आज हरिद्वार से घूमकर एक माह बाद सिद्धेश्वर जी अपनी पत्नी के साथ घर आये। ट्रेन/बस की लंबी यात्रा के बाद भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी ताजगी थी—हरिद्वार की हवा, गंगा के किनारे की शांति, मंदिरों की घंटियों की आवाज़ और आरती की लौ… मानो मन के किसी कोने में वर्षों से जमी थकान धोकर ले आई हो। पत्नी भी प्रसन्न थीं—“कितने सालों बाद हमें इतना सुकून मिला,” वे रास्ते भर यही कहती रहीं।
पर जैसे ही रिक्शा/कार घर के गेट के सामने रुकी, सिद्धेश्वर जी की आँखें अचानक एक चीज़ पर टिक गईं। गेट पर ही नेमप्लेट लगी थी… चार्टर्ड एकाउंट रमेन्द्र गोयल।
अचानक ये नए रूप में मेन दरवाजे पर देखकर कुछ चुभा। वह बोले नही कुछ, पर भीतर कहीं जैसे कोई नुकीली चीज़ चुपचाप चुभ गई। अभी तक बाबूजी के देहांत के बाद यह बड़ा सा दुमंजिला घर बाबूजी के ही नाम पर था। नेमप्लेट वही पुरानी थी, जिस पर पिता का नाम चमकता था—घर का गौरव, घर की पहचान।
दोनों भाई बड़े प्रेम से दोनों मंजिलों पर परिवार संग अलग रहते थे। घर का बंटवारा कागज़ों में नहीं, व्यवहार में था—ऊपर एक भाई, नीचे दूसरा; पर दिल में एक ही घर, एक ही छत। त्योहार साथ, दुख-सुख साथ।
सिद्धेश्वर जी की एक बेटी ही थी, जो ससुराल में अपने परिवार के साथ सुखी थी। बेटी के अपने घर-परिवार के कारण सिद्धेश्वर जी का ध्यान अक्सर घर के भीतर ही लगा रहता। वे हमेशा अपने छोटे भाई को अपनी जान समझते थे।
अभी एक माह पहले ही उन्होंने हरिद्वार घूमने की सोची, क्योंकि जीवन पूरा आफिस के काम मे व्यस्त रहे, पत्नी को समय नही दे पाए। अब जब उम्र ढल रही थी, तो उन्होंने सोचा—“अब नहीं तो कब?” इसी भाव से वे पत्नी को लेकर हरिद्वार चले गए थे।
घर लौटकर उन्होंने अंदर कदम रखा। सब कुछ वैसा ही था—सीढ़ियाँ, हॉल, पूजा का कोना, पुराने पर्दे… लेकिन नेमप्लेट ने जैसे हवा बदल दी थी। पत्नी ने भी देखा, पर कुछ बोली नहीं। वह पति का चेहरा पढ़ रही थीं। सिद्धेश्वर जी ने भी बात नहीं उठाई—क्योंकि लौटते ही झगड़ा, सवाल-जवाब… वे नहीं चाहते थे। शायद उन्होंने सोचा, “पहले आराम कर लूँ, फिर देखूँगा।”
शाम को ही उनके दोस्त उनसे मिलने आये। दोस्त पुराने थे, मोहल्ले की खबरें भी उनके पास जल्दी पहुँचती थीं। चाय का कप हाथ में था, बातें चल ही रही थीं कि दोस्त अचानक पूछ बैठे—
“क्या आप हरिद्वार में रहने का मन बना लिए हैं?”
