विवाह की तैयारियों के बीच घर में चारों ओर रिश्तेदारों की चहल-पहल थी। फूलों की महक और शहनाई की धीमी धुनों के बीच एक कमरे में कुछ अजीब सी खामोशी छाई हुई थी।
रिया अपने सूटकेस में कपड़े रखते हुए बार-बार रुक जाती थी। उसके चेहरे पर शादी की खुशी से ज्यादा एक अनजानी सी चिंता और घबराहट साफ़ झलक रही थी। दरवाजे के पास खड़े अविनाश ने अपनी होने वाली पत्नी के चेहरे पर छाई इस उदासी को पढ़ लिया था।
वह धीरे से कमरे के अंदर आया और रिया के कांपते हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। रिया ने नजरें उठाईं तो उसकी आँखों में आंसू तैर रहे थे। उसने रुंधे हुए गले से कहा, “अविनाश, मैं सच कहूँ तो मुझे बहुत डर लग रहा है।
कल हमारी शादी है और उसके बाद मुझे तुम्हारे घर जाना है। तुम्हारी सौतेली माँ, तुम्हारे सौतेले देवर-ननद… मैंने बचपन से लेकर आज तक कहानियों और टीवी सीरियल्स में सौतेले रिश्तों के बारे में बहुत बुरा सुना है। क्या मैं उस घर में कभी अपनी जगह बना पाऊँगी? क्या मुझे वो प्यार मिल पाएगा?”
अविनाश ने एक गहरी और शांत साँस ली। उसने रिया को पास रखे सोफे पर बैठाया और बहुत ही कोमलता से उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “रिया! कहने के लिए मयंक और शिखा मेरे सौतेले भाई-बहन हैं
तथा माँ सौतेली हैं, पर माँ ने मुझे अपने सगे बेटे से बढ़कर माना है। बाबूजी ने सिर्फ़ मेरी ख़ुशी के लिए यह विवाह किया था। मेरी मौसी की सगी ननद हैं माँ। जो डर आज तुम्हारे मन में है, वो सिर्फ समाज की बनाई हुई एक छवि है, लेकिन मेरी माँ ने उस छवि को अपने तप और त्याग से पूरी तरह मिटा दिया है।”
रिया चुपचाप अविनाश को देखने लगी। अविनाश की आँखों में एक अजीब सी चमक और अपनी माँ के प्रति अथाह श्रद्धा थी। उसने रिया का हाथ सहलाते हुए अपने अतीत के पन्ने खोलने शुरू किए।
“मैं मुश्किल से पांच साल का था जब मेरी सगी माँ, रेवती, मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं। उस छोटी सी उम्र में मुझे मृत्यु का मतलब नहीं पता था। मैं बस अपनी माँ के आंचल के लिए रोता रहता था। मेरे बाबूजी, दीनानाथ जी, माँ के जाने के बाद पूरी तरह टूट चुके थे। वे दिन भर दफ्तर में रहते और रात को मुझे सीने से लगाकर रोते थे। घर की हालत बद से बदतर होती जा रही थी। एक छोटे बच्चे को पिता का साया तो मिल सकता है, लेकिन माँ की ममता का कोई विकल्प नहीं होता। मेरी यह हालत मेरी मौसी से नहीं देखी गई। उन्होंने बाबूजी को दूसरा विवाह करने की सलाह दी। बाबूजी इसके सख्त खिलाफ थे। उन्हें डर था कि कोई भी नई औरत आकर मेरे साथ सौतेला व्यवहार करेगी। लेकिन मौसी ने बाबूजी को समझाया कि वह कोई गैर नहीं, बल्कि अपने ही पति की छोटी बहन यानी मेरी मौसी की सगी ननद ‘यशोदा’ का रिश्ता लेकर आई हैं। यशोदा माँ स्वभाव से बहुत ही शांत, दयालु और समझदार थीं। बाबूजी ने यह विवाह अपने लिए नहीं, बल्कि केवल मेरी खुशियों और मेरे भविष्य को सुरक्षित करने के लिए किया था।”
अविनाश कुछ पल के लिए रुका, जैसे उन पुरानी यादों को दोबारा जी रहा हो। रिया अब पूरी तन्मयता से उसे सुन रही थी।
“जिस दिन माँ इस घर में ब्याह कर आईं, घर के कुछ दूर के रिश्तेदारों ने कानाफूसी शुरू कर दी थी कि अब इस अनाथ बच्चे का क्या होगा। लेकिन माँ ने गृह-प्रवेश करते ही सबसे पहले मुझे अपनी गोद में उठा लिया। उन्होंने मेरे बाबूजी से साफ कह दिया था कि ‘मैं इस घर में आपकी पत्नी बनकर बाद में आई हूँ, पहले इस बच्चे की माँ बनकर आई हूँ।’ रिया, तुम्हें शायद यकीन न हो, लेकिन माँ ने घर के किसी भी कोने से मेरी सगी माँ की तस्वीरें नहीं हटाईं। जब भी मैं रात को डर कर रोता, तो वे मुझे अपनी छाती से चिपका कर लोरी गातीं।
