रिया के घर आज एक अलग ही रौनक थी। सुबह से ही राधा जी बार-बार रसोई में जाकर चाय के कप सजातीं, कभी पर्दे ठीक करतीं, कभी रिया की साड़ी पर नजर डालकर कहतीं—“बेटा, पल्लू ठीक कर ले… बस थोड़ा-सा।” महेश जी भी आज असामान्य रूप से शांत थे, मगर उनके चेहरे पर जो उम्मीद की चमक थी, वह साफ दिखाई दे रही थी। बहुत दिनों बाद उनके घर में “शादी की बात” इतनी पास आकर ठहरी थी।
आज लड़के वाले रिया को देखने आने वाले थे। और यह बात कोई छोटी बात नहीं थी। रिया की उम्र 35 पार कर चुकी थी और लड़के की उम्र 38 थी। समाज में उम्र बढ़ने के साथ-साथ सवाल भी बढ़ जाते हैं, ताने भी बढ़ जाते हैं, और माँ-बाप के माथे पर चिंता की लकीरें भी गहरी हो जाती हैं।
कुछ समय से रिया की शादी के लिए पापा महेश और मम्मी राधा बराबर कोशिश कर रहे थे, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। कोई कुंडली में दोष बताता, कोई “लड़की थोड़ी मोटी है” कहकर मना कर देता, कोई उम्र को लेकर बात बना देता। पर इस बार… सब कुछ जैसे ठीक बैठ गया था। लड़का डॉक्टर था—बस थोड़ा हेल्दी था। वैसे तो रिया भी थोड़ी मोटी थी, इसलिए राधा जी को लगा कि चलो, कोई तो ऐसा परिवार मिला जो कमियां नहीं, इंसान देख रहा है।
लड़के वाले आए, बात हुई, हँसी-मजाक हुआ, चाय-नाश्ता चला। रिया को लड़के वाले पसंद आ गए—और लड़के वालों को रिया। फिर वह क्षण आया, जब “हां” हो गई। शादी के लिए हां करने के बाद लड़के की मां ने रिया को सोने की चेन पहना दी। घर में जैसे खुशी की बारिश हो गई। राधा जी की आंखें भर आईं, महेश जी ने राहत की सांस ली। सालों की चिंता, सालों की मेहनत, रिश्तेदारों के सवाल—सब कुछ जैसे एक पल में हल्का हो गया।
दो महीने बाद की शादी की तारीख रखी जा रही थी। सभी के खुशी का ठिकाना नहीं था। राधा जी मन ही मन हिसाब लगाने लगीं—कौन-सा सगुन, कितने कपड़े, कितनी मिठाई, किसको बुलाना, क्या-क्या करना है… और महेश जी अपने मन में सोचने लगे—“चलो, बेटी का घर बस जाएगा… हम भी चैन से जी पाएंगे।”
शादी तय होने के ठीक एक हफ्ते बाद मेरी राधा से मुलाकात हुई। मैं उन्हें बाजार में मिली। चेहरे पर वह उत्साह नहीं था, जो किसी बेटी की शादी तय होने के बाद होता है, लेकिन मैंने सोचा—शायद थकान होगी, शायद तैयारियों का दबाव होगा। मैंने मुस्कुराकर कहा,
“बहुत बहुत बधाई हो राधा जी! बेटी की शादी तय हो गई, बहुत समय से आप परेशान हो रही थीं… चलो अच्छा हुआ।”
इतना सुनते ही राधा जी फूट-फूटकर रोने लगीं।
मैं घबरा गई। “अरे! क्या हो गया? ऐसे खुशी के मौके पर आप रो रही हैं?”
राधा जी कुछ बोल नहीं पा रही थीं। उनका गला जैसे बंद हो गया हो। साथ में खड़ी उनकी देवरानी ने मेरे कान में कहा,
“अरे कहाँ भाभी जी… रिया ने तो सबको ज़लील करके रख दिया।”
मैं सन्न रह गई। “क्या बात हो गई? क्या हुआ?”
देवरानी ने कहा—“रिया घर से भाग गई… और शादी कर ली।”
“क्या…?!” मेरे मुंह से बस यही निकला। मुझे लगा जैसे जमीन खिसक गई हो।
फिर क्या था—मां-बाप मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। किसी को क्या जवाब दें? घर में ही मुंह छिपाकर बैठ गए। बेटी ऐसा कदम उठाएगी, उन्होंने कभी सोचा नहीं था।
असल में रिया का ये किस्सा दो-तीन सालों से चल रहा था। एक इलेक्ट्रिशियन था, जो उनके घर पर बिजली का काम करने आता था। पता नहीं कब दोनों की आंखें चार हुईं, और बात यहां तक पहुंच गई।
रिया पढ़ी-लिखी थी। एमए किया था, और किसी कॉन्वेंट स्कूल में टीचर थी। घर में थोड़ी भनक तो थी इस बात की, लेकिन थोड़ी डांट-डपट करके मामला रफा-दफा कर दिया गया था। महेश जी और राधा जी को लगा कि यह बस कोई “क्षणिक आकर्षण” होगा, समय के साथ खत्म हो जाएगा। उन्होंने सोचा, “हम जल्दी से रिया की शादी तय कर देंगे तो सब ठीक हो जाएगा।”
लेकिन मामला रफा-दफा कहाँ हुआ था… रिया का उस शख्स से बराबर मिलना-जुलना था। और तो और, दोनों ने चुपके से कोर्ट मैरिज भी कर ली थी—जिसका घर में किसी को पता नहीं था। रिया ने घर में शांति बनी रहे, इस लिए कुछ नहीं बताया।
रिया इस चक्कर में थी कि शायद मम्मी-पापा मान जाएं। शायद वक्त के साथ वे समझ जाएंगे। शायद वे देखेंगे कि यह रिश्ता सिर्फ आकर्षण नहीं, रिया की पसंद है। पर घर में “पसंद” के लिए जगह कम थी, “समाज” के लिए जगह ज्यादा।
जब डॉक्टर लड़के के साथ शादी पक्की हो गई, तभी रिया ने वह कदम उठाया, जिसने सबको हिला दिया।
रिया घर से कुछ कपड़े और सोने की चेन, अंगूठी और कुछ पैसे लेकर… आज स्कूटी से स्कूल गई, तो फिर लौट कर ही नहीं आई।
घर में सबने सोचा—स्कूल में कोई मीटिंग होगी, या रास्ते में किसी सहेली के यहां चली गई होगी। लेकिन जब स्कूल से आने का समय निकल गया, तो राधा जी का दिल धक-धक करने लगा।
उन्होंने फोन किया—“रिया कहाँ हो?”
