कभी भी किसी पर आंख मूंदकर भरोसा मत करना। – परमा दत्त झा

आज रत्न दफ्तर से आया तो बात सुनकर चौंक गये।उसकी पत्नी मीरा अपने पैरों पर चलती हुई नाच कर रही थी और अपनी मां से फोन पर बात कर रही थी -अरी मां,रत्न एक नंबर का बेवकूफ है। आखिर आई ए एस अफसर होने से क्या होगा?हमने उसे –!

ठीक है बेटी ,आखिर तुमने बीस तीस लाख की बचत करा दी।-मां हंसते कह रही थी और दोनों इस बात से अंजान थी कि रत्न मोबाइल पर पूरी वी डी ओ बना रहा है।

आखिर यह किस बात की  सजा दे रही है।मेरे और मेरी मां के सामने लकवाग्रस्त बीमारी का ढोंग और पीठ पीछे इस तरह नाचना और गाना। आखिर चल क्या रहा है?

आज से सात साल पहले मीरा चीफ इंजीनियर रमेश चौधरी की चौथी बेटी थी।एक नंबर की कामचोर और पढ़ने में कमजोर यह किसी तरह प्रेम का नाटक कर इससे ब्याह रचा बैठी।कारण यह था कि वह बहुत तेज था और बस चौबीस साल में आई ए एस बन गया था।

चुंकि देखने में अति सुन्दर थी संग ही बहुत मंजी हुई कलाकार थी सो इसे रिझाने में ज्यादा समय नहीं लगा।फिर तो सात साल पहले दोनों का विवाह हुआ था और यह इसके घर आ गयी।इसकी मां जो सरकारी स्कूल की शिक्षिका थी ऐसा बड़ा घराना और इतनी सुन्दर बहू पाकर गदगद थी।

फिर तो बहू रहने लगी।सास कुछ कुछ काम बताने लगी जैसे चाय बना लो,खाना पका लो सहित बहुत छोटे मोटे काम।

मगर मक्कारी में तेज यह अचानक ही -सास स्कूल से आयी तो वह जमीन पर लेटी कराह रही थी।

क्या हुआ,कहती सास ने बेटे को फोन लगा दिया और डाक्टर को बुला लिया।कभी भी बीमारी ठीक होता है कामचोरी नहीं सो जुमैटो से खाना मंगाना और दिन में तैयार होकर घूमने निकल जाना।

सो उस दिन -राजधानी भोपाल में रत्न मिटिंग में आए थे जबकि मां रोज की तरह नाश्ता तैयार कर गयी थी और इसे भी खिलाया था।

मगर डी ओ आफीस जाते समय सास रामेश्वरी देवी को बहू कार चलाकर जाती दिखी।फिर उतरकर राजहंस होटल में गयी।अब सास को शक हो गया कि कुछ गडबड है।

मगर सावधानी से कदम उठाना है कारण सास को विलेन बनते देर नहीं लगती हैं।

फिर तो रत्न से कोई चर्चा नहीं की और इसके कमरे में गुप्त कैमरा लगा दिया। फिर क्या था दिनभर में नहाने जाना,डांस करना ,जमोटो से खाना मंगाना।बाहर निकलकर खाना लेना सहित सब कुछ रेकार्ड हो गया। आखिर विद्यालय प्राचार्य को बेवकूफ बनाना इतना सहज नहीं है।

अब रत्न से बाहर इस बावत चर्चा की और क्लिप दिखाएं।वह पहले चौंक गया मगर बाद में -मां इसे रंगे हाथों पकड़कर जलील करना है।इसके मां पिताजी को यह दिखाना भी है।

वह शुभ दिन आज आ ही गया जब रत्न ने अपनी मां और श्वसुर को बुलाया और सबके सामने यह नाचती गाती हुई पकड़ी गई।

अब तो सबके सामने अचानक कमरे में आती ही वह चौंक गयी।वह समझ गई थी कि भांडा फूट गया है।

बताओ ऐसा क्यों किया?-सास ने पूछा।

क्यों न करती,आखिर आज तक मुझे मिला क्या है?आई ए एस की पत्नी हूं ,कोई चुल्हा चौकी करने नहीं आयी हूं। यहां सास की रोटी पकानी होती सो बीमार बन गई।अब तो कुछ नहीं करना पड़ता है।-वह सरलता से बोली।चेहरे पर कोई पछतावा नहीं,बस कुटिल मुस्कान थी।

ठीक है इंजीनियर साहब अब आप बस इसे अपने साथ ले जाइए।यह मेरे साथ नहीं रह सकती -रतन का यह वाक्य सुनते ही वे गिड़गिड़ाने लगे मगर बेटी तो -अरे शादी की है कोई मजाक नहीं दहेज के केस में -इतना बोली की गाल पर एक बजा।”नीच लड़की, खानदान का नाम डुबो दिया।”-बेटा मुझे माफ़ करना इसे ले जा रहा हूं।-कहते इसके माता पिता इसे ले गये जबकि रत्न और उसकी मां सिर पकड़कर बैठ गये।

उन्हें समझ में आया कि “कभी भी किसी पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए,धोखा कोई भी दे सकता है।”

#बेटियां इन वाक्य कहानी प्रतियोगिता

#देय वाक्य -कभी भी किसी पर आंख मूंदकर भरोसा मत करना।

#दिनांक-6-3-2026

#शब्द संख्या -लगभग 500

(कथा मौलिक और अप्रकाशित है इसे मात्र यहीं प्रेषित कर रहा हूं।)

#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।

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