रमा बड़े दिनों बाद बहू-बेटे के साथ अपने पुराने घर आई थी। शहर में बेटे की नौकरी लग जाने के बाद वह वहीं रहने लगी थी, इसलिए यह घर कई महीनों से बंद पड़ा था। बाहर से देखने पर भी घर की खामोशी और भीतर की उदासी साफ झलकती थी—दरवाज़े की कुंडी पर जमी धूल, बरामदे के कोनों में फैले जाले, और आँगन में सूखे पत्तों का ढेर। जैसे समय ने भी इस घर को धीरे-धीरे अपने कब्ज़े में ले लिया हो।
दरवाज़ा खोलते ही एक बासी-सी गंध नाक से टकराई। रमा ने एक पल को आँखें बंद कर लीं। उसे लगा, जैसे घर भी शिकायत कर रहा हो—“इतने दिन बाद याद आई?” फिर उसने अपनी साड़ी का पल्लू नाक पर रखा और भीतर कदम रख दिए। साथ ही बहू ने तुरंत खिड़कियाँ खोल दीं ताकि हवा अंदर आ सके। धूप की पतली रेखाएँ कमरे में उतर आईं और धूल के बारीक कणों को चमका गईं।
बहू ने आते ही कहा, “माँजी, आप बैठिए, मैं पहले किचन संभाल लेती हूँ। यहाँ तो बहुत गंदगी हो गई है… चूल्हे पर भी धूल जम गई है।”
रमा ने धीरे से कहा, “नहीं बेटा, मैं भी कुछ करती हूँ। घर अपना है… इसे कौन संभालेगा?”
बहू ने रसोई का दायरा ले लिया—बर्तनों को पानी में भिगोया, गैस स्टोव को साफ किया, और अलमारी के शीशे पर जमी चिकनाहट को कपड़े से रगड़ने लगी। उधर रमा ने झाड़ू उठाई, कमरे की फर्श पर जमी धूल को समेटने लगी। झाड़ू की आवाज़ में एक अजीब-सी लय थी, जैसे वह हर झाड़ू के साथ पुराने दिनों की परतें भी हटा रही हो—हँसी, आँसू, त्योहार, जिम्मेदारियाँ, और वह खालीपन जो पति के जाने के बाद से हर कमरे में स्थायी हो गया था।
कुछ देर बाद रमा ने सोचा कि सबसे पहले अलमारी ठीक कर लेनी चाहिए। अलमारी वही थी—पुरानी, लकड़ी की, थोड़ी-सी चरमराती हुई—जिसमें उसके पुराने कपड़े, बच्चों की स्कूल की यादें, और कई ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें वह कभी फेंक नहीं पाई। उसने अलमारी का दरवाज़ा खोला तो धूल का गुबार उठा। रमा ने खाँसते हुए पल्लू से हवा की और अंदर रखे सामान को बाहर निकालकर अलग रखने लगी।
जैसे ही उसने नीचे वाले हिस्से की सफाई के लिए हाथ बढ़ाया, अलमारी के भीतर से एक फाइल फिसलकर नीचे गिर गई। फाइल पुरानी थी, किनारे घिसे हुए, ऊपर धूल की मोटी परत। रमा ने उसे उठाया तो उसकी उँगलियों में एक परिचित-सा अहसास दौड़ गया—जैसे किसी ने समय के उस पार से उसके हाथ थाम लिए हों।
उसने फाइल खोली। अंदर पीले-से पड़ चुके कुछ खत रखे थे। कागज़ के किनारे उम्र की मार से मुड़े हुए थे, पर अक्षर अब भी साफ थे—सुंदर लेखनी, सधे हुए शब्द, और हर लाइन में अपनापन।
देखते ही समझ आ गया कि ये खत उसके पापा के थे।
रमा की आँखों के आगे अचानक अपने पापा का चेहरा उभर आया—सफेद बाल, स्नेह से भरी आँखें, और वह धीमी-सी मुस्कान जो उसे हमेशा हिम्मत देती थी। वह उनकी इकलौती संतान थी, इसलिए पापा का सारा संसार जैसे उसी में सिमट आया था। पापा अक्सर खत लिखते—कभी अपना प्यार जताते, कभी प्रेरणादायक बातें लिखकर जीवन जीने की कला सिखाते। रमा ने यह सब हमेशा संभालकर रखा था, जैसे किसी ने उसे ज़िंदगी का सबसे कीमती खजाना दे दिया हो।
रमा ने एक-एक खत को धीरे-धीरे पलटना शुरू किया। कुछ खतों में पापा ने उसके बच्चों की बातें पूछी थीं, कुछ में उसे हौसला दिया था, और कुछ में उसने अपने दुख छिपाकर बेटी के लिए हँसी बाँटी थी। कागज़ से उठती वह हल्की-सी पुरानी स्याही की गंध भी रमा को बरसों पीछे ले जा रही थी। उसे याद आया—पति के अचानक चले जाने के बाद, जब लोग संवेदना का अभिनय करके धीरे-धीरे दूर हो गए थे, तब पापा ही थे जो उसके पास ढाल बनकर खड़े रहे। जबकि उनकी खुद की उम्र ऐसी थी कि कोई उन्हें सहारा देता। माँ तो बहुत समय पहले उनका साथ छोड़कर चली गई थी। भाई-भाभी विदेश में जाकर बस गए थे। पापा अकेले थे, फिर भी उन्होंने रमा को कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।
