करवाचौथ बिल्कुल नजदीक आ गया था। आयशा कितने दिनों से शॉपिंग कर रही थी उस शुभ दिन के लिए। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी—जैसे त्योहार उसके लिए सिर्फ परंपरा नहीं, एक खास मौका हो, जिसमें वह खुद को सबसे अलग, सबसे खूबसूरत, सबसे खास महसूस करना चाहती हो।
वह एक दुकान से निकलती तो दूसरी दुकान में घुस जाती। कभी उसे साड़ी का रंग पसंद नहीं आता, तो कभी बॉर्डर की डिजाइन। कभी ब्लाउज की कटिंग में कमी लगती, तो कभी मैचिंग चूड़ियों की चमक फीकी लगती। आखिरकार उसने साड़ी खरीदी—भारी वर्क वाली, उसके पसंदीदा रंग में। फिर मैचिंग ब्लाउज, चूड़ियां, नेकलेस, उसी तरह के सैंडल, पैरों के लिए बिछुए, पायजेब… और हाथ में डायमंड रिंग—यह तो उसने इस बार जिद करके ली थी रीतेश से। हर बार सोने की रिंग दे देता था, कुछ नया तो हो इस बार—यही सोचकर उसने इस बार “डायमंड” पर अड़ गई थी।
रीतेश उसके साथ शॉपिंग में था, पर उसका मन कहीं और उलझा हुआ था। वह हर सामान की कीमत सुनकर भीतर ही भीतर हिसाब जोड़ता जा रहा था—महीने की तनख्वाह, किराया, घर का खर्च, बिजली-पानी, गाड़ी की ईएमआई, और अब त्योहार का यह बजट…
वह दबी जुबान कहना चाह रहा था आयशा से, “यार! इतना कुछ नहीं हो पाएगा इस बार।”
मां का फोन आया था—वो पिताजी के इलाज के लिए कुछ पैसा मांग रही थीं। वहां भी तो भेजना जरूरी है। पर आयशा के माथे पर बल पड़ गए थे जैसे ही रीतेश ने “कम खर्च” जैसी बात छेड़ने की कोशिश की।
“साल में एक ही तो व्रत करती हूं मैं और वो भी आपकी लंबी आयु के लिए। मुझे कोई शौक नहीं जो भूखी प्यासी रहकर घंटों ये कठिन व्रत करूं। ऐसा भी कोई आदमी होगा जो ऐसे काम के लिए पैसे देखेगा?”
आयशा की आवाज में शिकायत भी थी और अधिकार भी। उसे लगता था कि वह जो कर रही है, वह कोई साधारण बात नहीं। उसके हिसाब से यह “त्याग” था—और त्याग का सम्मान “तौहफों” और “खर्च” से होना चाहिए।
रीतेश अपना सा मुंह लिए रह गया। उसे लगा जैसे कोई जवाब देना भी बेकार है।
“अच्छा बाबा! गुस्सा क्यों होती हो, बताओ, और क्या-क्या करना है? ले लूंगा उधार कहीं से, चुकाता रहूंगा धीरे-धीरे फिर…”
उसने मुस्कान की एक हल्की परत ओढ़ ली, पर भीतर कहीं कुछ टूटता भी चला गया। उसने मन में सोचा—ठीक है, कर ही लेंगे।
लेकिन फिर उसे याद आया—करवाचौथ के बाद दीवाली आ जाएगी, फिर भाई दूज, गंगा स्नान, क्रिसमस…
“हे भगवान! कितने त्योहार होते हैं हमारे देश में! त्योहार तो खुशियों के लिए आते हैं या तनावग्रस्त करने के लिए? मेरा तो बीपी बढ़ने लगता है, क्या करूं?”
रीतेश गहन सोच में डूबा था। वह यह सोचकर ही परेशान हो गया कि उधार का बोझ बढ़ता जा रहा है। ऊपर से जिम्मेदारी—मां, पिताजी का इलाज, घर का खर्च… और यहां हर त्योहार पर “मांगों” की लिस्ट।
“लाओ अपना कार्ड दो रीतेश! क्या सोच रहे हो? मुझे पेमेंट करना है…”
आयशा की आवाज ने उसे चौंका दिया। वह जैसे ट्रांस से बाहर आया। कार्ड निकाला, स्वाइप किया, पिन डाला—और अपने मन की घबराहट को दबाकर आगे बढ़ गया।
समय तेजी से गुजर गया। करवाचौथ का दिन आ गया। आज आयशा सुबह से ब्यूटी पार्लर में सज रही थी।
आई लैशेस, अपर-लोवर लिप टचअप, गोल्डन फेशियल, फुल बॉडी वैक्सिंग, नेल ब्यूटी, हेयर स्टाइल… सब कुछ कराते-कराते वह थक गई थी। लेकिन उसकी थकान में भी एक तसल्ली थी—आज वह “परफेक्ट” दिखना चाहती थी। आज का दिन उसकी नजर में “खास” था, इसलिए आज का उसका लुक भी “खास” होना चाहिए।
वह मन ही मन हिसाब लगा रही थी—आज पूजा होगी, शाम को मेहंदी दिखेगी, रात को चांद का इंतजार होगा… और फिर रीतेश से गिफ्ट।
आज उसने सोच लिया था—रीतेश से गिफ्ट में कहीं बाहर का “वन वीक ट्रिप” ही लूंगी इस बार।
लेकिन उसे छुट्टियां मिलेंगी?
