“नाटक मत कीजिए भैया!” नंदिनी की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई। “पिताजी का यह मकान करोड़ों का है। आपने मुझे एक मामूली सी शादी देकर घर से विदा कर दिया और पूरी जायदाद पर कुंडली मारकर बैठ गए। विकास का बिज़नेस डूब रहा है और उन्हें पैसों की सख्त ज़रूरत है। मुझे इस घर में अपना आधा हिस्सा चाहिए, या फिर आप इस घर को बेचकर मुझे मेरे हिस्से के पैसे दे दीजिये।”
यह कहानी शहर के एक शांत और पुराने मोहल्ले से शुरू होती है। माधव और उसकी पत्नी सुजाता का जीवन बहुत ही साधारण लेकिन सुकून भरा था। माधव जब महज़ बाइस साल का था, तब एक भीषण सड़क दुर्घटना में उसके माता-पिता का साया उसके सिर से उठ गया था। उस वक़्त उसकी छोटी बहन नंदिनी सिर्फ छह साल की थी।
माता-पिता के जाने के बाद रिश्तेदारों ने तो जैसे मुँह ही मोड़ लिया था। उस छोटी सी उम्र में माधव ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और पिता की एक छोटी सी किराने की दुकान को संभाल लिया। उसने अपनी बहन नंदिनी को कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि वह अनाथ है। माधव ने उसके लिए एक भाई के साथ-साथ एक पिता और एक माँ की भूमिका भी निभाई।
कुछ सालों बाद माधव के जीवन में सुजाता आई। सुजाता एक बेहद समझदार और ममतामयी स्त्री थी। उसने शादी के बाद नंदिनी को अपनी ननद नहीं बल्कि अपनी सगी बेटी की तरह पाला। नंदिनी के स्कूल के टिफिन से लेकर उसकी कॉलेज की फीस तक, सुजाता ने कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी।
यहाँ तक कि नंदिनी की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए सुजाता ने अपने मायके से मिले गहने तक हंसते-हंसते बेच दिए थे। माधव और सुजाता ने खुद फटे-पुराने कपड़े पहने, लेकिन नंदिनी के हर शौक पूरे किए। नंदिनी भी अपने भैया-भाभी की जान थी।
वक्त पंख लगाकर उड़ने लगा। नंदिनी की पढ़ाई पूरी हुई और माधव ने एक बहुत ही संभ्रांत परिवार में, अपनी हैसियत से बढ़कर कर्जा लेकर नंदिनी की शादी एक पढ़े-लिखे लड़के, विकास से कर दी। शादी के शुरुआती दो-तीन साल तो बहुत अच्छे बीते, लेकिन धीरे-धीरे विकास की असली फितरत सामने आने लगी।
विकास एक बेहद महत्वाकांक्षी और लालची किस्म का इंसान था। वह हमेशा शॉर्टकट से पैसे कमाने की सोचता था। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक व्यापार शुरू किया था जो बुरी तरह डूब गया। अब उस पर लाखों का कर्ज था।
विकास की नज़र हमेशा से माधव के उस पुराने पुश्तैनी मकान पर थी जो बाज़ार के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित था और अब उसकी कीमत करोड़ों में हो चुकी थी। विकास ने नंदिनी के कान भरने शुरू कर दिए।
वह रोज़ उसे ताने मारता कि उसके भाई ने शादी में कुछ खास नहीं दिया और माता-पिता की इकलौती जायदाद पर कब्ज़ा करके बैठ गया है। “नंदिनी, उस घर पर आधा हक तुम्हारा भी है। तुम्हारे पिता ने वह घर तुम दोनों के लिए छोड़ा था। माधव ने तुम्हें एक साधारण सी शादी देकर विदा कर दिया और खुद करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन गया। अगर तुम अपने हिस्से के पैसे ले आओ, तो मेरा डूबा हुआ व्यापार फिर से खड़ा हो सकता है,” विकास अक्सर यही रट लगाए रहता।