देखते-देखते एक पत्र पर रमा की नज़र अटक गई। वह बाकी पत्रों से अलग लग रहा था—कागज़ अधिक पीला, स्याही थोड़ी हल्की, और मुड़े हुए कोनों में एक अजीब-सी थकान। रमा का दिल धक-धक करने लगा। उसे लग रहा था जैसे यह वही खत है… जिसे पढ़ने की हिम्मत वह हमेशा टालती रही। यह शायद पापा का लिखा हुआ आखिरी खत था…
रमा ने काँपते हाथों से उसे खोला। अक्षरों पर नज़र पड़ते ही उसके गले में कुछ अटक गया।
प्रिय रमा,
आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है इसलिए तुम्हें खत लिखने बैठ गया। ज्यादा कुछ नहीं बस यही कहूँगा कि जीवन में कैसी भी परिस्थितियां आएं तुम फूल सी मुस्कुराती रहना। जीवनसाथी का साथ इतनी जल्दी छूट जाने पर भी तुम टूटी नहीं बल्कि और मजबूती के साथ अपने बच्चों की ढाल बनकर खड़ी रहीं।
जानता हूँ,कि तुम्हारे बच्चे तुमसे बहुत प्यार करते हैं किन्तु जीवनसाथी की जगह कोई नहीं ले सकता। मैंने तुम्हें तन्हाइयों में सिसकते देखा है। लेकिन अब मैं ये देखकर बहुत खुश हूँ,कि तुमने अपने जीवन की रिक्तता को पूर्ण करने के लिए कलम का सहारा ले लिया है और अपना एक मुकाम भी बना लिया है।
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तुम जिंदगी को बोझ समझकर नहीं खुशी से जी रही हो,आगे भी खुश रहना। तुमने सुख में दुख में परमात्मा का साथ नहीं छोड़ा ऐसे ही सदा उनपर अपना भरोसा बनाए रखना वो ही तुम्हारी हर पल रक्षा करेंगे। कल को मैं ना रहूँ तब भी अपनी मुस्कुराहट को यूँही लबों पे सजाए रखना क्योंकि इस मुस्कुराहट में ही तुम्हारे परिवार की खुशियाँ निहित हैं।
तुम्हारा
पापा
खत पढ़ते ही रमा की आँखों से अश्रुओं की अविरल धारा बह निकली। वह वहीं बैठ गई—अलमारी के सामने, फर्श पर, खत को सीने से लगाए। आँसू जैसे रोके नहीं रुक रहे थे। शब्दों का हर वाक्य उसके भीतर उतरकर किसी पुराने घाव को कुरेद रहा था और फिर उस पर मरहम भी रख रहा था।
उसे याद आया—पति के जाने के बाद उसके अपने ही लोग कैसे दूरी बनाने लगे थे। कुछ ने कहा था, “अब बच्चों को संभाल लो, दुनिया ऐसी ही है।” कुछ ने सलाह दी थी, “दूसरी शादी कर लो, अकेली औरत का जीना मुश्किल होता है।” पर किसी ने यह नहीं पूछा था कि उसके मन का क्या होगा, उसकी साँसों का क्या होगा, उसके सपनों का क्या होगा।
उस समय पापा ने ही उसे चुपचाप सहारा दिया। उन्होंने कभी बड़े-बड़े भाषण नहीं दिए, बस अपने तरीकों से उसके भीतर हिम्मत भरते रहे—कभी बच्चों के लिए पैसे भेजकर, कभी अचानक आकर राशन रखकर, कभी फोन पर लंबे समय तक मौन रहकर, ताकि बेटी को लगे कोई है… जो उसकी चुप्पी भी सुनता है।
रमा को याद आया कि पापा कितने धैर्यवान थे। अकेले रहकर भी उन्होंने हर परिस्थिति का सामना हँसते-हँसते किया। उनकी अपनी तन्हाई थी, पर उन्होंने उसे बेटी पर नहीं थोपने दिया। अंतिम दिनों में उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, फिर भी उन्होंने रमा को नहीं बताया—यह सोचकर कि अगर वह बताएंगे तो रमा बच्चों को छोड़कर उनके पास आ जाएगी। वे नहीं चाहते थे कि बच्चों की पढ़ाई में कोई रुकावट आए, क्योंकि दोनों बच्चों की बोर्ड की परीक्षाएं थीं। आज भी यह सोचकर रमा का मन बहुत विचलित हो जाता है कि पापा आखिरी खत लिखते वक्त उससे मिलने के लिए कितना तड़पे होंगे?