कुछ सालों बाद मयंक और शिखा का जन्म हुआ। रिश्तेदारों ने फिर से ज़हर घोलना शुरू कर दिया। वे लोग अक्सर घर आते और मेरे कान में फुसफुसाते कि ‘अब तो यशोदा के अपने बच्चे हो गए हैं, अब वह तुझे पहले जैसा प्यार नहीं करेगी, अब तू इस घर में पराया हो जाएगा।’ मैं छोटा था, मेरी समझ कच्ची थी, इसलिए एक बार मैं उन रिश्तेदारों की बातों में आ गया। मैं कई दिनों तक माँ से कटा-कटा रहने लगा। एक दिन जब मयंक ने गलती से मेरा एक मिट्टी का खिलौना तोड़ दिया, तो मैं जोर-जोर से रोने लगा और मैंने चिल्लाकर कह दिया कि तुम लोग सौतेले हो, कोई मुझसे प्यार नहीं करता।
मेरी इस बात पर बाबूजी से ज्यादा माँ तड़प उठी थीं। उन्होंने उसी वक्त मयंक को, जो कि मुश्किल से तीन साल का था, एक जोरदार तमाचा जड़ दिया और उसे कमरे में बंद कर दिया। उसके बाद माँ ने उन रिश्तेदारों को घर से धक्के मारकर निकाल दिया जो मेरे मन में ज़हर घोल रहे थे। उस दिन माँ मेरे सामने फूट-फूट कर रोई थीं। उन्होंने मुझे गले लगाकर कहा था कि ‘तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा, लेकिन तू मेरी आत्मा से जुड़ा है। ये दोनों (मयंक और शिखा) मेरे शरीर के हिस्से हो सकते हैं, लेकिन तू मेरे दिल की धड़कन है।’ उस दिन के बाद से मैंने कभी ‘सौतेला’ शब्द अपनी जुबान पर नहीं लाया।”
रिया की आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। वह उस महान औरत के बारे में सोचकर अंदर तक सिहर उठी थी, जिसके बारे में उसने बिना जाने ही गलत धारणा बना ली थी।
अविनाश ने अपनी बात जारी रखी, “रिया, समाज कहता है कि सगे बच्चे सबसे प्यारे होते हैं, लेकिन मेरी माँ ने इस बात को हर कदम पर झुठलाया है। जब हम तीनों बड़े हो रहे थे, तो बाबूजी के व्यापार में भारी नुकसान हुआ। हमारी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। उसी समय मेरा इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले का वक्त आ गया था, जिसके लिए बहुत बड़ी रकम की जरूरत थी। बाबूजी ने हार मान ली थी। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं किसी साधारण कॉलेज से बी.ए. कर लूँ और मयंक की पढ़ाई के लिए भी कुछ पैसे बचाकर रखूँ।
लेकिन मेरी माँ ने ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने बिना बाबूजी को बताए, अपने मायके से मिले हुए सारे पुश्तैनी गहने और अपनी शादी का सबसे कीमती हार सुनार को बेच दिया। जब बाबूजी ने इसका विरोध किया और कहा कि कल को मयंक और शिखा के भविष्य के लिए भी पैसों की जरूरत पड़ेगी, तो माँ का जवाब आज भी मेरे कानों में गूंजता है। माँ ने कहा था—’मेरे बड़े बेटे का इस घर और मेरे त्याग पर पहला हक है। इसने बचपन में माँ को खोने का दर्द सहा है, मैं इसे अपने सपनों को खोने का दर्द नहीं सहने दूंगी। मयंक और शिखा तो किसी तरह एडजस्ट कर लेंगे, लेकिन अविनाश की उम्मीदें नहीं टूटनी चाहिए।’
रिया, माँ के उन गहनों की बदौलत ही आज मैं इस मुकाम पर पहुँचा हूँ। और तुम जानती हो सबसे बड़ी बात क्या है? मयंक और शिखा के मन में मेरे लिए कभी कोई ईर्ष्या नहीं आई। माँ ने उन दोनों की परवरिश ही ऐसे सांचे में की है कि वे मुझे अपने पिता के समान मानते हैं। मयंक ने कभी शिकायत नहीं की कि उसे महँगे कपड़े क्यों नहीं मिले, शिखा ने कभी ज़िद नहीं की कि उसकी फीस क्यों रोकी गई। उन दोनों के लिए उनका ‘अविनाश भइया’ ही उनकी दुनिया है।”
अविनाश ने रिया का चेहरा अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हें शायद डर है कि तुम वहाँ कैसे रहोगी? रिया, शिखा पिछले एक महीने से तुम्हारे स्वागत की तैयारियां कर रही है। मयंक ने अपना पूरा ऑफिस का काम छोड़ रखा है ताकि वह शादी के सारे इंतज़ाम देख सके। और माँ… माँ ने पिछले पच्चीस सालों से मेरी सगी माँ, रेवती जी के वो सारे जेवर जो उन्होंने अपनी बहू के लिए बनवाए थे, उन्हें तिजोरी में सहेज कर रखा है। माँ ने अपने हाथों से उन जेवरों को पॉलिश करवाया है ताकि कल जब तुम उस घर में कदम रखो, तो वे जेवर तुम्हें सौंप सकें। जो माँ अपने सगे बच्चों की खुशियों से पहले मेरे सपनों को रखती है, क्या वह कभी तुम्हारी आँखों में आंसू आने देगी?”
