जब आज़ादी की चाहत में एक नई बहू ने भरे-पूरे परिवार को ‘नौकरानी’ बनने का ताना देकर छोड़ दिया, तो क्या अकेलेपन की उन चार दीवारों ने उसे वो सुकून दिया जिसकी उसे तलाश थी? पढ़िए, कैसे एक जेठानी के मौन और समर्पण ने देवरानी को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया।
स्वाति की आँखें गुस्से से लाल हो गई थीं। उसने काव्या की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “दीदी, मेरे पापा ने इस घर में मेरी शादी आप सब की नौकरानी बनने के लिए नहीं की है। सुबह से शाम तक बस ‘स्वाति यह कर दो, स्वाति वो कर दो’। मेरी अपनी भी कोई जिंदगी है या नहीं? मैं यहाँ अपनी मर्जी से एक कप चाय भी नहीं पी सकती।
और न ही मैं इतने बड़े परिवार के इस शोर-शराबे में रह सकती हूँ। मेरी घुटन हो रही है यहाँ। चिराग, हम तो अगले महीने ही किराये के घर में चले जाएंगे। मुझे यह जॉइंट फैमिली का ड्रामा और नहीं सहना!
लखनऊ के पुराने गोमती नगर इलाके में स्थित ‘मिश्रा निवास’ में सुबह की शुरुआत अलार्म की आवाज़ से नहीं, बल्कि पूजा घर की घंटी और रसोई से आती चाय की सोंधी महक से होती थी। इस विशाल घर में तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थीं। घर की बड़ी बहू, काव्या, पिछले आठ सालों से इस परिवार की धुरी बनी हुई थी
सुबह पाँच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक, काव्या के कदम मशीन की तरह चलते थे। ससुर जी की बिना शक्कर की चाय, सासू माँ की दवाइयां, देवर-देवरानी का नाश्ता और पति का टिफिन—सब कुछ काव्या की उंगलियों के पोरों पर रटा हुआ था।
घर में नई-नई शादी करके आई थी छोटी बहू, स्वाति। स्वाति एक आधुनिक विचारों वाली, इकलौती संतान थी, जिसने अपने मायके में कभी रसोई का रास्ता भी ठीक से नहीं देखा था। उसका पति, चिराग, एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। स्वाति को लगा था कि शादी के बाद जीवन फिल्मों जैसा होगा—वीकेंड पर घूमना, बाहर खाना और अपनी मर्जी की जिंदगी जीना। लेकिन मिश्रा निवास की सच्चाई उसकी कल्पनाओं से बिल्कुल अलग थी। यहाँ हर दिन कोई न कोई मेहमान आ टपकता था, त्योहारों पर पकवानों की लंबी लिस्ट बनती थी, और सुबह आठ बजे तक सोए रहना किसी अपराध से कम नहीं माना जाता था।
शुरुआत के कुछ दिन तो स्वाति ने जैसे-तैसे निकाल लिए, लेकिन धीरे-धीरे उसके सब्र का बांध टूटने लगा। उसे लगने लगा कि वह इस घर में सिर्फ एक ‘काम करने वाली मशीन’ बनकर रह गई है। अगर काव्या उसे प्याज काटने या रोटियां सेंकने के लिए भी कहती, तो स्वाति का मुंह बन जाता। उसे काव्या से भी चिढ़ होने लगी थी। उसे लगता कि काव्या खुद तो दिन भर खटती है और उसे भी उसी सांचे में ढालना चाहती है।
दिवाली का समय करीब था। घर में रंग-रोगन और साफ-सफाई का काम चल रहा था। साथ ही दूर के कुछ रिश्तेदार भी त्योहार मनाने के लिए घर आ गए थे। रसोई में बर्तनों का अंबार लगा था और काव्या अकेली पसीने से लथपथ होकर सबके लिए पूड़ियां तल रही थी। सासू माँ ने बाहर दालान से आवाज़ लगाई, “अरे स्वाति बहू! जरा जल्दी से मेहमानों के लिए नमकीन और चाय तो ले आ। काव्या अकेली कितना करेगी?”
स्वाति, जो अभी-अभी अपने कमरे से तैयार होकर निकली थी और चिराग के साथ फिल्म देखने जाने वाली थी, यह सुनकर ठिठक गई। उसके माथे पर गुस्से की लकीरें उभर आईं। वह भारी कदमों से रसोई में गई। काव्या ने मुस्कुराते हुए एक ट्रे में चाय के कप और प्लेटें सजाकर उसकी तरफ बढ़ाईं।
“थोड़ा ध्यान से ले जाना स्वाति, चाय बहुत गरम है,” काव्या ने स्नेह से कहा।
लेकिन स्वाति के अंदर पिछले कई महीनों का गुबार भरा हुआ था। उसने ट्रे को हाथ लगाने के बजाय उसे जोर से स्लैब पर धकेल दिया। चाय के दो कप छलक कर गिर गए और रसोई में सन्नाटा छा गया। बाहर से सासू माँ और चिराग भी आवाज़ सुनकर अंदर आ गए।
“यह क्या बदतमीजी है स्वाति?” चिराग ने डांटते हुए कहा।
स्वाति की आँखें गुस्से से लाल हो गई थीं। उसने काव्या की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, “दीदी, मेरे पापा ने इस घर में मेरी शादी आप सब की नौकरानी बनने के लिए नहीं की है। सुबह से शाम तक बस ‘स्वाति यह कर दो, स्वाति वो कर दो’। मेरी अपनी भी कोई जिंदगी है या नहीं? मैं यहाँ अपनी मर्जी से एक कप चाय भी नहीं पी सकती। और न ही मैं इतने बड़े परिवार के इस शोर-शराबे में रह सकती हूँ। मेरी घुटन हो रही है यहाँ। चिराग, हम तो अगले महीने ही किराये के घर में चले जाएंगे। मुझे यह जॉइंट फैमिली का ड्रामा और नहीं सहना!”