सिद्धेश्वर जी चौंक गए। “ये कैसी बात?” वे बोले—
“नहीं ऐसा तो कुछ नही।”
दोस्त ने बात को आगे बढ़ाया, जैसे कोई बात छुपाकर रखना मुश्किल हो—
“भई, हमने तो मोहल्ले में यही सुना, इसलिए छोटे ने ये घर अपने नाम करा लिया।”
यह वाक्य सुनते ही सिद्धेश्वर जी जैसे पत्थर हो गए। उनके हाथ से कप लगभग छूटते-छूटते बचा। सिर में एक झनझनाहट-सी हुई, जैसे किसी ने भीतर की नस को खींच दिया हो। जो छोटे को अपनी जान समझते थे, उसकी करतूत सुनकर सकते में आ गए, दिल टूट गया।
उन्हें अपने बाबूजी की बात याद आ गई—उनका भरोसा, उनकी सीख, और अंत समय की वह हिदायत कि “छोटे को कभी मेरी कमी मत लगने देना।”
रात भर सिद्धेश्वर जी सो नहीं पाए। पत्नी ने धीरे-धीरे पूछा, “कुछ बात है?” पर सिद्धेश्वर जी ने बस इतना कहा, “थक गया हूँ… कल बात करेंगे।” पत्नी समझ गईं कि बात केवल थकान की नहीं, भीतर कुछ टूटने का दर्द है।
दूसरे ही दिन छोटे ने सुबह आकर भैय्या के पैर छुए,
“कब आये आप, मुझे पता ही न लगा।”
उसके चेहरे पर अपनापन था, आवाज़ में मीठापन… मानो कुछ हुआ ही नहीं। सिद्धेश्वर जी ने उसकी तरफ देखा—मन में तूफान था, पर चेहरे पर संयम। उन्होंने खुद को संभाल लिया।
सिद्धेश्वर जी ने धीरे से कहा—
“बहुत सुंदर नेम प्लेट लगवाए हो, अच्छा लगा, छोटे तुम्हारा नाम जगमग होए।”
छोटा जैसे पहले से तैयार था। तुरंत बोला—
“हां, भैय्या, थोड़ा काम करवाये हैं। आप बोलते थे न आपको हरिद्वार में बहुत अच्छा लगता है, हम यही सोचे, अब तो वहीं पूजा पाठ करेंगे। पेंशन तो आपकी बहुत बढ़िया है। इसीलिए बाबूजी का नाम बदलवा दिए। समय से कागज़ बन जाये तो बढ़िया रहता।”
इशारे से चालाकी करते हुए छोटे ने सब कह दिया, सोचा भी नही, भैय्या को कितना दुख पहुँचेगा। शब्दों में “भलाई” का मुलम्मा था, पर भीतर स्वार्थ की धार। “पेंशन तो आपकी बढ़िया है”—यह बात जैसे यह साबित करने के लिए थी कि बड़े को जरूरत नहीं, इसलिए छोटा ‘व्यवस्था’ कर रहा है।
इतना तो कई बरसों से पता था, छोटे के ससुर जज हैं, बहुत कुछ करा सकते हैं। पर यह बात… यह छल… सिद्धेश्वर जी को भीतर से तोड़ रहा था।
उन्हें याद आया—भाई के लिए कितना किया, कितनी बार उसके लिए खड़े रहे। बचपन का दृश्य आँखों के सामने घूम गया—अम्मा की रोटी, जो एक ही होती थी, और दोनों भाई आधी-आधी बांटकर खाते थे। वही साझा भूख, वही साझा संघर्ष, वही साझा बचपन… और आज?
