दिवाकर का घर शहर की एक शांत कॉलोनी में था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल सामान्य मध्यमवर्गीय घर लगता—दरवाज़े पर तुलसी का गमला, आँगन में छोटी-सी रंगोली, और भीतर दीवारों पर भगवान की तस्वीरें। घर में अनुशासन भी था और संस्कार भी। सास-ससुर उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ घर की शांति ही सबसे बड़ी दौलत लगती है। दिवाकर एक निजी कंपनी में काम करता था, दिनभर की दौड़भाग के बाद उसे बस इतना चाहिए होता कि घर लौटते ही सुकून मिले।
स्वाति, दिवाकर की पत्नी, बाहर से बहुत मीठी, सलीके वाली और “संस्कारी” दिखती थी। सास-ससुर के सामने वह आदर्श बहू की तरह पेश आती—समय पर चाय, पूजा में हाथ बँटाना, रिश्तेदारों से आदर से बात करना। लेकिन घर के अंदर उसका स्वभाव कभी-कभी अचानक बदल भी जाता—कभी छोटी बात पर ताना, कभी बिना वजह नाराज़गी, तो कभी किसी के सामने खुद को “सबसे सही” साबित करने की ज़िद। दिवाकर कई बार समझता कि स्वाति की कुछ बातें उसे चुभती हैं, पर वह सोचकर टाल देता कि शादीशुदा जिंदगी में ऐसा होता है।
इसी घर में कुछ महीनों से आकाश रह रहा था। आकाश दिवाकर की बुआ का लड़का था। गाँव में पढ़ाई की सुविधा नहीं होने के कारण कक्षा बारहवीं के बाद वह अपने मामा यानी दिवाकर के घर रहकर BBA की पढ़ाई कर रहा था। घरवालों ने उसे अपने बेटे जैसा माना था। सास-ससुर ने कहा था—“हमारा भी तो बच्चा है, पढ़-लिखकर आगे बढ़ेगा।”
आकाश का स्वभाव सीधा-सादा था। वह सनातन धर्म के प्रति आस्था रखने वाला हनुमान भक्त था। सुबह उठते ही स्नान करके मंदिर के सामने बैठ जाता, हनुमान चालीसा पढ़ता, फिर किताबें लेकर पढ़ाई में लग जाता। शाम को भी पूजा और पढ़ाई—बस यही उसकी दुनिया थी। दुनियादारी, हँसी-मज़ाक, तड़क-भड़क, सोशल मीडिया—उससे उसका कोई खास लेना-देना नहीं था। घर के बाहर के लोग उसे मज़ाक में “महात्मा जी” कह देते, क्योंकि वह शांत रहता, किसी से उलझता नहीं और अपनी सीमा में रहता।
दिवाकर को आकाश पर गर्व था। वह सोचता—“आजकल के लड़के कहाँ इतने सरल होते हैं।” सास-ससुर भी उसे दुलारते। कभी-कभी सास कह देती—“ये लड़का तो सच में बहुत संस्कारी है, जैसे भगवान ने भेजा हो।”
पर स्वाति के भीतर कुछ और ही चल रहा था। वह आकाश की सादगी को कभी-कभी कमज़ोरी समझती। उसे लगता कि घर में सब आकाश की तारीफ करते रहते हैं—“आकाश ऐसा है, आकाश वैसा है।” और धीरे-धीरे यह तारीफें उसके मन में जलन का रूप लेने लगीं। वह बाहर से मुस्कुराती, लेकिन अंदर कहीं एक चुभन रहती।
एक दिन की बात है। दिवाकर दफ्तर गया हुआ था। सास रसोई में थीं और ससुर अखबार पढ़ रहे थे। घर का माहौल सामान्य था। आकाश छत पर टहलते हुए पढ़ रहा था—कभी नोट्स देखता, कभी किताब में अंडरलाइन करता। स्वाति अपने कमरे में तैयार हो रही थी। वह बार-बार शीशे में खुद को देख रही थी, फिर छत की ओर जाती, फिर कमरे में लौट आती। उसके व्यवहार में बेचैनी थी।
आकाश को अंदेशा तक नहीं था कि घर के भीतर कोई तूफान आकार ले रहा है। उसे तो बस इतना ध्यान था कि परीक्षा पास है, असाइनमेंट पूरे करने हैं, और उसे मामा के भरोसे पर खरा उतरना है।
