तो रमाकांत जी धूप में बैठकर आरव को कोई कहानी सुना रहे थे। मेघा उनके पास गई और ज़मीन पर बैठ गई।

“पापा, अब मैं वापस उस नर्क में कभी नहीं जाउंगी। लेकिन मैं आप लोगों पर बोझ भी नहीं बनना चाहती। मैं कल से ही कोई नौकरी ढूंढ़ना शुरू कर दूंगी। मैं आरव को एक अच्छी ज़िंदगी देना चाहती हूँ।”

रमाकांत जी ने मेघा के सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर बोले, “तू बोझ नहीं, हमारी ताकत है मेघा। और रही बात नौकरी की, तो तू ज़रूर काम करेगी। लेकिन किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने के लिए। हम सब तेरे साथ हैं। समाज क्या कहेगा, रिश्तेदार क्या कहेंगे, इसकी चिंता तू मुझ पर छोड़ दे। जब तक तेरा यह बूढ़ा बाप ज़िंदा है, तेरे और आरव के बीच कोई भी मुसीबत नहीं आ सकती।”

उस दिन मेघा ने महसूस किया कि असल प्यार वो नहीं जो झूठे वादों की चादर ओढ़ाकर अंधा कर दे, बल्कि असल प्यार तो वो है जो आपकी हर गलती, हर कड़वाहट और हर अभिमान को भूलकर, आपको गिरते समय अपने मजबूत हाथों से थाम ले। मायका सिर्फ एक घर नहीं होता, यह एक बेटी के लिए वह सुरक्षित किला होता है जिसकी नींव माता-पिता के निस्वार्थ वात्सल्य और क्षमा पर टिकी होती है। मेघा ने अपनी ज़िंदगी की एक नई शुरुआत की, एक ऐसी शुरुआत जिसमें कोई पछतावा नहीं था, बल्कि अपनों के साथ का एक अटूट विश्वास था।

एक सवाल आप सभी से: क्या समाज की परवाह किए बिना, एक तलाकशुदा या सताई हुई बेटी को उसके मायके में पूरा सम्मान और शरण मिलनी चाहिए? या बेटियों को सिर्फ ‘पराया धन’ समझकर उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए? अपने विचार ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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