शुरुआत में नंदिनी ने इन बातों का विरोध किया। उसे अपने भैया-भाभी का प्यार याद था। लेकिन दिन-रात एक ही बात सुनते-सुनते और पति के मानसिक दबाव के कारण, नंदिनी की सोच में भी ज़हर घुलने लगा। उसे लगने लगा कि शायद उसका पति सही कह रहा है। माधव भैया ने उसे हमेशा अँधेरे में रखा और सारी संपत्ति अपने नाम कर ली। पैसे की ज़रूरत और पति के भड़काने पर एक दिन नंदिनी ने वह कर दिया, जिसकी उम्मीद माधव और सुजाता ने सपने में भी नहीं की थी।
रविवार का दिन था। माधव और सुजाता घर के आंगन में बैठकर चाय पी रहे थे। तभी दरवाज़े पर एक कार आकर रुकी और उसमें से नंदिनी और विकास उतरे। माधव अपनी बहन को देखकर खुशी से चहक उठा। “अरे मेरी गुड़िया! तूने आने से पहले बताया क्यों नहीं? सुजाता, देख कौन आया है, जल्दी से नंदिनी के लिए उसकी पसंद का हलवा बना दे,” माधव ने अपनी बहन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
लेकिन नंदिनी के चेहरे पर आज वह पुरानी वाली मुस्कान नहीं थी। उसने माधव का हाथ झटक दिया और रूखेपन से बोली, “भैया, मैं यहाँ हलवा खाने या बचपन की यादें ताज़ा करने नहीं आई हूँ। मैं यहाँ अपना हक मांगने आई हूँ।”
माधव और सुजाता दोनों स्तब्ध रह गए। “हक? कैसा हक मेरी बच्ची? यह पूरा घर तेरा ही तो है,” माधव ने कांपती आवाज़ में कहा।
“नाटक मत कीजिए भैया!” नंदिनी की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई। “पिताजी का यह मकान करोड़ों का है। आपने मुझे एक मामूली सी शादी देकर घर से विदा कर दिया और पूरी जायदाद पर कुंडली मारकर बैठ गए। विकास का बिज़नेस डूब रहा है और उन्हें पैसों की सख्त ज़रूरत है। मुझे इस घर में अपना आधा हिस्सा चाहिए, या फिर आप इस घर को बेचकर मुझे मेरे हिस्से के पैसे दे दीजिये।”
यह सुनकर सुजाता की आँखों में आँसू आ गए। वह आगे आई और नंदिनी का हाथ पकड़कर बोली, “नंदिनी, तू यह क्या कह रही है? क्या तेरे भैया ने कभी तेरे और अपने बीच कोई फर्क किया है? तू ऐसा कैसे सोच सकती है कि हम तेरा हक़ मारेंगे?”
“आप बीच में मत बोलिए भाभी!” नंदिनी ने सुजाता पर भी अपना गुस्सा उतार दिया। “आप दोनों ने मिलकर मुझे बेवकूफ बनाया है। प्यार और वात्सल्य का ढोंग रचकर आपने मेरी संपत्ति हड़प ली है। मुझे बस मेरे कागज़ात और मेरा हिस्सा चाहिए, वरना मैं कानूनी रास्ता अपनाने पर मजबूर हो जाउंगी।”
विकास पीछे खड़ा मन ही मन मुस्कुरा रहा था। माधव का दिल किसी ने जैसे मुट्ठी में भींच लिया था। जिस बहन को उसने अपनी उँगलियाँ पकड़कर चलना सिखाया था, जिसके लिए उसने अपनी जवानी के हर सुख का गला घोंट दिया था, आज वही बहन उसे एक लालची और धोखेबाज़ इंसान समझ रही थी। माधव की आँखों से एक आँसू छलक कर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसने सुजाता को शांत रहने का इशारा किया। वह बिना एक शब्द कहे अपने कमरे में गया और अलमारी से एक पुरानी सी फाइल निकालकर लाया।
माधव ने वह फाइल नंदिनी के हाथों में थमा दी। “तुझे तेरा हिस्सा चाहिए था ना नंदिनी? यह ले। इसमें तेरे सारे सवालों के जवाब और तेरे हिस्से के कागज़ात हैं। जा, इसे आराम से पढ़ लेना। और हाँ, अगर तुझे लगे कि तेरे भाई ने तेरे साथ बेईमानी की है, तो कल ही आकर मुझे अदालत का नोटिस दे देना। मैं बिना लड़े सब कुछ तेरे नाम कर दूँगा।”