रिया अब खुद को रोक नहीं पाई। वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसके सारे डर, सारे पूर्वाग्रह, समाज की वो सारी सड़ी-गली बातें जो उसके दिमाग में भरी गई थीं, सब अविनाश के इन शब्दों के साथ बह गए। उसने अविनाश को गले लगा लिया और सिसकते हुए कहा, “मुझे माफ़ कर दो अविनाश। मैंने बिना मिले ही अपनी सासू माँ और अपने देवर-ननद के बारे में कितना गलत सोच लिया था। मैं सच में बहुत भाग्यशाली हूँ जो मुझे एक ऐसा परिवार मिलने जा रहा है, जहाँ खून से ज्यादा प्रेम और त्याग का महत्व है।”
अगले दिन विवाह बहुत ही धूमधाम से संपन्न हुआ। जब रिया विदा होकर अपने ससुराल पहुँची, तो दरवाजे पर एक बेहद सौम्य, शांत और ममतामयी चेहरे वाली महिला आरती की थाली लिए खड़ी थी। उनके चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आँखों में वात्सल्य का एक अथाह समंदर था। यह यशोदा माँ थीं।
रिया जैसे ही गाड़ी से उतरी, मयंक और शिखा ने दौड़कर उसके पैर छुए और उसे “भाभी माँ” कहकर संबोधित किया। रिया की आँखें फिर से छलक आईं। वह धीरे-धीरे चलकर यशोदा माँ के पास गई। रीति-रिवाजों के अनुसार उसे माँ के पैर छूने थे, लेकिन रिया ने पैर छूने के बजाय सीधे यशोदा माँ को अपने गले से लगा लिया।
यशोदा माँ एक पल के लिए चौंकीं, लेकिन फिर उन्होंने अपनी होने वाली बहू को अपनी ममतामयी बाहों में भर लिया। रिया ने रोते हुए उनके कान में फुसफुसाया, “अविनाश ने सही कहा था माँ, आप सिर्फ उनकी यशोदा नहीं, मेरी भी यशोदा माँ हैं। मुझे इस घर की बहू नहीं, अपनी बेटी बनाकर रखिएगा।”
यशोदा माँ ने रिया का माथा चूम लिया और रुंधे हुए गले से कहा, “मेरा अविनाश मेरी जान है बेटी, और जो मेरी जान की खुशियों का कारण है, वो मेरी बहू नहीं, मेरी ही आत्मा का हिस्सा है। इस घर में तुम्हारा स्वागत है।”
उस दिन उस घर के आंगन में एक नया रिश्ता पनप रहा था। एक ऐसा रिश्ता जिसने साबित कर दिया कि दुनिया में कोई भी शब्द बुरा नहीं होता, ना ही कोई रिश्ता जन्म से सौतेला होता है। जब दिलों में प्यार, सम्मान और निस्वार्थ त्याग की भावना हो, तो सौतेले रिश्ते भी सगे खून से ज्यादा गाढ़े और पवित्र हो जाते हैं। उस घर की दीवारों ने आज एक माँ के उस वात्सल्य को अपनी पूर्णता पर पहुँचते देखा था, जिसने समाज के तानों और पूर्वाग्रहों की परवाह किए बिना अपने प्रेम से एक ऐसे स्वर्ग की रचना की थी, जहाँ ईर्ष्या या भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं थी।
**एक छोटा सा सवाल आप सभी से:** क्या आपने भी कभी समाज की सुनी-सुनाई बातों में आकर किसी रिश्ते या इंसान के बारे में गलत धारणा बनाई है, और बाद में उस इंसान की अच्छाई ने आपका दिल जीत लिया हो? अपने अनुभव जरूर साझा करें।
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