“समझदारी का मोती” – संगीता अग्रवाल

क्या बेटियों की शादी में लाखों रुपये सिर्फ चार घंटे के दिखावे और झूठी शान पर फूंक देना समझदारी है? एक सास जो हमेशा अपनी बहू को ‘कम अक्ल’ मानती थी, उसे कैसे एक तूफानी रात में समझ आया कि उसकी बहू ने अपनी उसी ‘बेवकूफी’ से उसकी बेटी का पूरा भविष्य संवार दिया है?

“तेरी भाभी की तो मति मारी गई है! पहले ब्याह में देख ली थी इसकी बुद्धि मैंने, और अब तेरी शादी में भी वही अपनी कंजूसी का राग अलाप रही है।”

ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठी सावित्री देवी अपनी बेटी सिमरन को भड़का रही थीं। उनके स्वर में गुस्सा और व्यंग्य कूट-कूट कर भरा था। रसोई के दरवाजे की ओट में खड़ी उनकी बड़ी बहू, अंजलि के हाथों में चाय की ट्रे थी। सावित्री देवी के ये तीखे शब्द सीधे अंजलि के कानों में पड़े। उसने एक गहरी साँस ली, आँखों में आई नमी को पलकों के पीछे ही सोख लिया और चेहरे पर एक सहज मुस्कान ओढ़कर बाहर आ गई।

अंजलि पिछले पाँच सालों से इस घर की बहू थी। जब अंजलि की शादी सावित्री देवी के बेटे मयंक से हुई थी, तब अंजलि के पिता, जो कि एक साधारण रिटायर्ड बैंक कर्मचारी थे, ने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी से एक बहुत ही सादगी भरा, लेकिन सम्मानजनक विवाह किया था। अंजलि ने ही जिद करके शादी में होने वाले फिजूलखर्च, जैसे डीजे, विदेशी फूलों की सजावट और छप्पन भोग वाले कैटरिंग को रुकवा दिया था। उसने अपने पिता से कहा था कि वो पैसे उसके छोटे भाई की उच्च शिक्षा के लिए रख लें। मयंक को अंजलि की यह सादगी पसंद आई थी, लेकिन सावित्री देवी के अरमानों पर पानी फिर गया था। वे अपने रिश्तेदारों के बीच शान नहीं बघार पाई थीं। तब से लेकर आज तक, सावित्री देवी अंजलि को ‘कंजूस’ और ‘कम अक्ल’ ही मानती थीं।

अब घर में सिमरन की शादी की तैयारियां चल रही थीं। सिमरन का रिश्ता शहर के एक बहुत ही अमीर और रसूखदार परिवार में तय हुआ था। लड़के वाले हालांकि बहुत सुलझे हुए थे और उन्होंने किसी भी तरह की दहेज की मांग नहीं की थी, लेकिन सावित्री देवी को लगता था कि अगर वे अपनी हैसियत से बढ़कर दिखावा नहीं करेंगी, तो लड़के वालों की नजरों में उनकी इज्जत कम हो जाएगी।

शादी के लिए सावित्री देवी ने शहर का सबसे महंगा ‘रॉयल पैलेस’ बुक करने की ठान ली थी। इसके अलावा उन्होंने एक बड़े इवेंट मैनेजमेंट वाले को लाखों का ठेका देने का मन बना लिया था। जब यह बात अंजलि को पता चली, तो उसने बहुत ही अदब से अपनी सास को समझाने की कोशिश की।

“माँ जी, मैंने उस पैलेस का बजट देखा है। सिर्फ जगह और सजावट के ही पंद्रह लाख रुपये लग रहे हैं। खाने का खर्च अलग। सिमरन के ससुराल वाले बहुत सीधे लोग हैं, उन्हें इस दिखावे से कोई मतलब नहीं है। क्यों न हम शहर का वो नया ‘आशीर्वाद कम्युनिटी हॉल’ बुक कर लें? वह वातानुकूलित है, बहुत सुंदर है और सिर्फ तीन लाख में पूरी सजावट के साथ मिल जाएगा। बाकी बचे हुए बारह लाख रुपये हम सिमरन के नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर देंगे। नई गृहस्थी है, कल को उसे कोई नया बिज़नेस शुरू करना हो या घर लेना हो, तो यह पैसा उसके काम आएगा। चार घंटे की सजावट तो अगले दिन कचरे में चली जाएगी माँ जी।”

अंजलि की यह बात सुनते ही सावित्री देवी आगबबूला हो गई थीं। उन्होंने अंजलि को खूब खरी-खोटी सुनाई और उसी बात को लेकर आज वे अपनी बेटी सिमरन के सामने अंजलि की निंदा कर रही थीं।