माधव की आवाज़ में न तो गुस्सा था और न ही कोई शिकायत, बस एक ऐसा खोखलापन था जो किसी इंसान के अंदर से टूट जाने पर आता है।
नंदिनी ने फाइल पकड़ी और विकास के साथ कार में बैठकर वापस अपने घर आ गई। पूरे रास्ते उसे एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी। माधव भैया की वो खामोशी और सुजाता भाभी की डबडबाई आँखें उसे अंदर ही अंदर कचोट रही थीं।
घर पहुँचते ही विकास ने उत्साह के साथ वह फाइल नंदिनी के हाथों से छीन ली। “देखते हैं तुम्हारे इस महान भाई ने कौन सा खेल खेला है,” विकास ने फाइल खोली। लेकिन फाइल खोलते ही विकास के चेहरे का रंग उड़ने लगा और नंदिनी की धड़कनें तेज़ हो गईं।
फाइल में सबसे ऊपर एक वसीयत और घर के पेपर्स थे। उन पेपर्स को देखते ही नंदिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह मकान, जिसे नंदिनी पुश्तैनी समझ रही थी और जिस पर अपना हक जता रही थी, वह असल में पुश्तैनी था ही नहीं। फाइल में रखे बैंक के दस्तावेज़ चीख-चीख कर गवाही दे रहे थे कि पुश्तैनी घर तो पंद्रह साल पहले ही बिक चुका था।
नंदिनी ने पन्ने पलटे तो उसमें अस्पताल के कुछ बहुत पुराने बिल थे। उसे याद आया कि जब वह आठ साल की थी, तो उसे एक गंभीर बीमारी हो गई थी। डॉक्टरों ने बचने की उम्मीद छोड़ दी थी। उन बिलों से पता चला कि माधव ने उसकी जान बचाने और उसके महंगे इलाज के लिए उस पुश्तैनी मकान को बेच दिया था।
तो फिर यह घर किसका है? नंदिनी ने अगले कागज़ देखे। यह मौजूदा घर माधव ने दस साल पहले भारी बैंक लोन लेकर बनवाया था। और सबसे बड़ा झटका तो नंदिनी को तब लगा जब उसने उस घर की रजिस्ट्री देखी। उस नए घर की रजिस्ट्री में माधव का नहीं, बल्कि ‘नंदिनी’ का नाम लिखा था। माधव ने अपनी जिंदगी भर की खून-पसीने की कमाई से जो घर बनाया था, वह भी उसने अपनी बहन के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उसी के नाम पर कर रखा था।
फाइल में एक और लिफाफा था। नंदिनी ने कांपते हाथों से उसे खोला। उसमें सुजाता भाभी की मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। सुजाता कभी माँ नहीं बन सकती थी। लेकिन इसका कारण कोई प्राकृतिक कमी नहीं थी। रिपोर्ट के साथ माधव की एक पुरानी डायरी का पन्ना था जिसमें लिखा था: “आज सुजाता ने मुझसे कहा कि हम अपना कोई बच्चा पैदा नहीं करेंगे। सुजाता का कहना है कि अगर हमारा अपना बच्चा हो गया, तो शायद हमारा ध्यान नंदिनी से हट जाए और वह खुद को अकेला महसूस करे। सुजाता ने नंदिनी के लिए अपनी कोख सूनी रखने का फैसला किया है। मेरी पत्नी ने मेरे लिए और मेरी बहन के लिए जो त्याग किया है, मैं सात जन्मों तक उसका कर्ज नहीं चुका सकता।”
नंदिनी की आँखों से आँसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह ज़मीन पर धम्म से बैठ गई। उसे महसूस हुआ कि जिस भाई-भाभी ने उसे पालने के लिए अपनी खुशियों की, अपने होने वाले बच्चे की, और अपनी पूरी ज़िंदगी की बलि चढ़ा दी, उसने आज उन्हीं को भरे समाज में ज़लील कर दिया। चंद पैसों के लिए उसने उस भाई को बेईमान कह दिया जो असल में उसका पिता था। उसने उस भाभी का अपमान किया जिसने उसके लिए अपनी कोख तक का बलिदान दे दिया था।
विकास भी दस्तावेज़ देखकर खामोश खड़ा था, उसकी बोलती बंद हो चुकी थी।