दोपहर ढल रही थी। तभी अचानक घर में एक चीख गूँजी—
“अरे आकाश! तुम यह क्या कर रहे हो ?…”
कहकर स्वाति जोर जोर से चिल्लाने लगी।
आकाश एकदम घबरा गया। उसकी आवाज भी काँप गई—
“अरे अरे भावी!” कहते हुए आकाश चुप हो गया…
स्वाति की आवाज सुऩकर सास ससुर और स्वाति का पति दिवाकर कमरे में दौड़कर आए… (दिवाकर आज किसी जरूरी काम से जल्दी घर लौट आया था)। उन्हें लगा कोई बड़ी अनहोनी हो गई है।
स्वाति रोती हुई, बिखरे बालों और काँपते होंठों के साथ दरवाज़े के पास खड़ी थी। उसकी उँगली आकाश की तरफ उठी थी।
“देखो माँ जी!” स्वाति चीख पड़ी,
“आकाश मुझे गलत तरीके से छू रहा था…”
आकाश के चेहरे से खून उतर गया। वह हकबका गया, जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो।
“नहीं भावी! यह सही नहीं हैं, आप ही ने तो…” कहतेे कहते आकाश रुक गया।
वह बोलना चाहता था, समझाना चाहता था, लेकिन सामने घर के बड़े, मामा और भाभी—और माहौल इतना जहरीला कि शब्द ही गले में फँस गए।
स्वाति फिर जोर से रोने लगी—
“पापाजी! आकाश की नियत ठीक नहीं है” कहकर स्वाति फिर जोर जोर से रोने लगी।
यह सुनकर दिवाकर के भीतर जैसे आग लग गई। जिस भाभी/पत्नी को वह “मां समान” मानने का दिखावा नहीं, बल्कि सच में सम्मान देता था—उसके बारे में ऐसा आरोप! और वह भी अपने ही घर में!
आक्रोश में आकर पति दिवाकर ने आकाश के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया…
थप्पड़ की आवाज कमरे में नहीं, पूरे घर में गूँज गई। आकाश का सिर एक तरफ झुक गया। उसकी आँखों में आँसू नहीं, एक गहरी बेबसी थी। वह जैसे कह रहा हो—“मैंने क्या किया?”
दिवाकर की आवाज कांप रही थी—गुस्से और अपमान से।
“आकाश तुम आस्तीन के साँप निकले .. तुमने धर्मात्मा का चोला ओढ़कर कर मां समान भाभी पर बुरी नजर डाली… तुम्हें अपने घर में शरण दे कर हमने बहुत बड़ी गलती की…”
स्वाति की जहरीली हंसी आकाश के अपमान में चार चांद लगा रही थी।
उसके चेहरे पर आँसू थे, पर आँखों में कहीं न कहीं एक अजीब-सी जीत की चमक भी।
सास-ससुर भी सन्न थे। वे आकाश को जानते थे। उसकी पूजा-पाठ, उसकी पढ़ाई, उसका विनम्र स्वभाव—ऐसा लड़का? यह कैसे संभव? पर स्वाति बहू थी, और रो रही थी। समाज में सबसे पहले “रोने वाले” की बात सच मान ली जाती है।
घर में जैसे अदालत लग गई थी, और फैसला पहले ही लिख दिया गया था।
आकाश के मन में उस पल बस यही चल रहा था—“हे बजरंगबली… मेरे साथ यह क्या हो रहा है?”
वह सच में निर्दोष था। उसकी दुनिया में ऐसी सोच थी ही नहीं। लेकिन जब आरोप लगते हैं, तो सच अक्सर शब्दों के पीछे दब जाता है।
सास ने कांपते हाथों से स्वाति को पानी दिया। ससुर ने गहरी सांस लेकर कहा—“पहले बात साफ करो…”
पर स्वाति बार-बार वही दोहरा रही थी—“आकाश की नियत ठीक नहीं है…”
तभी अचानक—घर का माहौल एक और आवाज से टूट गया।
दिवाकर की छोटी बहन, जो अभी-अभी ऊपर से उतरी थी, तेज़ी से बोली—
“यह सब झूठ है।”
सबने चौंककर उसे देखा।
उसके हाथ में फोन था। वह आगे बढ़ी और बोली—
“तुरंत” उसने अपने फोन से एक वीडियो चला दिया और बोली..