उस पत्र के मिलने के बाद तो बस उनकी मौत की खबर आई थी। “पापा नहीं रहे…” ये तीन शब्द रमा के कानों में आज भी वैसे ही गूँजते थे जैसे पहली बार गूँजे थे। जिस पापा ने दुख में उसका साथ दिया, उनके लिए वह कुछ नहीं कर पाई—ये अफसोस शायद उसे मरते दम तक रहेगा। वह चाहकर भी खुद को माफ नहीं कर पाती। वह जानती थी कि पापा ने जानबूझकर उसे नहीं बताया, पर बेटी का दिल तर्क कहाँ मानता है?
रमा के आँसू खत पर गिरते जा रहे थे। कागज़ कुछ जगह भीगकर नरम पड़ने लगा, जैसे वह भी रो रहा हो।
तभी कमरे में रमा का बेटा आ गया और उसकी आँखों में आँसू देखकर बोला—
“क्या हुआ माँ?”
रमा ने जल्दी से आँसू पोंछने की कोशिश की, पर आवाज़ भर्रा गई।
“कुछ नहीं बेटा,बस बड़े दिन बाद आज तेरे नाना जी का खत पड़ा तो उनकी याद आ गई।”
बेटा पास बैठ गया। उसने खत उठाकर देखा। कागज़ सचमुच पीला पड़ चुका था। उसने हल्की झुंझलाहट में कहा—
“कितना पुराना हो गया है?ये खत और पीला भी पड़ गया है।कब तक संभालकर रखोगी इसे?”
रमा की आँखों में फिर नमी आ गई। उसने खत को अपने दोनों हाथों में पकड़कर जैसे उसकी रक्षा की और धीरे, पर दृढ़ स्वर में बोली—
“जब तक जीऊँगी तब तक इसको संभालकर रखूँगी।ये खत नहीं मेरे लिए प्रेरणा का स्त्रोत है..मेरे पापा की आखिरी निशानी है।”
उसका बेटा समझ गया था कि रमा खत को लेकर काफी भावुक और गंभीर है। वह किसी भी हाल में उसे नष्ट नहीं करना चाहती। बेटे की झुंझलाहट पिघलने लगी। उसने माँ की तरफ देखा—उस चेहरे पर आँसू थे, पर उनके पीछे एक अडिग प्यार था। एक ऐसा प्यार जो समय, दूरी, मृत्यु—किसी के आगे नहीं झुकता।
बेटे ने अचानक मुस्कुराकर कहा—
“ठीक है मैं इसे आज ही जाकर लेमिनेट करा लूँगा।अब तो खुश!”
कहकर उसने रमा को गले से लगा लिया।
उसकी ममतामयी भरी बाँहों में रमा को असीम सुख की अनुभूति हुई। वह गले लगना सिर्फ बेटे का नहीं था—वह बेटे के भीतर छुपा वही बच्चा था जो कभी नाना की उँगली पकड़कर चलता था। रमा को एक पल को ऐसा लगा, जैसे पापा ने उसे प्यार से गले लगा लिया हो… जैसे पापा कह रहे हों—“देखा? मैंने कहा था न, मुस्कुराती रहना… तुम्हारी मुस्कान में ही तुम्हारे परिवार की खुशियाँ हैं।”
रमा ने बेटे की पीठ पर हाथ फेरा। उसकी सिसकियाँ अब धीमी हो चुकी थीं। आँखों में आँसू थे, पर मन में कुछ हल्का-सा हो गया था—जैसे वर्षों से दबा दर्द किसी भरोसेमंद कंधे पर टिककर थोड़ा कम हो गया हो।
बहू किचन से बाहर आई तो उसने देखा रमा और बेटा यूँ गले लगे हुए हैं। उसने कुछ नहीं पूछा, बस चुपचाप पास आकर रमा के सिर पर हाथ रख दिया। रमा ने बहू की तरफ देखा—उस नज़र में आभार था, अपनापन था। घर का गंदापन अब भी था, पर घर के भीतर रिश्तों की गरमाहट लौट आई थी।
रमा ने खत को फाइल में फिर से रखा—पर इस बार उसकी पकड़ अलग थी। अब यह कागज़ सिर्फ याद नहीं था; यह एक संदेश था—कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मुस्कान, धैर्य और विश्वास ही जीवन की असली पूँजी हैं।
सच बेटी के लिए बाबुल की यादें बहुत अनमोल होती हैं—वो मरते दम तक उन्हें संजोकर रखती है।
कमलेश आहूजा