क्या बुढ़ापे में एक-एक पैसे के लिए मोहताज की तरह जीना सच में लालच की निशानी होती है, या उस फटे हुए स्वेटर और घिसी हुई चप्पलों के पीछे कोई ऐसा मौन और गहरा बलिदान छिपा होता है, जिसे दुनिया की सतही नज़रें कभी नहीं देख पातीं?
रोहन पैर पटकता हुआ पंडित जी के घर से बाहर निकल आया। उसके चेहरे पर लालिमा थी और नथुने गुस्से से फड़क रहे थे। उसे शांति आंटी पर बहुत तरस आ रहा था और कैलाश बाबू पर बेतहाशा गुस्सा।
“कैसा आदमी है? खुद भी फटी बनियान और उधड़े हुए स्वेटर में रहता है और पत्नी को भी भिखारी बनाकर रखा है। शिक्षा विभाग से क्लास वन अफसर के पद से रिटायर हुए हैं, हर महीने मोटी पेंशन आती है, फिर भी इतना लालच क्यों?” रोहन ने मन ही मन बुदबुदाते हुए अपने घर का दरवाजा खोला।
रोहन और कैलाश बाबू पिछले पांच सालों से पड़ोसी थे। रोहन एक आईटी कंपनी में मैनेजर था और आधुनिक विचारों वाला युवा था। उसके लिए जीवन का मतलब था कमाना और अच्छे से जीना। लेकिन उसके सामने वाले घर में रहने वाले कैलाश बाबू का जीवन-यापन रोहन की समझ से बिल्कुल परे था।
आज शाम जब रोहन अपनी पत्नी के हाथ की बनी कुछ मिठाइयां लेकर कैलाश बाबू के घर गया था, तो उसने जो देखा, उसने उसके सब्र का बांध तोड़ दिया। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। शांति आंटी ने ठंड से बचने के लिए मोहल्ले में फेरी लगाने वाले से 150 रुपये का एक साधारण सा शॉल खरीद लिया था। जब कैलाश बाबू को यह पता चला, तो उन्होंने पूरे घर को सिर पर उठा लिया। उन्होंने उस फेरी वाले को वापस बुलवाया, शॉल वापस की और 150 रुपये वापस अपनी जेब में रख लिए। शांति आंटी चुपचाप एक कोने में खड़ी कांपती रहीं और आँखें पोंछती रहीं। रोहन से यह सब देखा नहीं गया और वह बिना मिठाई दिए ही वहाँ से पैर पटकता हुआ लौट आया।
घर आकर रोहन ने अपनी पत्नी श्रुति को पूरा किस्सा सुनाया। श्रुति ने भी सहमति जताते हुए कहा, “सच में रोहन, इन दोनों पति-पत्नी को देखकर तो मुझे भी बहुत अजीब लगता है। कैलाश अंकल तो सब्जी वाले से दो रुपये के धनिये के लिए भी आधे घंटे तक बहस करते हैं। ना कभी इनके घर कोई नया सामान आता है, ना शांति आंटी के तन पर कभी कोई नई साड़ी दिखती है। बच्चे इनके हैं नहीं, पता नहीं इतना पैसा छाती पर बांधकर ऊपर ले जाएंगे क्या? यह तो एक तरह की मानसिक बीमारी है।”
रोहन ने गहरी साँस ली, “मुझे तो आंटी पर दया आती है। पूरी उम्र इस कंजूस आदमी के साथ निकाल दी। एक औरत को शादी के बाद क्या चाहिए होता है? थोड़ा सा सुख, थोड़ा सा आराम। लेकिन यहाँ तो 150 रुपये के शॉल के लिए सरेआम बेइज्जती सहनी पड़ रही है।”
दिन बीतते गए। रोहन के मन में कैलाश बाबू के लिए जो सम्मान था, वह पूरी तरह से घृणा में बदल चुका था। वह अब रास्ते में उन्हें देखकर नमस्ते तक नहीं करता था। कैलाश बाबू उसी तरह अपनी पुरानी, घिसी हुई साइकिल पर बाजार जाते, फटे हुए जूतों पर पॉलिश करके उन्हें चमकाते और अपनी खामोश जिंदगी जीते रहे। शांति आंटी भी हमेशा एक पुरानी सूती साड़ी में अपने घर के आंगन में काम करती नजर आतीं। उनके चेहरे पर हमेशा एक थकान सी रहती थी, लेकिन उन्होंने कभी किसी से अपने पति की शिकायत नहीं की।
सर्दियों का मौसम अपने चरम पर था। एक रात करीब दो बजे रोहन की नींद अचानक एक तेज आवाज़ से खुली। यह आवाज़ कैलाश बाबू के घर से आ रही थी। कोई जोर-जोर से रो रहा था। रोहन ने तुरंत अपनी जैकेट पहनी और दौड़कर बाहर गया। उसने देखा कि कैलाश बाबू का दरवाजा खुला हुआ है। अंदर का नजारा देखकर रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
शांति आंटी फर्श पर बेहोश पड़ी थीं और उनके मुँह से झाग निकल रहा था। कैलाश बाबू उनके सिर को अपनी गोद में रखकर पागलों की तरह रो रहे थे।
“रोहन बेटा… मेरी शांति को बचा लो! इसे अस्पताल ले चलो, मेरे पास गाड़ी नहीं है बेटा,” कैलाश बाबू ने हाथ जोड़कर, फूट-फूट कर रोते हुए कहा। उनका वो सख्त और कंजूस चेहरा आज एक लाचार और डरे हुए बच्चे जैसा लग रहा था।
रोहन ने बिना एक पल गँवाए अपनी कार निकाली। श्रुति भी आ गई और सब मिलकर शांति आंटी को शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल ले गए।
अस्पताल पहुँचते ही शांति आंटी को आईसीयू में भर्ती कर लिया गया। डॉक्टर तेजी से अंदर-बाहर भाग रहे थे। कैलाश बाबू आईसीयू के बाहर एक लोहे की बेंच पर सिकुड़ कर बैठ गए। उनके हाथ कांप रहे थे और उनके होठों पर लगातार कोई प्रार्थना चल रही थी।
रोहन ने अस्पताल के काउंटर पर जाकर कुछ पैसे जमा किए और वापस कैलाश बाबू के पास आकर खड़ा हो गया। उसके मन में अभी भी वह 150 रुपये वाले शॉल की बात चुभ रही थी, लेकिन इंसानियत के नाते वह वहाँ खड़ा था।
करीब एक घंटे बाद, अस्पताल के सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट, डॉ. माथुर बाहर आए। वे कैलाश बाबू को बहुत अच्छे से जानते थे। उन्होंने कैलाश बाबू के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “कैलाश जी, मैंने आपको पिछले महीने ही कहा था कि अब हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है। शांति जी का हार्ट बहुत तेजी से फेल हो रहा है। वाल्व पूरी तरह से डैमेज हो चुके हैं। हमें कल ही सर्जरी करनी पड़ेगी, वरना हम इन्हें खो देंगे।”
कैलाश बाबू की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। “डॉक्टर साहब, आप बस मेरी शांति को बचा लीजिए। मेरे पास कुछ पैसे जमा हैं। मैं कल सुबह ही बैंक से निकालकर ले आऊँगा। अगर कम पड़े तो मैं अपना घर गिरवी रख दूँगा, लेकिन मेरी पत्नी को कुछ नहीं होना चाहिए।”
रोहन जो पास ही खड़ा सब सुन रहा था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने डॉ. माथुर से पूछा, “डॉक्टर साहब, आंटी को क्या हुआ है?”
डॉ. माथुर ने रोहन को देखा और फिर कैलाश बाबू की तरफ देखते हुए एक गहरी साँस ली। “तुम इनके पड़ोसी हो? तुम्हें नहीं पता? शांति जी को पिछले चार सालों से एक बहुत ही दुर्लभ और गंभीर हृदय रोग है। इनकी दवाइयां विदेश से आती हैं, जिनका महीने का खर्च ही लगभग साठ हजार रुपये है। कैलाश जी एक सरकारी पेंशनर हैं। अपनी पत्नी की इन महंगी दवाइयों का खर्च उठाने के लिए इस आदमी ने अपनी जिंदगी की हर जरूरत, हर सुख को मार दिया है।”
रोहन सन्न रह गया। उसके कानों में डॉ. माथुर के शब्द किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे।
डॉक्टर ने आगे कहा, “शांति जी की इस सर्जरी का खर्च लगभग पच्चीस लाख रुपये है। कैलाश जी पिछले तीन सालों से एक-एक पाई जोड़ रहे हैं ताकि वे अपनी पत्नी का ऑपरेशन करवा सकें। इन्होंने कभी किसी से मदद नहीं मांगी, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। मैंने इन्हें कई बार सर्दियों में उसी पतले और फटे हुए स्वेटर में अस्पताल आते देखा है। जब मैं इनसे कहता हूँ कि आप अपने लिए कुछ क्यों नहीं लेते, तो ये मुस्कुरा कर कहते हैं कि ‘मेरे नए स्वेटर से ज्यादा जरूरी मेरी शांति की एक दिन की दवा है’।”
