एक कमल नाम का बूढ़ा आदमी खिड़की से ढलती शाम देख रहा था, जैसे उसका भी जाने का समय भी बस निकट ही हो।
तभी पीछे से उनके बेटे प्रणव की भारी आवाज़ आई “पापा आकर खाना खा लीजिए, ठंडा हो जाएगा।” तभी उसने कहा कि उसको भूख नहीं है, अभी वो खाना नहीं खाना चाहता है।
बिना कुछ ज्यादा बोले वो वहा से चला गया। उसके जाने के बाद वो फिर से ढलते सूरज को देखते हुए खुद भी अंधेरों से गुजरता हुआ अपने कल की यादों में चला गया। वो समय उसकी बचपन का था।
उस समय उसको जवानी का इतना भूत सवार था कि अपने पढ़ाई के चलते, अपने भविष्य के चलते वो उन लोगों को भूलता चला गया जिनकी वजह से वो वहा तक पहुंचा था और वो थी उसकी मां, उसके पिता जी के चले जाने के बाद उसकी मां ने ही उसको पाला पोसा। ऐसा नहीं था कि पैसों की कोई कमी थी क्योंकि उसकी मां भी कमाने वाले में से ही थी। उसकी मां उसे हमेशा कहती थी कि “बेटा देखना एक दिन तुम बहुत काबिल इंसान बनोगे”। पर अपने बेटे की पढ़ाई के चलते और वो खुद काबिल बनने में इतने व्यस्त हो गए कि दोनों एक दूसरे से *प्यार के दो मीठे बोल* भी बोलना भूल गए थे।
ऐसा लगता था कि वह दोनों एक छत के नीचे रहते हुए बस अपनी अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे है। वक्त कब निकल गया पता ही नहीं चला। कमल अब बड़ा हो चुका और वो अब एक काबिल जवान बन चुका था और उसकी मां अब एक रिटायर्ड कर्मचारी थी। कमल ने कभी भी किसी भी चीज की कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी थी। बस फर्क अब ये था कि उसकी मां अब अपने बेटे के प्यार के लिए तरसती थी जैसे बचपन में कमल अपनी मां के प्यार के लिए तरसता था, पर वक्त और हालातों के चलते वो ये सब कह नहीं पाता था। लेकिन अब जब उसकी मां कहती थी “बेटा हमारे पास अब किसी चीज की कमी नहीं है, तोड़ा वक्त अपनी मां के साथ भी बीता लिया कर”।
पर कमल अपनी मां की इस बात को हमेशा ताल देता था ये कह कर ” दफ्तर में बहुत काम है मां, ये तो तुम भी जानती हो कि कितना काम करते है दफ्तर में।” इसके आगे वो कुछ नहीं बोल पाती क्योंकि वो कही ना कही जानती थी कि उनको ये उनके बोए बीज का फल मिल रहा है। कुछ सालों के बाद कमल काफी काबिल बन गया था और उसके पास अब ३-४ गाड़िया भी थी। उसको जो जो चीज हासिल करनी थी वह कर चुका था, पर कमल ने जिसकी कदर नहीं की, नियति ने उससे वो चीज चीन ली, उसकी मां का दिल का दौरा के चलते निधन हो गया था। कमल को वो ही खाली पन महसूस होने लग गया था जैसे वो बचपन में होता था। उसकी मां के एक दो साल जाने के बाद उसने विवाह करने का सोचा कि शायद उसके घर में शांति का माहौल कम होगा।
जैसा कमल ने सोचा था वैसे ही हुआ पर उसकी मां का खालीपन कोई नहीं दूर कर पाया। ऐसा नहीं था कि वो अपनी पत्नी और बेटे प्रणव से बात नहीं करते थे या प्यार नहीं करते थे पर कमल के मन में उसकी मां के जाने का जो अपराध बोध था वो कभी भी कम नहीं हो पाया और वो खंजर की तरह उसको रोज तिल तिल मारता था। जिसके चलते उसने अपनी ये गलती अपने बच्चे और पत्नी के साथ नहीं की। ऐसे करते करते अब वो बूढ़ा हो चला और और अब वो अपनी बूढ़ी मां की हालत अच्छे से समझ पा रहा था कि वो तब ऐसा क्यों बोलती थी।
कमल को सब चीजें तभी ही समझ आई जब वो अपने हर एक जीवन के पड़ाव में आगे बड़ रहा था और ये भी समझ आया था कि उसकी मां ऐसे क्यों थी, पर तब तक काफी देर हो चुकी थी और उतना ही अपराध बोध भी बढ़ चुका था। कमल अपने इन खयालातों से वापिस आते हुए बिल्कुल भी नहीं रोया और एक लंबी गहरी सांस ली और सूरज के ढलते ही कुछ देर बाद प्रणव अपने पापा कमल को बुलाने आया तो देखा कि वो ऐसे ही गिरे हुए है, प्रणव ने उनकी नब्ज़ देखी और उसको भी वो एहसास हो गया था, जिसको एहसास करने से सब डरते है। कमल भी उस ढलते सूरज के समेत खुद भी ढल गया और अपने प्राण त्याग दिए थे।
इसीलिए वक्त रहते उस हर चीज की कदर करो और मीठे बोल बोलो, ताकि तुम्हारे जाने से पहले तुम्हे ये अपराध बोध ही ना प्राण ले ले।
लेखिका
तोषिका