बहू का सुख पाने के लिए पहले सास को भी अपना रवैया ठीक करना पड़ेगा। – गीतू महाजन

इस बार जब पल्लवी मायके आई तो देखा कि नए पड़ोसियों से उसकी मां नंदिनी जी की अच्छी खासी दोस्ती हो गई थी।उन लोगों का घर में आना जाना भी था और जब पल्लवी आई तो पड़ोस की रीमा आंटी उससे बहुत ही आत्मीयता से मिली ऐसे जैसे उसके बारे में बहुत कुछ जानती हो।दो-तीन दिनों में ही पल्लवी भी जान गई थी

कि मां रीमा आंटी  की नई बहू सोनाली से बहुत प्रभावित हैं क्योंकि मां के मुंह से ही उसने सोनाली के लिए बहुत तारीफें सुन ली थी।अक्सर मां फोन पर भी उससे सोनाली के बारे में बात करती पर आज तो उसने  प्रत्यक्ष रूप से देख लिया था जब सोनाली ने पल्लवी की फेवरेट गट्टे की सब्ज़ी बनाकर भेजी तो उसने देखा मां का चेहरा कैसे खुशी से भर उठा था।

खैर, रात को खाना खाने के बाद भी नंदिनी जी सोनाली की तारीफें कर रही थी तभी पल्लवी बोली,” मां,मैं कल सुप्रिया भाभी के घर जाऊंगी.. भाभी बहुत बार फोन कर चुकी हैं

और शरद भैया मुझे सुबह लेने आ जाएंगे।दो-तीन दिन उनके पास भी रुकूंगी..पिछली बार आई थी तो सिर्फ मिलकर ही चली गई थी

पर इस बार भाभी ने बोला है कि मुझे वहां रुकना पड़ेगा और आरव के साथ भी समय बिता लूंगी उसकी शरारतें जब सुनती हूं तो उसे गोद में उठाकर प्यार करने को बहुत दिल करता है।पल्लवी ने देखा कि सुप्रिया का नाम सुनते ही मां का चेहरा थोड़ा बदल गया था लेकिन मां ने कुछ कहा नहीं  और चुपचाप सोने चली गई।

सुबह शरद आया और पल्लवी दो-तीन दिन के लिए भाई के साथ उसके घर चली गई। जब वापिस आई तो देखा तो मां के पास रीमा आंटी बैठी हुई थी और उन्हें बता रही थी कि कैसे सोनाली उनके लिए उनकी फेवरेट रंग की साड़ी खरीद कर लाई है।पल्लवी से मिलकर रीमा आंटी तो चली गई

पर मां का उतरा चेहरा देखकर पल्लवी ने पूछा तो मां बोली,” देखा, सोनाली को… कैसे अपनी सास के आगे पीछे घूमती है सास को मां समझती है और किसे कैसे खुश रखना है पूरी तरह जानती है। तू पड़ोस की ब्याही हुई बेटी जब मायके आई तो तेरी पसंद की गट्टे की सब्ज़ी भी बना कर भेज दी पर मुझे देखो मैं कैसे अपनी बहू से ऐसी उम्मीद रखूं ..

वो तो अलग घर लेकर बैठी है.. कभी-कभी मेहमानों की तरह मिलने आ जाती है और तू देख.. उसने बुलाया और तू भागकर तीन दिन के लिए वहां रहने चली गई यह भी नहीं सोचा कि उसने मां के साथ क्या किया था”।

पल्लवी चुपचाप सारी बातें सुन रही थी पर जब बार-बार नंदिनी जी इस बात को दोहरा रही थी तब वह उन्हें टोकते हुए बोली,” मां, यह क्या रट लगा कर बैठी हो..तुम सुप्रिया भाभी के बारे में बोल रही हो कि वह तुमसे अलग रहने के लिए चली गई और तुम्हें वह  अपनी वह मां नहीं समझती पर एक बात बताओ तुमने उसे कभी बेटी बनने दिया।

कभी तुमने उसे इस बात का हक दिया कि वह तुम्हें अपनी मां समझे.. कभी भी तुमने अपनी बहू को प्यार के मीठे बोल बोले।तुम रीमा आंटी और सोनाली की बात करती हो कि सोनाली उनके आगे पीछे घूमती है पर तुमने कभी रीमा आंटी को देखा है कि वह कैसे बेटा बेटा कहकर सोनाली पर अपना प्यार लुटाती हैं।