अंजलि ने चुपचाप चाय की ट्रे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। सिमरन, जो अंजलि का बहुत सम्मान करती थी, ने अपनी माँ से कहा, “माँ, भाभी गलत नहीं कह रही हैं। मुझे भी वो पैलेस बहुत ज्यादा खर्चीला लग रहा है। और वैसे भी, राहुल (सिमरन का मंगेतर) और उनके पिताजी को सादगी ही पसंद है। भाभी जो कह रही हैं, उसमें मेरा भविष्य सुरक्षित है।”

जब बेटे मयंक ने भी अंजलि और सिमरन का साथ दिया, तो सावित्री देवी को भारी मन से झुकना पड़ा। कम्युनिटी हॉल बुक हो गया। लेकिन सावित्री देवी ने पूरे मोहल्ले और रिश्तेदारों में यह ढिंढोरा पीट दिया कि “मेरी बहू तो मेरे घर की नाक कटवाने पर तुली है। ना जाने कैसे दरिद्रों के घर से आई है, हर जगह बस पैसा बचाने की सोचती है।”

अंजलि ने इन तानों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने शादी की बागडोर अपने हाथों में ले ली। इवेंट मैनेजर की जगह उसने शहर के सबसे पुराने और मशहूर हलवाई ‘दीनदयाल जी’ को खाने का ठेका दिया। विदेशी फूलों की जगह उसने गेंदे, गुलाब और मोगरे के ताजे फूलों से हॉल को सजाने का काम स्थानीय कारीगरों को सौंपा। वह दिन-रात एक करके हर छोटी-बड़ी चीज का बारीकी से ध्यान रख रही थी।

आखिरकार, वह दिन आ ही गया। शादी की शाम थी। लेकिन मौसम ने अचानक करवट बदल ली। जो आसमान सुबह तक साफ था, शाम होते-होते उसमें काले घने बादल छा गए। और फिर अचानक तेज आंधी के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। यह बेमौसम की बारिश इतनी भयंकर थी कि पूरे शहर में हाहाकार मच गया।

सावित्री देवी के हाथ-पैर फूल गए। “हे भगवान! अब क्या होगा? मेरी बच्ची की शादी में यह कैसा अपशगुन हो गया? बारात कैसे आएगी? और अगर आ भी गई तो इंतजाम का क्या होगा?” वे सिर पकड़ कर बैठ गईं।

लेकिन अंजलि बिल्कुल शांत थी। उसने जो कम्युनिटी हॉल चुना था, वह पूरी तरह से बंद और वाटरप्रूफ था। आंधी-तूफान का अंदर कोई असर नहीं हो रहा था। जनरेटर की पक्की व्यवस्था थी, इसलिए बिजली भी नहीं गई। गेंदे और मोगरे की मनमोहक खुशबू से पूरा हॉल महक रहा था। अंजलि ने तुरंत हलवाइयों को निर्देश दिया कि वे गर्मागर्म पकौड़े, अदरक वाली कड़क चाय और केसरिया दूध तैयार रखें।

रात के नौ बजे, बारात भीगते-भागते हॉल के दरवाजे पर पहुँची। लड़के वाले बहुत घबराए हुए थे। शहर के कई खुले मैरिज गार्डन और पैलेस इस तूफान में तहस-नहस हो चुके थे। कई शादियों में टेंट उड़ गए थे और खाना पानी में बह गया था। राहुल के पिता, जो खुद बहुत तनाव में थे, जैसे ही हॉल के अंदर दाखिल हुए, उन्हें एक अलग ही दुनिया नजर आई।

अंदर सब कुछ सुरक्षित, व्यवस्थित और बेहद सुंदर था। बारिश की ठंड से ठिठुरते बारातियों का स्वागत जब गर्मागर्म चाय, केसरिया दूध और ताजे स्नैक्स से हुआ, तो उनके चेहरों पर जो सुकून था, वह देखने लायक था।

राहुल के दादाजी, जो गाँव के रहने वाले थे, जब खाने के स्टॉल पर गए तो वहाँ दीनदयाल हलवाई के बनाए हुए शुद्ध देसी घी के मालपुए, बेड़मी पूरी, कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी और कुल्हड़ वाली रबड़ी देखकर गदगद हो गए। उन्होंने सावित्री देवी को पास बुलाकर कहा, “समधिन जी, आज-कल लोग पाँच सितारा होटलों में पास्ता और पिज़्ज़ा परोस कर शान दिखाते हैं, जिसमें न स्वाद होता है न आत्मा। लेकिन आपकी बेटी की शादी का यह शुद्ध और पारंपरिक खाना खाकर मेरी तो आत्मा तृप्त हो गई। और सबसे बड़ी बात, जिस तरह के तूफान से हम बचकर आए हैं, हमने रास्ते में देखा कि बड़े-बड़े पैलेस पानी में डूब गए हैं। आपकी दूरदर्शिता की दाद देनी पड़ेगी जो आपने यह सुरक्षित हॉल चुना। वरना आज तो हमारे बच्चों का खास दिन बर्बाद ही हो जाता।”

