दिवाली बीते अभी कुछ ही दिन हुए थे और आज भाई दूज का पावन पर्व था। शहर के एक शांत और हरे-भरे मोहल्ले में स्थित सुमित्रा देवी के घर में सुबह से ही एक अलग तरह की रौनक बिखरी हुई थी।
घर के आंगन में गेंदे के फूलों और आम के पत्तों की बंदनवार महक रही थी। रसोईघर से आती देसी घी की मिठाइयों और पूड़ियों की खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। यह सब तैयारियां घर की बड़ी बहू, अनन्या कर रही थी।
अनन्या इस घर में सिर्फ एक बहू बनकर नहीं आई थी, बल्कि उसने अपने प्यार और समर्पण से इस घर को एक सूत्र में बांध दिया था। आज उसकी ननद, काव्या अपनी शादी के बाद पहली बार भाई दूज पर मायके आ रही थी, और अनन्या की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
सुमित्रा देवी अपने कमरे से बाहर आईं और रसोई के दरवाजे पर खड़ी होकर अपनी बहू को काम करते हुए देखने लगीं। उनकी आँखों में एक अजीब सा सुकून था।
अक्सर समाज में सास-बहू या ननद-भाभी के रिश्तों को शंका और तनाव की नज़र से देखा जाता है, लेकिन अनन्या ने इन सभी धारणाओं को गलत साबित कर दिया था। जब अनन्या की शादी सुमित्रा देवी के बेटे रोहन से हुई थी, तब काव्या कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी।
काव्या स्वभाव से थोड़ी चुलबुली और जिद्दी थी, लेकिन अनन्या ने कभी उस पर भाभी होने का रौब नहीं जमाया। उसने काव्या को एक दोस्त की तरह समझा, उसकी हर छोटी-बड़ी परेशानी में उसका साथ दिया और धीरे-धीरे काव्या के लिए अनन्या सिर्फ उसकी ‘भाभी’ नहीं, बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त और राजदार बन गई।
सुमित्रा देवी को याद आया कि काव्या की शादी के समय अनन्या ने किस तरह दिन-रात एक कर दिया था। मंडप की सजावट से लेकर काव्या के लहंगे की मैचिंग तक, हर चीज़ अनन्या ने अपनी देख-रेख में करवाई थी। उसी शादी की तैयारियों के दौरान एक ऐसा वाकया हुआ था जिसने अनन्या के दिल पर गहरी छाप छोड़ी थी। एक दिन जब दोनों ननद-भाभी शादी के गहने खरीदने शहर के सबसे बड़े ज्वैलर के यहाँ गई थीं, तब काव्या की नज़र कुंदन के एक बेहद खूबसूरत और भारी नेकलेस पर टिक गई थी। काव्या ने उसे पहनकर भी देखा था, उसकी आँखों में उस नेकलेस के लिए एक अलग ही चमक थी। लेकिन जब ज्वैलर ने उसकी कीमत बताई, तो काव्या ने तुरंत उसे उतार कर रख दिया और मुस्कुराते हुए अनन्या से कहा, “भाभी, यह बहुत भारी है, मुझ पर अच्छा नहीं लग रहा। हम कुछ और देखते हैं।”
अनन्या समझ गई थी कि काव्या ने वह नेकलेस अपनी पसंद की वजह से नहीं, बल्कि उसकी भारी कीमत की वजह से छोड़ा था। वह जानती थी कि काव्या अपने भाई रोहन और परिवार पर शादी का ज्यादा आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती थी। उस दिन अनन्या ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह काव्या को वही नेकलेस ज़रूर पहनाएगी। पिछले छह महीनों में अनन्या ने अपनी सैलरी और बचत के पैसों को जोड़कर, रोहन की मदद से वह नेकलेस काव्या के लिए भाई दूज के तोहफे के रूप में खरीद लिया था। आज उसी नेकलेस का लाल मखमली डिब्बा अनन्या की अलमारी में रखा हुआ था, और वह बेसब्री से उस पल का इंतज़ार कर रही थी जब वह काव्या का खिला हुआ चेहरा देखेगी।
दोपहर के करीब बारह बजे दरवाजे की घंटी बजी। अनन्या ने भागकर दरवाज़ा खोला। सामने काव्या अपने पति के साथ खड़ी थी। काव्या को देखते ही अनन्या ने उसे कसकर गले लगा लिया। दोनों ऐसे मिलीं जैसे सालों बाद बिछड़ी हुई बहनें मिल रही हों। रोहन भी पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा था। घर में चारों तरफ हंसी-ठिठोली गूंजने लगी। सुमित्रा देवी ने अपनी बेटी की बलाएं लीं और दामाद का स्वागत किया। काव्या पूरे घर में ऐसे घूम रही थी जैसे कोई चिड़िया अपने पुराने घोंसले में लौट आई हो।