कोई भी बहू अपनी सास से ऐसे प्यार के मीठे बोल सुनकर उनकी इज़्ज़त करेगी और बदले में अपना प्यार भी लुटाएगी।।याद करो वह दिन जब सुप्रिया भाभी नई -नई ब्याही आई थी तो कितनी खुश रहती थी।उसकी हंसी से सारा घर चहक उठा था।पिताजी भी कहते थे कि ऐसे लगता है जैसे घर गुलज़ार हो गया है। 

शरद भैया का खिला खिला चेहरा देखकर हम सब कितने खुश थे।भाभी सुबह सवेरे जल्दी उठती और सब की पसंद का कितना ख्याल रखती। मेरे लिए ऑफिस जाने के लिए टिफिन बनाती और उसमें भी मेरी पसंद की चीज़ें डालती जिसे मेरे ऑफिस के सहकर्मी चटकारे ले लेकर खाते।

भाभी का वर्क फ्रॉम होम होता था लेकिन इतने काम के बावजूद भी वह रसोई में सारा काम करने की कोशिश करती क्योंकि नई बहू होने के नाते वह इस घर में शायद अपना सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रही थी तभी आपके साथ बैठकर पापड़, बड़ियां,आचार कितना सब कुछ करने की कोशिश करती पर आप उन्हें हमेशा किसी न किसी बात पर टोक देती।

एक बार उन्होंने मेरे कहने पर चाइनीज़ बनाने की कोशिश की थी और मैं भी उन्हीं के साथ रसोई में खाना बना रही थी और वह चीज़ें अच्छी नहीं बन पाई तो तुमने उनकी हौसला-अफजाई की जगह उन्हें चार बातें सुना दी थी।तुमने उस समय अपनी बेटी की तरफ नहीं देखा जिसे तो रसोई का कुछ खास काम नहीं आता था

पर अपनी बेटी के आगे तुमने बहू को अच्छी खासी सुना दी।एक बार नहीं सोचा कि वह भी किसी की बेटी है उसके मन को कितनी ठेस पहुंची होगी।

फिर जब शारदा मौसी हम दोनों के लिए जयपुर से ब्लॉक प्रिंटिंग के सूट लेकर आई तो सुप्रिया भाभी कितनी खुश हुई थी पर मौसी के जाने के बाद तुमने उनकी अच्छी डांट लगाई

यह कहकर कि बहू का किसी के तोहफे देने पर ऐसे उछलकर खुश होना क्या अच्छा लगता है।मैं भी तो उतनी ही खुश हो रही थी और शारदा मौसी तो सुप्रिया भाभी को कितना ही प्यार करके गई थी पर तुम्हें तो अपना सास का रुतबा दिखाना था इसलिए शायद वह सब कह गई जो बिल्कुल भी उचित नहीं था। 

फिर एक बार शारदा मौसी के बेटे अनंत भैया ने पिकनिक का प्रोग्राम बनाया तो हम सब कितने उत्साहित थे पर आपने सुप्रिया भाभी को यह कहकर नहीं जाने दिया कि यह सब बच्चों के काम है और तब शरद भैया भी शहर से बाहर थे तब आपने एक बार नहीं सोचा कि अनंत भैया जो खुद दो बच्चों के पिता थे

वह पिकनिक पर जा सकते हैं और आपकी खुद की बेटी जो सुप्रिया भाभी से छोटी थी वह जा सकती है तो सुप्रिया भाभी क्यों नहीं।उस दिन मैंने जाना कि अगर सास मां बन जाए तो बहू भी बेटी बनने की कोशिश तो कर ही सकती है और ऐसे ही अनगिनत बातें थी

जिसे सुप्रिया भाभी धीरे-धीरे आपसे और हम सबसे दूर होती चली गई। उन्होंने आपके साथ एक दूरी का रिश्ता बना लिया था।

घर में रहते हुए भी वह आपसे कटी कटी सी रहती। आपके सामने हमेशा चुप्पी का आवरण ओढ़े रहती और इस बात को लेकर भी आपने  उन्हें यह कहकर ताने देने शुरू किया कि वह इस घर में रहना ही नहीं चाहती पर आप यह नहीं समझ पाई की सुप्रिया भाभी सिर्फ आपके प्यार के मीठे बोलों को तरस गई थी। मैंने भी तब आपको बहुत समझाने की कोशिश की पर आपने मेरी एक भी नहीं सुनी।

