प्यार के दो मीठे बोल – डाॅ संजु झा

वक्त का कोई भरोसा नहीं है,वह कब किस पर मेहरबान हो जाऍं और कब किसी की जिंदगी को तबाह कर दे ,कुछ कहा नहीं जा सकता है!70 साल की रिश्ते की बुआ की मौत का समाचार सुनकर ऑंखें नम हो उठीं, परन्तु दिल में एक सुकून का भी एहसास हो रहा था। माता-पिता और परिवार की लाडली  थी बुआ।

गाॅंव में  बुआ जी के पिता का काफी रुतबा था।वे हाई स्कूल के प्रधानाचार्य थे, परन्तु लड़कियों की शिक्षा के प्रति  दकियानूस ही। उन्होंने  दोनों बड़ी बेटियों की शादी कम उम्र में ही कर दी थी।छोटी बेटी शालू(बुआ) भी तेरह वर्ष की हो चुकी  थी। मात्र तेरह वर्ष की आयु में बुआ की भी शादी काफी धूम-धाम से हुई थी।

उस समय बाल-विवाह जैसा कोई कठोर कानून नहीं था।कम उम्र में ही लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। बुआ का गौना तीन वर्ष बाद  तय हुआ था। बुआ के पिताजी  घमंड से लोगों को सुनाकर कहते -“देखा!जैसी सुंदर मेरी बेटी शालू है,वैसा ही सुन्दर दामाद मैंने ढ़ूॅंढ़ा है।”

बुआ के पति सचमुच देखने में बहुत सुंदर थे।उनका परिवार भी प्रतिष्ठित और बड़ा था।उनके पति छः भाई थे। शादी के समय बुआ ने पति की बस एक झलक देखी थी।

उस समय उन्हें शादी का कोई खास मतलब नहीं पता था।बुआ मैके में बस अपने भाई -भतीजों और परिवार के साथ मगन रहती थी।सभी उनसे बहुत प्यार करते थे। खुबसूरत कमल की पंखुडी-सा स्निग्ध और भोला बुआ का चेहरा यौवन की आहट पर दमक उठा।

शादी के तीन साल बाद बुआ के गौने की तैयारी हो रही थी।अभी भी बुआ में हिरणी-सा अल्हड़पन था। ससुराल जाने के नाम से बुआ इठलाती हुई कहती -“माॅं! मैं तुमलोगों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊॅंगी!”

माॅं समझाते हुए कहती -“बेटी!सभी लड़कियों को एक-न-एक दिन ससुराल जाना ही पड़ता है!”

बुआ माॅं के गले लगकर कहती -“ठीक है! मैं जाऊॅंगी , परन्तु मुझे जल्दी बुला लेना।”

माॅं भी सहमति में सिर हिला देती,तो बुआ खुश हो जाती।बुआ को कहाॅं पता था कि ससुराल का सुख उनके नसीब में लिखा ही नहीं है!

बुआ के गौने की विशेष तैयारियाॅं हो रहीं थीं।घर की छोटी बेटी होने के कारण माता-पिता कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे।बुआ की हर छोटी-बड़ी ख्वाहिशों का ध्यान रख जा रहा था। बुआ के पिताजी घर-बाहर की व्यवस्था में व्यस्त थे।गौने में दामाद सोमेश के साथ कुछ गाॅंववाले भी आ रहें थे। पूरा परिवार ध्यान रख रहा था कि  कहीं कोई कमी न रह जाऍं!

गौने से एक दिन पहले बुआ के पति सोमेश शहर से अपने गाॅंव आ चुके थे। सोमेश शाम में शौच के लिए बाहर निकले,उस समय गाॅंवों में शौचालय की व्यवस्था खेत-खलिहान,नदी के किनारे में ही   रहती थी। गर्मी का मौसम था।भीषण गर्मी में जीव-जंतु भी शाम  में नदी किनारे हवा खाने निकलते हैं।शाम के धुॅंधलकापन में सोमेश का पैर धोखे से साॅंप पर पड़ गया और तुरंत ही साॅंप ने उन्हें डस लिया।साॅंप जहरीला गेहूॅंअन था।साॅंप के जहर से सोमेश तुरंत अचेत हो गए। आनन-फानन में उन्हें घर लाया गया।शहर से डाॅक्टर बुलाया गया, परन्तु तब तक काफी देर हो चुकी थी। डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सोमेश के परिवारवाले उन्हें मृत नहीं मान रहे थे,दो दिन तक आस्था का दामन थामे झाड़-फूॅंक करवाते रहें।पर झाड़ -फूॅंक से  कोई चमत्कार नहीं हुआ, सोमेश परिवार को रोते-बिलखते छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल पड़े।

सोमेश के निधन से दोनों दोनों परिवार पर वज्रपात हो गया।बुआ के मैके में जैसे ही निधन की खबर पहुॅंची,वैसे ही चारों तरफ हाहाकार मच गया।बुआ के माता-पिता,भाई-भाभी तथा परिवार के सभी सदस्य दहाड़े मारकर रो उठे। बुआ भी सभी को देखकर रोने लगती।बुआ को कुछ खास समझ में नहीं आ रहा था।‌बुआ‌तो खुश थी कि अब उन्हें माता-पिता और परिवार को छोड़कर कहीं नहीं जाना पड़ेगा।एक दिन बुआ ने मुझे  बताते हुए कहा था -“उस समय मुझमें पति-पत्नी जैसी कोई भावना और समझ नहीं थी।सभी को दुखी देखकर मैं भी दुखी हो जाती थी, परन्तु जैसे-जैसे मुझमें समझ आती गई, वैसे-वैसे मुझे उन बातों का एहसास होता गया।”

बुआ  का गौना नहीं हो सका।बुआ मायके में ही रह गई।बुआ के  माता-पिता, भाई-भाभी उनका खास ख्याल रखते।बुआ भी अपने माता-पिता,भतीजा-भतीजियों के साथ मस्त रहतीं। गाॅंव में बच्चों  के साथ बाग-बगीचों तथा सभी के घर घूमना ,खेलना ही बुआ की दिनचर्या बन गई थी।बुआ के साथ सभी मीठे बोल बोलते।मायके में बुआ को किसी चीज की कमी नहीं थी। ससुरालवालों ने बुआ को मनहूस समझकर कोई खोज-खबर नहीं ली।एक-दो बार अपने बेटे के मुंडन और जनेऊ में बुआ का देवर उन्हें ससुराल ले गया।बुआ के ससुर ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में कहा -“बहू!अगर तुम यहाॅं रहना चाहो,तो तुम्हें दाल-रोटी की दिक्कत नहीं होगी, परन्तु अपने हिस्से के बारे में भूलकर भी नहीं सोचना!

उनकी सास तो उन्हें अपने बेटे का कातिल समझकर मुॅंह फेर लेती।सभी का व्यवहार उनके प्रति उपेक्षित ही था।

ससुराल में बुआ से दो मीठे बोल बोलनेवाला नहीं था।उस समय बुआ को पति की अहमियत समझ आई।

उसके बाद बुआ कभी ससुराल नहीं गई। सचमुच पति के बिना क्या ससुराल?जैसे-जैसे बुआ परिपक्व हो रहीं थीं, वैसे-वैसे उन्हें पति की कमी महसूस होने लगी थी।

पचास-साठ वर्ष पूर्व कट्टर ब्राह्मण समाज ने बुआ के पुनर्विवाह की बात सोची भी नहीं,उस समय तो औरतें बस हाड़ -माॅंस का पुतला  भर थीं। धीरे-धीरे बुआ की जिन्दगी में मायूसियाॅं घिरने लगीं।बुआ की भावनाओं से किसी को खास मतलब नहीं रह गया था।बुआ के बहनोई शहर में प्रोफेसर थे,तथा आधुनिक विचारों के थे। उन्होंने बुआ के दुख को शिद्दत से महसूस किया।बुआ की जिन्दगी सॅंवारने हेतु उन्होंने अपने ससुर से कहा -“पिताजी!शीलू घुट -घुटकर जिन्दगी जी रही है।आप इजाजत दें,तो मैं उसे शहर ले जाकर पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बना दूॅंगा।”

बुआ के पिताजी को यह प्रस्ताव पसन्द आया और उन्होंने इजाजत भी दे दी, परन्तु संयुक्त परिवार होने के कारण बुआ के बड़े चाचा ने सख्ती से मना करते हुए कहा -“छोटे! तुम्हें समझ नहीं है कि एक बेटी को बसाने के चक्कर में बसी-बसाई बेटी की गृहस्थी उजड़ सकती है! मैं तो इस बात की इजाजत हर्गिज नहीं दूॅंगा।”

 इस बात के लिए मरने तक बुआ अपने बड़े चाचा को कोसतीं रहीं।

समय के साथ बुआ की जिन्दगी में नीरसता और एकाकीपन भरने लगा। माता-पिता का देहांत हो चुका था।सभी भाईयों की शादी हो गई।सभी शहर चले गए।अब बुआ भाईयों के घर की चौकीदार बनकर रह गई।जिस घर में बुआ के लिए केवल मीठे बोल बोले जाते थे,उस घर में वह दो मीठे बोल के लिए तरस गईं थी।  बुआ दसवीं पास थीं,इस कारण मन बहलाने के लिए कुछ गरीब बच्चों को घर में पढ़ाने लगीं। यथाशक्ति उनकी मदद भी करने लगीं।उनके परिवार को बुआ का यह काम बिल्कुल पसंद नहीं था।इन छोटे कामों से बुआ के परिवार की इज्जत पर ऑंच आती थी।जो छोटा भाई उनसे हमेशा मीठे बोल बोला करता था,उसी ने एक दिन उनसे कहा -” दीदी!आपको पैसों की जरूरत है,तो मैं भेज दूॅंगा, परन्तु ऐसे छोटे काम कर परिवार की प्रतिष्ठा को धूमिल मत कीजिए।”

उस दिन पहली बार रौद्र रुप धारण करते हुए बुआ ने कहा था -“छोटे! तुम लोगों को परिवार की इज्जत की बहुत चिन्ता है, परन्तु एक जीते-जागते इंसान की नहीं!अगर मैं किसी के साथ भाग जाती,तो परिवार के इज्जत पर ऑंच आती,परन्तु इन कुछ गरीब -बेसहारा की मदद से कैसे परिवार की प्रतिष्ठा धूमिल होती है? मैं बस तुमलोगों के घर की चौकीदार नहीं हूॅं। मैंने परिवार की इज्जत की खातिर अपनी इच्छाओं -भावनाओं की कभी परवाह नहीं की।बस आत्मसंतुष्टि के कारण मैं इन बच्चों की मदद कर रही हूॅं,जो मेरे जीवित रहते तक जारी रहेगी।अगर तुम लोगों को एतराज है,तो मैं कहीं अन्यत्र चली जाऊॅंगी!”

अपने स्वार्थ और इज्जत के कारण छोटे भाई ने कहा -“दीदी!आप इन बच्चों के साथ अपना काम जारी रख सकतीं हैं, परन्तु ध्यान रहे कि घर अनाथालय न बन जाऍं!”

बुआ -“छोटे!जो खुद अनाथ हो,वह दूसरों के घर को अनाथाश्रम कैसे बना सकता है? मैं तो बस इन्हें मदद के नाम पर दो मीठे बोल कहती हूॅं और उनके दो मीठे  बोल सुनकर जिन्दा रहती हूॅं।”

आज खबर मिली कि परिवार से दो मीठे बोल के लिए तरसती बुआ पंचतत्व में विलीन हो गई।ईश्वर अगले जन्म में उन्हें सारी खुशियाॅं प्रदान करें।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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