नंदिनी ने विकास की तरफ एक नफरत भरी नज़र से देखा। “तुम्हारे लालच ने आज मुझे मेरी ही नज़रों में गिरा दिया। तुमने मुझे उस इंसान से दूर करने की कोशिश की, जो मेरे लिए भगवान से भी बढ़कर है। अब मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी।”
नंदिनी उसी पल उठी। बाहर रात के नौ बज रहे थे और बारिश शुरू हो गई थी। लेकिन नंदिनी को किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। उसने न छाता लिया, न कोई गाड़ी। वह पागलों की तरह भागती हुई, बारिश में भीगते हुए अपने भैया के घर की तरफ दौड़ पड़ी। रास्ते भर उसके दिमाग में बस वही कटु शब्द गूंज रहे थे जो उसने कुछ घंटे पहले अपने भगवान जैसे भाई-भाभी को कहे थे।
जब वह माधव के घर पहुँची, तो दरवाज़ा खुला था। आंगन में अंधेरा था। सुजाता भाभी दालान में एक कोने में सिर झुकाए बैठी रो रही थीं, और माधव ज़मीन पर बैठा शून्य में घूर रहा था।
नंदिनी दौड़कर गई और सीधे सुजाता भाभी के पैरों में गिर पड़ी। उसकी सिसकियों से पूरा घर गूंज उठा।
“नहीं भाभी… मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने गुस्से में आपकी.. अपने पिता समान भाई की इंसल्ट की है भाभी… मुझे माफ़ कर दीजिये…” कहते हुए वह फूट-फूटकर रोने लगी।
सुजाता ने तुरंत झुककर नंदिनी को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। “शांत हो जा मेरी बच्ची, शांत हो जा। तू तो हमारी जान है। बच्चे कभी-कभी भटक जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि माँ-बाप उन्हें दिल से निकाल दें।”
नंदिनी माधव के पास गई और उसके घुटनों पर सिर रख दिया। “भैया, मैं अंधी हो गई थी। मुझे नहीं पता था कि आपने मेरी जान बचाने के लिए पुश्तैनी घर बेच दिया था। मुझे नहीं पता था कि भाभी ने मेरे लिए कितना बड़ा त्याग किया है। मुझे कोई हिस्सा नहीं चाहिए भैया, मुझे बस मेरा पुराना वाला परिवार लौटा दीजिये। मुझे दुनिया की कोई दौलत नहीं चाहिए, मुझे बस आपका आशीर्वाद चाहिए। मुझे माफ़ कर दीजिये भैया, मैं बहुत बुरी हूँ।”
माधव की आँखों से भी आँसू बहने लगे। उसने नंदिनी का सिर चूमा और उसे गले से लगा लिया। “पगली, तू मेरी बेटी है। एक पिता अपनी बेटी से कभी नाराज़ नहीं हो सकता। वह घर, वह सब कुछ तेरा ही तो है। और तू चिंता मत कर, विकास के बिज़नेस का कर्जा भी हम मिलकर चुका देंगे। बस तू इस तरह रोना बंद कर दे।”
उस रात उस घर में बहुत आँसू बहे, लेकिन वो आँसू दुख के नहीं, बल्कि प्यार, प्रायश्चित और एक-दूसरे के प्रति अगाध विश्वास के थे। नंदिनी को समझ आ गया था कि रिश्ते और परिवार दुनिया की हर दौलत से बड़े होते हैं। किसी के भड़काने में आकर अपने निस्वार्थ प्रेम करने वाले परिवार पर शक करना दुनिया का सबसे बड़ा पाप है। उस दिन के बाद नंदिनी ने कभी लालच नहीं किया और विकास ने भी अपने किए की माफ़ी मांगी। माधव और सुजाता का घर फिर से खुशियों और प्यार से महक उठा, क्योंकि जहाँ निस्वार्थ प्रेम होता है, वहाँ गलतफहमियों की उम्र बहुत छोटी होती है।
एक सवाल आप सभी के लिए: क्या पैसों और जायदाद के लिए खून के रिश्तों में कड़वाहट लाना सही है? क्या आपने भी कभी अपने जीवन में ऐसा महसूस किया है कि बाहरी लोगों के भड़काने पर अपनों से दूरियाँ बन गई हों? अपने विचार ज़रूर साझा करें।
**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद**
लेखिका : सीमा श्रीवास्तव