शरद भैया भी भाभी की चुप्पी और आपके तानों से तंग आकर आकर अलग होने का फैसला ले चुके थे शायद उन्हें भी सुप्रिया भाभी की हंसी की कमी खलने लगी थी और भाभी क्या चाहती थी सिर्फ प्यार के दो मीठे बोल.. कोई इतनी भी बड़ी चाहत नहीं थी उनकी कौन से वह हीरे जवाहरात या फिर ज़मीन जायदाद मांग रही थी। आज आप रीना आंटी और सोनाली की तारीफ करते थकती नहीं है पर क्या आपने कभी रीना आंटी को देखा है हमेशा मेरी सोनाली.. मेरी सोनाली करते उसे कितना प्यार देती है प्यार देने से बढ़ता है ना की टोका टोकी से।

बहू का सुख पाने के लिए पहले सास को भी अपना रवैया ठीक करना पड़ेगा तभी बात आगे बन पाएगी। अगर मेरे साथ भी मेरी सास ऐसा करें तो आप बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए ” इन्हीं सब प्रश्नों के साथ पल्लवी ने मां को अकेला छोड़ दिया और अपने कमरे में चली आई। पिता दीनानाथ जी भी पास ही बैठे थे और वह सारी बातें सुन रहे थे। जानते थे कि अपनी पत्नी को समझाना उनके वश में कभी नहीं रहा पर आज उनके मन की सारी बातें उनकी बेटी ने ही कह दी थी उन्हें ऐसा लगा जैसे शब्द उनके हों और ज़ुबान पल्लवी की।

खैर, थोड़ी देर के बाद सब सो चुके थे सिवाय नंदिनी जी के जिनकी आंखों में आज बिल्कुल नींद नहीं थी। एक-एक करके पुरानी सारी बातें चलचित्र की भांति उनकी आंखों के सामने आ रही थी और वह यह सोच रही थी कि भूतकाल में वह कितनी ही गलतियां कर बैठी हैं।

सुबह पल्लवी की नींद खुली तो देखा मां रसोई में खड़ी थी और वहां से बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी। उसे देखकर नंदिनी जी बोली,” चल जल्दी कर.. जल्दी से तैयार हो जा..तेरी भाभी के पास जाना है।देख, उसका मनपसंद गाजर का हलवा और कुछ कचौड़ियां बनाई हैं..उसे खूब पसंद है ना।आज अपनी एक बेटी के साथ अपनी दूसरी बेटी के पास जाना चाहती हूं और इस घर की बेटी से माफी मांग कर उसे वापिस उसकी जगह लाना चाहती हूं।जानती हूं बहुत गलतियां की है पर शायद एक मां को माफी तो मिल ही सकती है”।

पल्लवी की आंखों में मां की बातें सुनकर आंसू आ गए। कुछ देर बाद वह अपने माता-पिता के साथ अपने भाई के घर पर थी। मां सुप्रिया भाभी के गले लगा कर उनसे माफी मांग रही थी और सुप्रिया भाभी की आंखों से झरझर आंसू निकल रहे थे। शरद भैया ने भी छुट्टी ले ली थी।

नंदिनी जी ने बेटे से कहा कि,” मैं तेरी भी कसूरवार हूं.. तुझे अपने घर से दूर करने में मेरा ही कसूर है पर कहते हैं ना जब जागो तभी सवेरा तो बस बीती बातें भुलाकर अपनी मां को माफ कर दो। घर आजा बेटा.. मैं अब अपने बच्चों से और दूर नहीं रहना चाहती”, मां की बात सुन शरद भैया ने आगे आकर मां को गले लगा लिया।

कुछ दिनों बाद पल्लवी तो वापिस अपने ससुराल आ गई पर जानती थी कि अगली बार जब वह मायके आएगी तो उसे अपना भरा पूरा परिवार मिलेगा।भाई भाभी की हंसी से गुलज़ार और नन्हे भतीजे आरव की शरारतों से चहकता हुआ उसका मायका और साथ ही वहांं होंगे सास के बहू के लिए प्यार के दो मीठे बोल..वही मीठे बोल जिनके लिए हर बहू अपने दिल में अरमान रखती है और यह बहू का हक भी हैै क्योंकि प्यार पर तो सभी का हक होता है।

#स्वरचितएवंमौलिक 

#अप्रकाशित 

गीतू महाजन, 

नई दिल्ली।

#साप्ताहिकविषय # प्यार के दो मीठे बोल

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