“अब क्या हुआ, अब क्यों रो रहे हो आप… निकाल लीजिए अपने बेटे के सभी अंग और बेच दीजिए अच्छी कीमतों पर…
आप तो बहुत होशियार सर्जन हैं… कोई तकलीफ भी नहीं होगी आपको…”
अपने 10 वर्षीय बेटे के शव पर विलाप करती मधु चीख-चीखकर अपने पति डॉ. मयंक से कह रही थी। वह शब्द नहीं थे—आग के गोले थे, जो मधु के भीतर की सारी पीड़ा, सारे टूटे विश्वास और सारी घुटन को एक साथ बाहर उगल रहे थे। घर की दीवारें भी जैसे उस चीख से काँप उठीं।
कमरे के बीचोंबीच नमन का नन्हा-सा शरीर… निःशब्द, निःस्पंद… जैसे किसी ने दुनिया की सारी आवाज़ें उससे छीन ली हों। अभी कल तक वही नमन घर में दौड़ता था, हँसता था, अपनी माँ की साड़ी पकड़कर कहता—“मम्मी, देखो मैं कितना तेज दौड़ता हूँ।” आज वही बच्चा… बस एक शव।
नमन… मधु का इकलौता बेटा, जो बहुत ही मन्नतों के बाद, विवाह के 10 साल बाद हुआ था।
दस साल… यह कोई छोटा समय नहीं होता। दस साल तक खाली गोद का दर्द झेला था मधु ने। पड़ोसन की बातें, रिश्तेदारों के ताने, अपमानित नजरें, मंदिरों की सीढ़ियाँ, मन्नतें, व्रत, पूजा, हवन—क्या नहीं किया उसने। कभी शिवजी के चरणों में सिर रखकर रोई, कभी देवी के आगे दीपक जलाकर भीगी आँखों से प्रार्थना की—“बस एक बच्चा दे दो… बस एक…”
और जब नमन हुआ, तो मधु को लगा जैसे उसके जीवन में सचमुच ईश्वर उतर आया हो। नमन के साथ उसकी साँसों में उम्मीद बस गई थी। जिस घर में कभी सन्नाटा था, अब वहाँ किलकारियाँ थीं। मधु की दुनिया नमन के इर्द-गिर्द घूमती थी—उसकी पढ़ाई, उसका टिफिन, उसकी दवा, उसकी हँसी, उसका बुखार—सब कुछ।
और मयंक?
डॉ. मयंक शहर के नामी डॉक्टर थे। उनके नाम की चमक बहुत दूर तक थी। लोग कहते थे—“डॉ. मयंक के हाथ में जादू है।” सर्जरी हो या कठिन मामला, अस्पताल की भीड़ में उनका नाम ही उम्मीद बन जाता। वे बड़े-बड़े सम्मेलनों में बुलाए जाते, अखबारों में उनकी फोटो छपती, और शहर के गिने-चुने प्रतिष्ठित डॉक्टरों में उनका नाम लिया जाता।
लेकिन इस प्रतिष्ठा के पीछे एक दूसरा, छुपा हुआ संसार भी था—ऐसा संसार, जहाँ मयंक के हाथ का “जादू” इंसानियत की रेखा पार कर चुका था।
वह गैर-कानूनी कार्य भी करते थे।
जैसे—भ्रूण परीक्षण करके बेटियाँ न चाहने वालों का साथ देना…
बेटियों के भ्रूण को गाजर-मूली समझकर समाप्त कर देना…
और ऐसे ही, अगर कोई मरीज ऑपरेशन से पहले ही या ऑपरेशन के वक्त खत्म हो जाता, तो उसके परिवारीजनों को बिना बताए उसके अच्छे-अच्छे अंग निकाल लेना… और बड़ी सफाई से उसका खोखला शव उसके घर वालों को सौंप देना…
मधु जब-जब यह सब सुनती, उसका कलेजा काँप उठता। वह कई बार मयंक के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती—
“मयंक… ये काम मत किया करो। पाप लगेगा। किसी की बेटी को यूँ… किसी के शरीर को…”
तो मयंक हँसकर या झुंझलाकर कह देते—
“अरे कुछ नहीं होता! जब घर वाले ही लड़की नहीं चाहते तो हम क्या करें? और ऐसे ही जब मरीज ही मर गया तो उसके अंगों को निकालने में क्या है… किसी को क्या पता चलता है… और हमें भी अंगों की अच्छी कीमत मिल जाती है।”
उनकी आँखों में ठंडा आत्मविश्वास होता—वह आत्मविश्वास जो पैसे और ताकत से पैदा होता है।
मधु के मन में डर बैठ गया था। वह रातों को करवट बदलती रहती। उसे लगता—मयंक की कमाई का यह रास्ता… घर में चमक लाता है, लेकिन दिल में अंधेरा भी भर देता है। उसने कई बार सोचा कि नमन बड़ा हो जाएगा, तो उसे क्या सिखाएंगे? अच्छाई या “अच्छाई की कीमत”?
पर मधु की बातों का मयंक पर कोई असर नहीं होता। वे बस एक ही चीज़ के पीछे भागते—
पैसा। पैसा। पैसा।
उनका घर बड़ा था, सुविधाएँ थीं, चमक थी। मधु के पास कपड़े थे, गहने थे, आराम था—पर चैन नहीं था। कई बार वह आईने में खुद को देखकर सोचती—“मैं सब कुछ होते हुए भी खाली क्यों हूँ?” और फिर नमन को देखकर अपना मन समेट लेती—“बस… मेरा बेटा है… इसी में खुशी है।”
और फिर… वही नमन…
जिस दिन यह हादसा हुआ, दिन बिल्कुल सामान्य था। सुबह नमन स्कूल गया, लौटकर खाना खाया, फिर छत पर खेलने चला गया। मधु ने आवाज दी—“छत पर अकेला मत खेलना, नमन!”