“उफ्फ… ले लेगा नहीं मिलेंगी तो… आखिर उसके लिए निर्जल उपवास भी तो मैं ही कर रही हूं।”
आयशा के मन में यह बात ऐसे बैठी थी जैसे रिश्ते का मूल्य “त्याग” से तय होता है—और त्याग का मूल्य “गिफ्ट” से।
घर लौटकर वह इठलाती हुई कमरे में आई। शीशे के सामने खड़ी होकर उसने खुद को देखा—साड़ी की प्लीट्स, गहनों की चमक, माथे की बिंदी, मांग में सिंदूर, हाथों में चूड़ियों की खनक…
उसे लगा, आज वह सचमुच किसी अप्सरा से कम नहीं।
वह कमरे से बाहर आई और हल्के से मुस्कुराते हुए बोली—
“पूछती हूं रीतेश से, कैसी लग रही हूं मैं? मुझे देखते ही सब भूल जायेगा, आखिर अप्सरा से खूबसूरत हूं मैं…”
वह गर्व से भरी कमरे में घुसने को हुई… कि रीतेश की बातें सुनकर ठिठक गई।
रीतेश फोन पर बात कर रहा था किसी से…
और उसकी आवाज… आज सामान्य नहीं थी। उसमें तनाव था, थकान थी, और कहीं बहुत गहरी टूटन भी।
“नहीं यार! अब सहन नहीं होता, कितना उधार लूं और मैं?”
“….”
“बता दूं उसे, क्या उसे खुद समझ नहीं है? छोटी छोटी बात पर लड़ने लगती है, रूठ जाती है, मायके जाने की धमकी देती है… मेरे बस का कुछ नहीं अब…”
“…”
“नहीं, मुझे मत रोको यार! अगर ये ही सब चलता रहा तो इस बार अपनी इहलीला को समाप्त कर ही लूंगा मैं… हर वक्त ये ताना तो नहीं सुनना पड़ेगा कि तुम्हारी लंबी उम्र के लिए ही तो व्रत रखती हूं… मैं थक गया हूं यार!”
आयशा के पैरों तले जमीन सरक गई।
उसके कानों में जैसे किसी ने सीसा घोल दिया हो।
“इहलीला को समाप्त…”
मतलब… सुसाइड?
मतलब… वह… रीतेश…?
उसके भीतर एक तूफान उठा। उसने सोचा भी नहीं था कि उसकी कही बात—“तुम्हारी लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हूं”—किसी के लिए इतना भारी बन सकती है।
आयशा जानती थी, रीतेश थोड़ा भावुक है। तभी वह उसके पीछे पड़ी रहती थी। उसे लगता था कि भावुक आदमी आसानी से “मना” भी हो जाता है, और “सह” भी जाता है। लेकिन आज उसे समझ आया कि सहने की भी एक सीमा होती है।
उसे अपनी गलती समझ आई।
बेचारा रोज-रोज के खर्चों से तंग आकर सुसाइड करने को तैयार हो गया।
आत्मग्लानि से आयशा का दिल भर आया।
उसके गले का हार, हाथ की चूड़ियां, चेहरे का मेकअप—सब कुछ जैसे बेमानी लगने लगा।
वह दौड़कर रीतेश के पास गई।
रीतेश फोन रख चुका था, लेकिन उसकी आंखें लाल थीं। वह अपने भीतर के तूफान को छुपाने की कोशिश कर रहा था।
आयशा ने उसके सामने आकर कान पकड़े।
“रीतेश… प्लीज! मुझे माफ कर दो रीत! मैं भूल गई थी… इन बाहरी चीजों का प्यार से कोई मतलब नहीं है।”
उसकी आवाज कांप रही थी।
“असली प्यार तो आपसी समझ और विश्वास से होता है… जो तुमने मुझे भरपूर दिया है। आगे से ऐसा कभी नहीं करूंगी।”
उसके शब्दों में सच्चाई थी। वह सचमुच डर गई थी। वह समझ गई थी कि प्यार को “खरीदा” नहीं जाता और रिश्ते को “तौले” नहीं जाते।
रीतेश ने उसकी तरफ देखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर कठोरता थी, फिर वह पिघल गया।
उसने प्यार से आयशा को बाहों में भर लिया।
“चलो! चांद देखते हैं, फिर तुम्हें व्रत भी तो खोलना है… सारे दिन से भूखी, प्यासी हो।”
फिर उसने हल्के स्वर में पूछा—
“क्या गिफ्ट लोगी इस बार मुझसे?”
आयशा की आंखों में अब दिखावा नहीं था। बस अपनापन था।
वह मुस्कुराई—
“तुम खुद हमेशा मुझे यूं ही चाहते रहो… इससे बड़ा दूसरा गिफ्ट कोई हो सकता है क्या?”
वह क्षण सचमुच “करवाचौथ” का असली अर्थ लेकर आया—त्याग का नहीं, समझ का। व्रत का नहीं, विश्वास का।
और वहीं, उस चांदनी रात में आयशा ने पहली बार यह महसूस किया कि अगर रिश्तों में सम्मान और संवेदना हो, तो त्योहार सच में खुशियों के लिए आते हैं—तनाव के लिए नहीं।
#रिश्तों के बीच कई बार छोटी छोटी बातें बड़ा रूप ले लेती हैं।
— संगीता अग्रवाल
वैशाली, गाजियाबाद
कमेंट के लिए सवाल (पाठकों से)
आपके हिसाब से आयशा की सबसे बड़ी गलती क्या थी—बेवजह खर्च की जिद या “व्रत” को ताने की तरह इस्तेमाल करना?
और रीतेश जैसे लोग जो अंदर ही अंदर दबते चले जाते हैं, उन्हें क्या करना चाहिए—खामोश रहना या समय रहते अपनी परेशानी साझा करना?
कमेंट में अपनी राय जरूर लिखिए—आपकी बात किसी और के रिश्ते बचा सकती है।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद