अकेलापन – लतिका श्रीवास्तव

वह बूढ़ी औरत मुझे रोज गली के प्रवेश द्वार के बगल में बनी एक कोठरी नुमा घर के सामने ही बैठी मिलती।बहुत उदास क्लांत थकी सी लगती।

अविनाश अपनी अतिव्यस्तता की जल्दबाजी में चाह कर भी क्षणांश के लिए भी वहां ठहर नहीं पाता था।लेकिन प्रतिदिन की उसकी वही उसी जगह की उपस्थिति की आदत सी पड़ गई थी।रोज आते जाते अब वह भी अविनाश को पहचानने लगी थी।धीरे से दोनों के बीच खामोश हल्की मुस्कान का आदान प्रदान भी होने लगा था।

एक दिन जब अविनाश वहां से गुजरा तो वह दिखाई नहीं दी उसे।जल्दी में था वह आगे बढ़ गया लेकिन एक बेचैनी सी महसूस हुई उसे।शाम को ऑफिस से वापिसी के समय भी जब वह नहीं दिखी तो अविनाश गाड़ी खड़ी कर आस पास वालो से उनके बारे में पता करने लगा तो लोग बोले अरे अब उसका अंतिम समय है।दवाइयां अब उस पर असर ही नहीं कर रही हैं।आप इस गली से अंदर चले जाएं।

वह उसके घर तक पहुंच गया।दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी हल्के धक्के से खुल गया और अविनाश संकोची कदमों से अंदर बढ़ गया था।

कोई है … अंदर के सन्नाटे को चीरती अविनाश की आवाज का प्रत्युत्तर धीमी अस्फूट आवाज में आया ।

कौन है आ जाओ यहां ….बूढ़ा कांपता स्वर अविनाश को तत्क्षण अन्दर खींच ले गया था।

क्या हो गया आपकी तबियत खराब है क्या अविनाश उनके बिस्तर के निकट आ गया था जहां वह क्लांत निढाल पड़ी थीं।

अरे आपको तो तेज बुखार है माथा एकदम तप रहा है अविनाश ने उनके अग्निदग्ध माथे पर अपना हाथ रखते हुए बेहद चिंता से कहा तो बूढ़ी आँखें भर आईं और अशक्त हाथों ने अविनाश के कोमल हाथों को पकड़ लिया ।

बेटा तुम वही हो ना जो रोज यहां से गुजरते हो अटक अटक कर शब्द आ रहे थे वत्सल स्वर था।

जी हां मैं वही हूं आपको सुबह नहीं देखा फिर अभी शाम को भी आप नहीं दिखीं इसीलिए आपके घर के अंदर तक आ गया बहुत संकोच से उनके आसपास और किसी को भी देखने की उत्सुकता से अविनाश बोल पड़ा।

किसको देख रहे हो बेटा। मैं अकेली रहती हूं दो दिनों से बुखार है तुम चाय पियोगे तो मेरे लिए भी बना देना रसोई में चाय का पूरा सामान है.. वह बोली तो अविनाश चकित रह गया।

अकेली रहती हैं.. क्यों

एक बेटा है दूर शहर में नौकरी करता है वह बोली।

तो आप वहीं क्यों नहीं रहतीं ।

गई थी एक बार वहां बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।अकेले ही थी वहां भी।कोई मेरे पास बैठता नहीं था बात नहीं करता था।भाग आई वहां से चार दिन में ही कभी नहीं जाऊंगी ।जेल जैसा लगता था वह आवेशित हो गई थी।

फिर आपकी देखभाल कौन करेगा अविनाश आश्चर्य में था।

वहां भी कोई नहीं करता था।अकेली थी वहां भी यहां भी।लेकिन यहां मेरा घर है पहचाना इलाका है मेरा गांव है मेरी सांस मेरी तो है कम से कम वह भावुक हो गई।

लीजिए चाय पी लीजिए उठिए तब तक अविनाश चाय बना लाया साथ में बिस्किट भी ले आया।

दवा खा लीजिए पास में रखी दवा उन्हें देते हुए अविनाश ने कहा।

अरे बेटा अब दवा की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।अकेलापन का बुखार था ये।तुमसे दो बाते करके एकदम स्वस्थ लगने लगा।

हां बेटा आते जाते आते रहना बहुत दिनों बाद किसी ने मेरे पास बैठ कर प्यार के दो मीठे बोल बोले जिनके लिए मैं तरस गई थी।

अविनाश भीग गया अंदर तक।

हां माई रोज आऊंगा स्वयंमेव ही उसके मुंह से निकल पड़ा।

वह भी अकेला ही रहता था।ऑफिस के लोगों के साथ तो महज औपचारिक बातचीत ही होती थी।आज बहुत दिनों बाद उसे भी बूढ़ी माई के पास बैठ कर एक आत्मीय घरेलू सा एहसास हुआ था।

फिर तो वह रोज सुबह शाम वहां रुकने लगा।बैठ कर बतियाता कुछ खाता खिलाता हंसता हंसाता।

थोड़े ही दिनों में वह एकदम स्वस्थ हो गई।

लेकिन अविनाश अब भी घर आता ।दो मीठे बोल तो उसे भी तो चाहिए थे अकेलापन बांटने के लिए।

प्यार के दो मीठे बोल#कहानी प्रतियोगिता

लतिका श्रीवास्तव

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