“मैं यह वीडियो अपने घर का टूर यू ट्यूब पर दिखाने के लिए बना रही थी… आकाश भइया छत पर टहल कर पढ़ रहे थे तभी स्वाति भावी ने भइया को इशारे बुलाया …”
वह आगे कहने लगी—
“मैं सोच रही थी कि भावी को कुछ काम होगा … यह सब इतनी जल्दी हुआ और सब कुछ वीडिय़ों में रिकार्ड हो गया…”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सबकी साँसें जैसे अटक गईं।
वीडियो चल रहा था—और उसमें साफ दिख रहा था कि आकाश छत पर किताब लेकर टहल रहा था। तभी स्वाति ने इशारे से उसे बुलाया। आकाश झिझकते हुए पास आया—शायद सोच रहा था कि भावी को कोई जरूरी बात होगी।
और अगले ही पल…
वीडियो में जो दृश्य था, उसने सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं—
पिक्चर में जबरदस्ती स्वाति आकाश को अपनी ओर खींचकर किस कर रही थी।
आकाश स्वाति की बाहों से निकलने की कोशिश कर रहा था।
वह पीछे हट रहा था, हाथ जोड़कर रोकने की कोशिश कर रहा था, उसका चेहरा डर और असहायता से भर गया था।
कुछ सेकंड का वह वीडियो, मानो पूरे घर की सोच को उलटकर रख गया।
दिवाकर का हाथ जो अभी कुछ देर पहले आकाश पर उठा था, वह हवा में ही रुक गया। उसका चेहरा राख की तरह बुझ गया। सास की आँखों में आँसू छलक आए। ससुर ने सिर पकड़ लिया।
स्वाति का चेहरा पीला पड़ गया। उसके होठ सूख गए।
वह जो अभी तक रो-रोकर खुद को पीड़िता दिखा रही थी, अब अपने ही झूठ के सामने नंगी खड़ी थी।
दिवाकर की छोटी बहन ने कड़क आवाज में कहा—
“भाभी, आपने यह क्या किया? आपने एक निर्दोष की इज्जत, उसका विश्वास, उसके चरित्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश की…”
आकाश वहीं खड़ा था। उसका गाल लाल था, आँखें नम थीं, पर भीतर एक गहरी चोट थी—थप्पड़ से ज्यादा, उन शब्दों से जो उसे “आस्तीन का साँप” कहकर मार गए थे।
नवीन तकनीक ने एक निर्दोष को बचा लिया—अन्यथा पलड़ा नारी का ही भारी रहता।
(अक्सर लोग बिना जांच-पड़ताल के, सिर्फ आरोप के आधार पर फैसला सुना देते हैं… और यही सबसे बड़ा अन्याय बन जाता है।)
एक निर्दोष पर दोष लगाकर स्वाति घरवालों की नज़रों में पूरी तरह से गिर गई…
सास ने रोते हुए आकाश का माथा सहलाया।
“बेटा… हमें माफ कर दे… हम तुम्हें पहचान नहीं पाए…”
दिवाकर का गला भर आया। वह आकाश के पास गया।
“आकाश… मैंने… गुस्से में… मैं…”
पर शब्द नहीं निकले।
आकाश ने बस इतना कहा—
“मामा… मैं आपके घर आया था पढ़ने… आपके भरोसे पर… मुझे नहीं चाहिए कुछ… बस इतना समझ लो, मेरी पूजा-पाठ दिखावा नहीं थी… मैं सच में वैसा ही हूँ…”
स्वाति चुप थी। अब न आँसू थे, न चीख। सिर्फ डर था—अपने सच के पकड़े जाने का डर।
उस दिन घर ने एक बात सीख ली—
किसी निर्दोष पर दोष लगाना, सचमुच “चाँद पर थूकना” है।
थूक लौटकर उसी के चेहरे पर गिरता है… जो थूकता है।
स्वरचित मौलिक रचना
सरोज माहेश्वरी, पुणे (महाराष्ट्र)
# चाँद पर थूकना (निर्दोष पर दोष लगाना)
पाठकों के लिए सवाल (कमेंट करने हेतु)
- अगर वीडियो न होता, तो आकाश की जिंदगी का क्या होता?
- क्या परिवार ने बिना जांच किए फैसला सुनाकर अन्याय किया?
- ऐसी स्थिति में “सच्चाई” तक पहुँचने के लिए सबसे जरूरी कदम क्या होना चाहिए?
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