रिया की आवाज दूसरी तरफ बहुत शांत थी।
“मम्मी… मैं अपने ससुराल में हूं।”
राधा जी के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उन्हें कांटों तो खून नहीं… “ये क्या कर दिया रिया ने!”
रिया के भाई और पापा—महेश जी—तुरंत रिया के घर गए। वहाँ वही इलेक्ट्रिशियन था, जिसे अब रिया अपना पति कह रही थी। महेश जी ने बहुत समझाया, बहुत डांटा भी, बहुत रोए भी।
“रिया… घर चलो। ये सब क्या कर रही हो? हमारी इज्जत… समाज… लोग क्या कहेंगे?”
पर रिया नहीं मानी। उसने दृढ़ आवाज में कहा,
“नहीं पापा, मैं यही खुश हूं। मैंने कोर्ट मैरिज कर ली है।”
महेश जी और उनका बेटा अपना-सा मुंह लेकर घर वापस आ गए।
इधर लड़के वाले बराबर शादी के सिलसिले में बात करने को महेश जी को फोन कर रहे थे—कभी शगुन की बात, कभी तारीख की पुष्टि, कभी कार्ड, कभी हॉल। महेश जी क्या जवाब दें? आखिर में एक दिन सच बता ही दिया। कब तक झूठ बोलते?
उस दिन महेश जी भीतर से टूट गए। वह सोचने लगे—
“डॉक्टर लड़का छोड़कर एक इलेक्ट्रिशियन में रिया को पता नहीं क्या दिखा… खुद ही अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली… चलो…”
पर “चलो” कहना जितना आसान होता है, सहना उतना ही मुश्किल।
महेश और राधा रिया की इस हरकत से इतने ज़लील हुए कि महेश जी ने तो बिस्तर ही पकड़ लिया। एक इज्जतदार आदमी अपनी इज्जत को बहुत डराता है। समाज में क्या मुंह दिखाएंगे—इस बात से वह बहुत परेशान रहने लगे।
दिन बीतते गए। एक-एक दिन भारी पड़ता। रिश्तेदारों के फोन आते—“क्या हुआ? शादी की तैयारी कैसी चल रही?”
और महेश जी बस बहाना बना देते—“तारीख आगे बढ़ गई… थोड़ा काम है…”
राधा जी रसोई में बैठकर आँसू पोंछतीं, कभी मंदिर में जाकर चुपचाप माथा टेकतीं—पर दिल का दर्द कम नहीं होता।
इस बात को आज तीन साल हो गए। अब जाकर महेश जी थोड़ा ठीक हो पाए हैं। पर ठीक होना भी सिर्फ शरीर का था, मन का नहीं। क्योंकि जब आपके दिल पर कोई गहरी चोट पहुंचती है, तो सारे अहसास खत्म हो जाते हैं। और वही राधा और महेश जी के साथ हुआ।
उन्होंने रिया से सारे संबंध तोड़ लिए। कैसी है रिया—कभी ये भी पता नहीं करते। न फोन, न खबर, न हालचाल।
कभी-कभी राधा जी रात में उठ जातीं और तकिये में मुंह छिपाकर रोतीं—क्योंकि माँ का दिल रिश्ता तोड़ने का दावा कर सकता है, पर बेटी को भूल नहीं सकता।
और महेश जी… बस चुप रहते। उनका गुस्सा बाहर नहीं आता, पर भीतर ही भीतर उन्हें खाए जाता।
घर की दीवारों में अब भी रिया की हँसी की आवाजें फंसी हुई थीं। उसकी किताबें, उसकी कुछ पुरानी चीजें—सब कुछ वहीं था, पर वह नहीं थी।
और सबसे बड़ा दर्द यह था कि रिया ने जो कदम उठाया, वह उसका अपना निर्णय था—पर उसके फैसले का बोझ समाज ने उसके माँ-बाप के कंधों पर डाल दिया।
यह कहानी यहीं ठहर जाती है—एक ऐसे मोड़ पर, जहाँ हर किसी के पास अपने-अपने तर्क हैं, अपनी-अपनी पीड़ा है, और अपनी-अपनी मजबूरी है।
प्रेषक: मंजू ओमर (झांसी, उत्तर प्रदेश)
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क्या रिया का फैसला सही था, क्योंकि उसने अपनी पसंद चुनी?
या फिर महेश और राधा का टूटना जायज़ है, क्योंकि समाज और विश्वास दोनों ने उन्हें घायल कर दिया?
और सबसे बड़ा सवाल—समाज किसे “इज्जत” देता है, और किससे “इज्जत” छीन लेता है?
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