कुछ देर बाद भाई दूज के तिलक की रस्म शुरू हुई। काव्या ने रोहन के माथे पर रोली और चंदन का टीका लगाया, उसकी आरती उतारी और उसे मिठाई खिलाई। रोहन ने भी प्यार से अपनी बहन के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। रस्म पूरी होने के बाद, अनन्या धीरे से अपने कमरे में गई और वह लाल मखमली डिब्बा लेकर बाहर आई। उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे पूरी उम्मीद थी कि इस तोहफे को देखकर काव्या खुशी से उछल पड़ेगी और उसकी आँखों में खुशी के आंसू आ जाएंगे।
अनन्या ने मुस्कुराते हुए वह डिब्बा काव्या की तरफ बढ़ाया और प्यार से कहा, “काव्या, यह मेरी और तुम्हारे भैया की तरफ से तुम्हारे लिए एक छोटा सा तोहफा है। मुझे पता है तुम्हें यह बहुत पसंद आएगा।”
काव्या ने उत्सुकता से डिब्बा लिया। रोहन भी वहीं सोफे पर बैठा इस पूरे नज़ारे को देख रहा था। काव्या ने जैसे ही डिब्बा खोला, उसकी नज़र उस कुंदन के नेकलेस पर पड़ी। यह वही नेकलेस था जिसे उसने छह महीने पहले उस गहनों की दुकान में भारी मन से छोड़ दिया था।
लेकिन यहाँ वो नहीं हुआ जिसकी अनन्या को उम्मीद थी।
नेकलेस को देखते ही काव्या के चेहरे के भाव अचानक बदल गए। उसकी मुस्कान गायब हो गई और उसकी जगह एक अजीब सी कठोरता ने ले ली। उसने डिब्बे को ज़ोर से मेज पर पटक दिया। डिब्बे के टकराने की आवाज़ से पूरा कमरा गूंज उठा। सुमित्रा देवी भी जो पास ही बैठी थीं, बुरी तरह चौंक गईं।
“भाभी… ये क्या है!” काव्या ने तेज़ और गुस्से भरी आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में जैसे शोले भड़क रहे हों।
अनन्या बुरी तरह घबरा गई। उसकी मुस्कान होठों पर ही जम गई। “क… क्या हुआ काव्या? तुम्हें पसंद नहीं आया? यह तो वही नेकलेस है ना जो तुमने…”
“पसंद की बात नहीं है भाभी!” काव्या ने अनन्या की बात बीच में ही काटते हुए कहा। “आपको क्या लगता है, मैं यहाँ मायके में आपसे महंगे-महंगे तोहफे बटोरने आती हूँ? शादी हो गई है मेरी, अब मैं इस घर की बेटी से ज्यादा किसी और घर की बहू हूँ। क्या आप मुझे इस तरह के भारी-भरकम एहसानों तले दबाकर यह साबित करना चाहती हैं कि मेरा ससुराल मुझे यह सब नहीं दे सकता? या आप मुझे पराया समझकर ऐसे महंगे तोहफे देकर अपना फर्ज़ पूरा कर रही हैं?”
अनन्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि काव्या ऐसा कुछ कहेगी। उसका गला रुंध गया और आँखों में आंसू तैरने लगे। उसने तो बस अपनी ननद को खुश देखने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी थी, और यहाँ काव्या उसे ही ताने मार रही थी।
“नहीं काव्या… मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था,” अनन्या ने कांपती आवाज़ में सफाई देने की कोशिश की। “मैंने तो बस तुम्हारी खुशी के लिए…”
तभी रोहन, जो अब तक चुपचाप बैठा था, अचानक काव्या के समर्थन में बोल पड़ा। “काव्या सही कह रही है अनन्या। तुम भी ना, कभी-कभी बिना सोचे-समझे कुछ भी कर देती हो। काव्या अब पराये घर की है, उसे इतने महंगे तोहफे देकर तुमने उसे अजीब स्थिति में डाल दिया है। क्या ज़रूरत थी यह सब करने की? तुम्हें उसकी भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए था।”
अपने पति को भी काव्या के सुर में सुर मिलाते देख अनन्या का दिल पूरी तरह टूट गया। उसे लगा जैसे आज उसका सारा प्यार, उसकी सारी मेहनत एक झटके में मिट्टी में मिल गई हो। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। वह बस सिर झुकाए खड़ी रही, उसकी आँखों से एक आंसू छलक कर उसके गाल पर आ गिरा। वह वहां से मुड़कर अपने कमरे में जाने ही वाली थी कि अचानक पीछे से एक ज़ोरदार ठहाका गूंजा।
“हा-हा-हा-हा!”
अनन्या ठिठक गई और उसने पलटकर देखा। काव्या अपने दोनों हाथों से पेट पकड़े ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी। रोहन भी सोफे पर गिरकर लोट-पोट हो रहा था। उन दोनों की हंसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
अनन्या पूरी तरह से स्तब्ध थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अभी-अभी जो काव्या आग बबूला हो रही थी, वह अचानक पागलों की तरह क्यों हंस रही है।
काव्या ने अपनी हंसी पर थोड़ा काबू पाते हुए कहा, “ओह गॉड! भैया, देखो… देखो भाभी का चेहरा कैसा हो गया है! बिल्कुल रोतलू बच्चों जैसा। हा-हा-हा!”