सावित्री देवी स्तब्ध रह गईं। उनके दिमाग में वो पल कौंध गया जब वे इस हॉल को चुनने पर अंजलि को गालियां दे रही थीं। उन्हें याद आया कि अगर उन्होंने अपनी जिद पर अड़कर वो खुला पैलेस बुक किया होता, तो आज बारिश में सब कुछ बह चुका होता। लाखों रुपये भी बर्बाद होते और बेइज्जती जो होती वो अलग।

विदाई का समय आया। सिमरन रोते हुए अपनी माँ के गले लग रही थी। तभी अंजलि आगे आई और उसने सिमरन के हाथों में एक फाइल थमा दी।

“यह क्या है भाभी?” सिमरन ने सुबकते हुए पूछा।

अंजलि ने प्यार से सिमरन के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “ये तेरे पैलेस और विदेशी फूलों वाले इवेंट मैनेजर के बचे हुए बारह लाख रुपये की फिक्स डिपॉजिट की रसीद है। मैंने और तेरे भैया ने इसे तेरे नाम पर करवा दिया है। जब राहुल अपना नया क्लिनिक खोलेगा, तो यह पैसा तुम दोनों के काम आएगा। यह तेरा हक है सिमरन, इसे सहेज कर रखना।”

यह सुनकर वहाँ खड़े राहुल और उसके माता-पिता भी भावुक हो गए। राहुल के पिता ने हाथ जोड़कर सावित्री देवी से कहा, “बहन जी, हमें तो बस सिमरन चाहिए थी, लेकिन हमें नहीं पता था कि सिमरन के रूप में हमें ऐसे परिवार की बेटी मिल रही है जहाँ रिश्ते और भविष्य को दिखावे से ऊपर रखा जाता है। आपकी बड़ी बहू ने आज साबित कर दिया कि असली लक्ष्मी वो नहीं जो तिजोरी में बंद रहे, बल्कि वो है जो घर को अपनी सूझबूझ से चलाए।”

सावित्री देवी अब अपने आँसुओं को नहीं रोक पाईं। उनका अहंकार, उनका झूठा गुरूर, सब उस बारिश के पानी के साथ धुल गया था। विदाई के बाद, जब घर के लोग वापस लौटे, तो सावित्री देवी सीधे अंजलि के कमरे में गईं।

अंजलि दिन भर की थकान के बाद बिस्तर पर बैठ कर अपने पैर दबा रही थी। सावित्री देवी ने जाकर अंजलि के हाथ पकड़ लिए।

“माँ जी? क्या हुआ? आप रो क्यों रही हैं?” अंजलि घबरा कर उठी।

सावित्री देवी ने अंजलि को कसकर गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगीं। “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैं सच में अंधी हो गई थी। दुनिया के दिखावे में मुझे अपनी घर की असली हीरा नजर ही नहीं आई। तूने मेरी मति मारी हुई कहा, पर असल में तो मेरी ही मति मारी गई थी। मैंने तुझे कंजूस कहा, पर तूने तो अपने प्यार और अपनी सूझबूझ से आज मेरी इज्जत, मेरी बेटी का भविष्य और इस घर की खुशियां सब कुछ बचा लिया। अगर आज तूने अपनी जिद न पकड़ी होती, तो मैं अपनी बेटी का घर बसाने से पहले ही उसका सब कुछ लुटा चुकी होती।”

अंजलि ने मुस्कुराते हुए सावित्री देवी के आँसू पोंछे और कहा, “माँ जी, आप मेरी माँ हैं। माँ की किसी बात का बुरा थोड़े ही माना जाता है। और सिमरन मेरी भी तो बहन है, मैं उसके लिए बुरा कैसे सोच सकती थी?”

उस रात सावित्री देवी को एक बहुत बड़ी सीख मिली थी। उन्हें समझ आ गया था कि समाज के चार लोग जो शादियों में आकर नुक्स निकालते हैं, वो कभी किसी के बुरे वक्त में काम नहीं आते। काम आती है तो बस परिवार की एकता, सूझबूझ और वो बचत जो बुरे वक्त में ढाल बन जाती है। उस दिन के बाद से, सावित्री देवी ने घर का कोई भी बड़ा फैसला अंजलि की सलाह के बिना नहीं लिया। अंजलि अब उनके लिए सिर्फ बहू नहीं, बल्कि उस घर की सबसे मजबूत नींव बन चुकी थी।

एक सवाल आप सभी से: क्या आपको भी लगता है कि शादियों में दिखावे के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने के बजाय, वह पैसा नए जोड़े के भविष्य को सुरक्षित करने में लगाना ज्यादा बेहतर है? आपके विचार क्या हैं?अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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