उनके मन में शब्द उठे—“पर वह भाई जिसके लिए बाबूजी अंत समय बोल गए, देख सिद्धू, हमेशा छोटे को मेरी कमी नही होने देना।”
सिद्धेश्वर जी का मन बार-बार यही कह रहा था—“नहीं, नहीं… यह छोटा खुद नहीं कर सकता… यह उसकी पत्नी के कहने में आ गया होगा।”
पर फिर दूसरा सच चुभता—“कर तो उसी ने दिया।”
उनके भीतर संवाद चल रहा था—
अरे मूरख… हम तो पति-पत्नी हमेशा थोड़ी न रहेंगे। बेटी न मांग ले… करके तूने रिश्तों का मटियामेट कर दिया।
और वही कटु सत्य उनके मन में गूंज उठा—
जो रिश्ता विपत्ति बांटने के लिए बनाया जाता है वह खुद संपत्ति बांटने के चक्कर मे बंट जाता है।
पर सिद्धेश्वर जी ने छोटे भाई से कुछ नही कहा। उन्होंने घर की शांति के लिए, अपने संस्कारों के लिए, और शायद उस बचपन के प्यार की अंतिम डोर को बचाने के लिए—चुप्पी चुन ली।
पत्नी को समझाते रहे—
“हम जल्दी ही फिर हरिद्वार जाएंगे। अब टूटे दिल से मैं छोटे को देख नही पाऊंगा, दुख मुझे ही होगा, कि ये मेरा ही भाई है, हम सहोदर हैं क्या, एक ही कोख से जन्मे, विश्वास नही होता।”
पत्नी की आँखें भर आईं। वे चाहतीं कि पति बोलें, लड़ें, अपना हक लें। पर वे पति को जानती थीं—सिद्धेश्वर जी झगड़ा नहीं, समाधान चाहते थे। और कभी-कभी समाधान का नाम होता है—दूरी।
एक हफ्ते बाद ही सिद्धेश्वर जी अपने ले जाने लायक समान पैक करने लगे। साठ बरस की गृहस्थी थी, घर मे हर सुख सुविधा की वस्तु थी। सब तो ले जाया नही जा सकता। अलमारी खोली तो पुरानी साड़ियाँ, बच्चों की यादें, बाबूजी की तस्वीरें, पूजा की किताबें… सब जैसे पूछ रहे थे—“कहाँ जा रहे हो?”
उन्होंने सिर्फ जरूरी सामान चुना। बाकी सामान पर हाथ फिराकर छोड़ दिया—जैसे घर के हर कोने को आखिरी बार विदा कर रहे हों।
उन्होंने जाने के एक घंटे पहले छोटे को बुलवाया।
और बोले—
“सुनो, अब मैं हरिद्वार जा रहा हूँ, और जो कुछ घर मे है, सब तुम्हारे लिए छोड़ जा रहा हूँ, आखिर मेरे अपने भाई हो, और बाबूजी ने मुझे यही शिक्षा दी है, कि बड़े को सदा बड़प्पन ही दिखाना चाहिए।”
यह वाक्य किसी त्याग से ज्यादा एक चोट का मरहम था—अपने ही दिल पर लगाया हुआ।
छोटे की अब आंखे खुली, और आंखे नम हो गयी और बोल पड़ा—
“भैया, आप बुरा मान गए क्या, मैंने आपको जाने कहा क्या? आपका घर है, जब तक चाहे रहिए।”
कहने को यह रोकने जैसा था, पर समय ने अब पीछे लौटने का रास्ता धुंधला कर दिया था।
सिद्धेश्वर जी ने बहुत शांति से कहा—
“अरे छोटे, रस्सी में बल पड़ जाए, तो निशान हमेशा रह जाता है। अब आज्ञा दो।”
यह कहकर उन्होंने जैसे उस रिश्ते की रस्सी पर पड़े “बल” को स्वीकार कर लिया। यह “बल” अब कभी सीधा नहीं हो सकता था।
वे धीरे से मुड़े। पत्नी उनके साथ खड़ी थी—चुप, भारी मन से। दरवाज़े के बाहर कदम रखते ही सिद्धेश्वर जी ने एक बार पीछे देखा—वही घर, वही सीढ़ियाँ, वही आँगन… पर अब वह घर उतना अपना नहीं रहा था जितना कल था।
स्वरचित
भगवती सक्सेना गौड़
बेंगलुरु
आपकी राय?
आपके हिसाब से सिद्धेश्वर जी का चुप रहकर हरिद्वार चले जाना सही था, या उन्हें अपने हक के लिए डटकर खड़ा होना चाहिए था?
क्या रिश्तों में “बड़प्पन” हमेशा त्याग ही होता है, या कभी-कभी सच बोलना भी जरूरी होता है?
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