रोहन का गला पूरी तरह से रुँध गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसका दिल निकालकर उसके हाथों में रख दिया हो। उसे वो 150 रुपये का शॉल याद आ गया। उसे अपनी वो घिनौनी सोच याद आ गई जब वह कैलाश बाबू को ‘कंजूस’ और ‘मानसिक बीमार’ कह रहा था।
“वो 150 रुपये… वो 150 रुपये इन्होंने लालच में नहीं बचाए थे…” रोहन के मुँह से बेसाख्ता निकला। उसे समझ आ गया कि कैलाश बाबू ने उस दिन शॉल इसलिए वापस करवा दिया था क्योंकि वो 150 रुपये शांति आंटी की सर्जरी के उस पच्चीस लाख के पहाड़ को छोटा करने के लिए जोड़े जाने थे। कैलाश बाबू को पता था कि अगर वो पैसा शॉल में गया, तो शायद शांति आंटी के जीवन का एक पल कम हो जाएगा।
रोहन धीरे-धीरे उस लोहे की बेंच की तरफ बढ़ा जहाँ कैलाश बाबू सिर झुकाए बैठे थे। रोहन की आँखों से आँसू बह रहे थे। वह सीधा कैलाश बाबू के पैरों में गिर पड़ा।
“मुझे माफ़ कर दीजिए अंकल… मुझे माफ़ कर दीजिए!” रोहन दहाड़ मार कर रोने लगा। “मैं कितना अंधा था। मैं आपकी फटी बनियान और घिसे हुए जूतों को आपका लालच समझता रहा। मुझे कभी नहीं दिखा कि उन फटे हुए कपड़ों के पीछे एक ऐसा पति है जो अपनी पत्नी की सांसों को खरीदने के लिए अपनी इज्जत और अपनी जरूरतें सरेआम नीलाम कर रहा है। मैं बहुत बड़ा पापी हूँ अंकल।”
कैलाश बाबू ने अपने कांपते हाथों से रोहन को उठाया और सीने से लगा लिया। “पागल हो गया है क्या बेटा? तूने तो आज मेरी बहुत मदद की है। दुनिया क्या सोचती है, मुझे उससे क्या फर्क पड़ता है रोहन? जब मेरी शांति ही इस दुनिया में नहीं रहेगी, तो मैं उन नए कपड़ों और दुनिया की वाहवाही का क्या करूँगा? मेरे लिए मेरी पत्नी की एक साँस इस दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है। मैंने कोई कंजूसी नहीं की, मैंने तो बस अपनी दुनिया को बचाने की कोशिश की है।”
उस रात रोहन ने बहुत कुछ सीखा। उसने सीखा कि सच्चा प्यार सिर्फ महँगे रेस्टोरेंट में खाना खाने या शादी की सालगिरह पर हीरे की अंगूठी देने में नहीं होता। सच्चा प्यार तो उस फटे हुए कुर्ते की जेब में होता है, जो अपनी हर ख्वाइश को मार कर, सामने वाले की जिंदगी को बचाने के लिए पाई-पाई जोड़ता है।
अगले दिन सुबह, रोहन ने अपनी फिक्स डिपॉजिट तुड़वा दी। उसने और मोहल्ले के कुछ अन्य समझदार लोगों ने मिलकर बाकी बचे पैसों का इंतजाम किया। शांति आंटी का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया। जब शांति आंटी को होश आया, तो सबसे पहले उनकी नजरें अपने पति को तलाश रही थीं। कैलाश बाबू उसी फटे हुए स्वेटर में उनके पास खड़े थे, लेकिन उस दिन रोहन को उस फटे स्वेटर में कोई कंजूस आदमी नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे अमीर और सबसे सच्चा प्रेमी नजर आ रहा था।
जिंदगी में हम अक्सर लोगों को उनके कपड़ों, उनके रहन-सहन और उनकी खर्च करने की आदतों से तौलते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हर इंसान की एक कहानी होती है, एक संघर्ष होता है जिसे वह दुनिया से छिपाकर रखता है। किसी के फटे हुए जूते उसकी गरीबी या कंजूसी का ही नहीं, बल्कि उसके किसी बहुत बड़े और मौन त्याग का भी प्रतीक हो सकते हैं।
क्या हमने भी कभी बाहरी दिखावे के आधार पर किसी इंसान के बारे में गलत राय बनाई है? क्या हम भी कभी उस बंद किताब के पन्नों को समझे बिना उसके कवर को देखकर उसे बुरा कह चुके हैं?
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