नमन बोला—“मम्मी मैं तो बस थोड़ी देर…।”
छत पर हवा चल रही थी। बच्चों की हँसी ऊपर तैर रही थी। नमन दौड़ रहा था, शायद पतंग की डोर पकड़ने या गेंद उठाने के लिए। और फिर एक क्षण… एक पल…
नमन छत से नीचे गिर गया।
नीचे गिरते समय न कोई पकड़ सका, न कोई रोक सका।
और… मौके पर ही मौत हो गई।
मधु की चीख उस गली में दूर तक गूँज गई। वह पागलों की तरह नीचे भागी। उसने नमन को उठाने की कोशिश की—“उठ बेटा… उठ… मम्मी यहाँ है…”
पर नमन की आँखें… खाली थीं।
वह चेहरा, जो हर वक्त मुस्कान से भरा रहता था, अब स्थिर था—भयानक रूप से स्थिर।
किसी ने मयंक को फोन किया। मयंक दौड़ते हुए आए। डॉक्टर थे—पर उस पल वे सिर्फ पिता नहीं, एक आदमी थे, जो अपनी दुनिया टूटते देख रहा था। उन्होंने नमन को देखा, हाथ काँप गया, होंठ सूख गए।
उनके ज्ञान, उनकी डिग्रियाँ, उनकी प्रसिद्धि—सब एक तरफ रह गई।
घर में भीड़ लग गई। रोना, चीखना, सांत्वना—सब कुछ। लेकिन मधु… मधु तो जैसे इस संसार से बाहर हो गई। उसकी आँखों में अब सिर्फ आग थी।
और तभी… जब मयंक नमन के पास खड़े हुए, मधु ने उन्हें देखा।
उसके भीतर वर्षों से दबा दर्द, डर, गुस्सा—सब एक साथ उबल पड़ा।
वह चीख उठी—
“अब क्या हुआ, अब क्यों रो रहे हो आप… निकाल लीजिए अपने बेटे के सभी अंग और बेच दीजिए अच्छी कीमतों पर…
आप तो बहुत होशियार सर्जन हैं… कोई तकलीफ भी नहीं होगी आपको…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
लोग हक्के-बक्के रह गए।
किसी को समझ नहीं आया कि यह माँ क्या कह रही है।
लेकिन मधु के लिए यह पल “उजागर” होने का पल था—उसने आज मयंक की आत्मा के सामने उसका असली चेहरा रख दिया था।
“पैसा, पैसा, पैसा… और कमाओ चाहे जैसे भी… अधिक पैसा… फिर करना अपने शौक मौज पूरे… अरे अब तो तुम्हारा खर्चा कराने वाला भी कोई नहीं है यहाँ…
हाय मेरा बेटा…”
मधु के शब्द तीर बनकर मयंक के सीने में उतरते चले गए।
मधु बोलती जा रही थी और उसका शरीर काँप रहा था—
“जब मैं कहती थी पाप लगेगा, तुम हँसते थे। जब मैं डरती थी, तुम कहते थे—‘किसी को क्या पता चलेगा।’ आज… आज सब पता चल गया… मेरे बेटे की सांसें नहीं रहीं… क्या अब भी कोई नहीं जान पाएगा?”
मधु का दम टूट रहा था। उसके आँसू सूख चुके थे। अब सिर्फ चीख बची थी। और उस चीख के बाद…
कहती हुई मधु बेहोश हो गई।
वह वहीं गिर पड़ी—जैसे उसका शरीर भी उस दर्द का भार नहीं उठा सका।
मयंक एक तरफ खड़े… जड़।
उनकी आंखें नमन पर थीं, पर भीतर वे कहीं और थे।
उन्हें एक-एक करके वे चेहरे याद आने लगे, जिनके परिवारों ने उनके सामने हाथ जोड़े थे।
वे पल याद आए जब उन्होंने “सफाई” से सब छुपा लिया था।
वे आवाजें याद आईं जब कोई माँ रो रही थी और वह बस कानून, प्रक्रिया और “साइलेंस” के पीछे छिप गए थे।
आज… एक माँ उनके सामने रो रही थी—लेकिन वह माँ उनकी पत्नी थी, और वह शव उनके बेटे का था।
डॉक्टर साहब एक तरफ खड़े अपने कर्मों को याद करके पश्चाताप की अग्नि में जल रहे थे।
आज उन्हें अहसास हो गया था कि कर्मों का फल किसी न किसी रूप में जरूर मिलता है।
उनका मन चीख रहा था—“मैं डॉक्टर था… जीवन बचाने वाला… मैं ये क्या बन गया?”
लेकिन समय वापस नहीं आता।
जो किया, उसका दाग धुलता नहीं।
और जिन गलतियों को उन्होंने “चतुराई” समझा, आज वही गलतियाँ उनके सामने “सज़ा” बनकर खड़ी थीं।
नमन की मौत ने मयंक की दुनिया उजाड़ दी थी, और मधु की चीख ने उनके भीतर का नकाब नोच दिया था।
यह कहानी सिर्फ एक घर की नहीं थी—यह कहानी उस सोच की भी थी, जो बेटियों को स्वीकार नहीं करती, और इंसान के शरीर को व्यापार बना देती है।
यह कहानी उस लालच की भी थी, जो धीरे-धीरे इंसान को अंदर से खत्म कर देता है… और एक दिन उसके अपने ही आँगन में वही आग लगा देता है।
प्रतिभा भारद्वाज ’प्रभा’
मथुरा (उत्तर प्रदेश)
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- मधु का गुस्सा आपको सही लगा या आपको लगा कि वह दर्द में टूट गई थी?
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