रोहन ने भी हंसते हुए कहा, “मैंने तो पहले ही कहा था काव्या, तेरी भाभी बहुत भोली है, तुरंत तुम्हारी बातों में आ जाएगी। और देख, सच में रोने लगी!”
अनन्या अब पूरी बात समझ चुकी थी। यह काव्या और रोहन की मिली-जुली एक भयंकर शरारत थी। उन दोनों ने मिलकर उसे बेवकूफ बनाया था। अनन्या के चेहरे पर अब अविश्वास, राहत और थोड़ा सा गुस्सा एक साथ उभर आया। उसने अपने आंसू पोंछे और एक कुशन उठाकर रोहन की तरफ ज़ोर से फेंका।
“तुम दोनों… तुम दोनों पागल हो गए हो क्या!” अनन्या ने बनावटी गुस्से से चिल्लाते हुए कहा। “मेरी तो जान ही निकल गई थी! मुझे लगा मैंने सच में कुछ बहुत बड़ी गलती कर दी है। ऐसे कोई डराता है क्या?”
काव्या दौड़कर अनन्या के पास आई और उसे कसकर गले लगा लिया। इस बार काव्या की आँखों में सच के आंसू थे—खुशी और कृतज्ञता के आंसू। “सॉरी भाभी, आई एम सो सॉरी! हम तो बस आपके साथ थोड़ा मज़ाक कर रहे थे। लेकिन सच कहूँ तो… इस दुनिया में आपके जैसी भाभी किसी को नहीं मिल सकती। आपने वो बात याद रखी जो मैं खुद भूल चुकी थी। इस नेकलेस से ज्यादा कीमती मेरे लिए आपका यह प्यार है। थैंक यू सो मच भाभी।”
अनन्या ने भी मुस्कुराते हुए काव्या की पीठ थपथपाई। “पागल लड़की, मुझे रुला ही दिया था तूने। अगर दोबारा ऐसा मज़ाक किया तो मैं सच में तुझसे बात नहीं करूंगी।”
रोहन भी उनके पास आकर खड़ा हो गया और अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “अरे मेरी भोली पत्नी, यह मज़ाक तो काव्या का प्लान था। उसने मुझे सुबह ही मैसेज करके बता दिया था कि अगर तुम कोई गिफ्ट दोगी तो वह कैसा नाटक करेगी, और मुझे उसका साथ देना है। मैं तो बस अपनी प्यारी बहन का साथ दे रहा था।”
“अच्छा जी! तो अब बहन प्यारी हो गई और पत्नी बेगानी?” अनन्या ने रोहन को चिढ़ाते हुए कहा। फिर तीनों एक साथ ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। कमरे का माहौल जो कुछ पल पहले भारी हो गया था, अब फिर से उसी गर्मजोशी और प्यार से भर गया था।
सुमित्रा देवी, जो दूर खड़ी यह पूरा नाटक देख रही थीं, उनके चेहरे पर एक बेहद सुकून भरी और मंद-मंद मुस्कान थी। उन्होंने भगवान की मूर्ति की तरफ देखकर हाथ जोड़े और मन ही मन धन्यवाद दिया। उन्होंने समाज में ननद-भाभी के बीच होने वाले झगड़ों और कड़वाहट की कई कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन उनके घर का नज़ारा बिल्कुल अलग था। यहाँ एक भाभी ने अपनी ननद को बेटी की तरह प्यार किया था, और ननद ने उसे अपनी सगी बहन से भी बढ़कर सम्मान दिया था। सुमित्रा देवी जानती थीं कि जब तक घर के बच्चों में ऐसा निस्वार्थ प्यार और एक-दूसरे के प्रति ऐसी समझदारी है, तब तक इस घर की नींव को कोई भी नहीं हिला सकता।
काव्या ने वह कुंदन का नेकलेस पहना। वह उस पर बहुत जंच रहा था। उसने अनन्या के साथ ढेर सारी तस्वीरें खिंचवाईं। उस रात घर का खाना भी बहुत खास था, क्योंकि उसमें मसालों से ज्यादा उस परिवार के अटूट प्यार की मिठास घुली हुई थी। एक छोटी सी शरारत ने उस दिन यह साबित कर दिया था कि रिश्ते जब दिल से निभाए जाते हैं, तो उनमें आने वाला हर उतार-चढ़ाव सिर्फ उन्हें और भी मजबूत बनाता है।
क्या आपके घर में भी ननद-भाभी या भाई-बहन के बीच ऐसी ही प्यार भरी शरारतें होती हैं? क्या आपने भी कभी अपनों को ऐसे ही कोई सरप्राइज दिया है और बदले में उनके मज़ाक का शिकार हुए हैं? अपने अनुभव जरूर साझा करें!
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लेखिका : आरती देवी