स्वाति के इन शब्दों ने जैसे पूरे घर को बर्फ में जमा दिया। सासू माँ अपनी छाती पकड़ कर वहीं कुर्सी पर बैठ गईं। चिराग शर्मिंदगी और गुस्से से कांपने लगा। उसने स्वाति पर हाथ उठाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि काव्या ने बीच में आकर चिराग का हाथ पकड़ लिया।
“रुक जाओ चिराग!” काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी।
उसने स्वाति की आँखों में देखा। न कोई गुस्सा, न कोई ताना। उसने शांति से स्लैब पर गिरी हुई चाय साफ की और सासू माँ की तरफ मुड़कर बोली, “माँ जी, स्वाति सही कह रही है। आजकल के बच्चों को अपनी स्पेस (जगह) चाहिए होती है। अगर इन्हें लगता है कि अलग रहकर ये ज्यादा खुश रह सकते हैं, तो इन्हें जाने दीजिये। जबर्दस्ती बांध कर रखने से रिश्ते टूट जाते हैं, और मैं नहीं चाहती कि हमारे घर की शांति भंग हो।”
स्वाति को लगा था कि इस बात पर भारी हंगामा होगा, उसे खरी-खोटी सुनाई जाएगी, लेकिन काव्या की इस शांति ने उसे थोड़ा हैरान जरूर किया। फिर भी, उसका अहंकार इतना बड़ा था कि उसने इसे अपनी जीत समझा। अगले ही महीने, चिराग और स्वाति अपना सामान समेट कर घर से दस किलोमीटर दूर एक आलीशान 2BHK फ्लैट में शिफ्ट हो गए।
शुरुआती कुछ महीने स्वाति के लिए किसी जन्नत से कम नहीं थे। कोई सुबह उठाने वाला नहीं था, कोई मेहमानों की झिकझिक नहीं थी, और सबसे बड़ी बात—कोई रसोई में काम करने का ताना देने वाला नहीं था। दोनों पति-पत्नी ऑनलाइन खाना मंगाते, वीकेंड पर लेट तक सोते और अपनी मर्जी की जिंदगी जीते। स्वाति अपनी सहेलियों को फोन करके अपनी इस ‘आज़ादी’ की खूब डींगें हांकती थी। उसे लगने लगा था कि उसने दुनिया का सबसे सही फैसला लिया है।
लेकिन जिंदगी हमेशा एक सी नहीं रहती। समय का पहिया घूमा और सर्दियाँ आते-आते चिराग की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। शुरुआत में लगा कि साधारण वायरल है, लेकिन जब तीन दिन तक बुखार नहीं उतरा और चिराग बेहोशी की हालत में पहुँच गया, तो स्वाति घबरा गई। रात के दो बज रहे थे। उसने एम्बुलेंस बुलाई और चिराग को लेकर एक प्राइवेट अस्पताल भागी।
डॉक्टरों ने बताया कि चिराग को गंभीर डेंगू हुआ है और प्लेटलेट्स बहुत तेजी से गिर रहे हैं। उसे तुरंत आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। स्वाति अस्पताल के उस ठंडे कॉरिडोर में अकेली खड़ी कांप रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसके अपने माता-पिता तीर्थयात्रा पर गए हुए थे और उनका फोन नहीं लग रहा था। स्वाति ने चिराग के ऑफिस वालों को फोन किया, लेकिन रात के समय कोई मदद नहीं मिल पाई।
अगले तीन दिन स्वाति के लिए किसी भयानक सपने जैसे थे। उसे अकेले अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते, दवाइयां लानी पड़तीं, और जब वह थक-हार कर फ्लैट पर आती, तो वहां का सन्नाटा उसे खाने को दौड़ता। फ्रिज खाली पड़ा था। उसे खुद अपने लिए मैगी बनाने तक की हिम्मत नहीं होती थी। नींद की कमी और डर से स्वाति की आँखें सूज गई थीं। एक दिन जब अस्पताल के बिल काउंटर पर उसे पचास हजार रुपये तुरंत जमा करने को कहा गया, तो स्वाति का कार्ड डिक्लाइन हो गया। वह वहीं फर्श पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी।
तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। स्वाति ने आंसू भरी आँखों से ऊपर देखा। सामने काव्या खड़ी थी, और उसके पीछे बड़े भैया (काव्या के पति) कैश काउंटर पर पैसे जमा कर रहे थे। काव्या के हाथ में एक बड़ा सा टिफिन और थर्मस था।
“दीदी… आप?” स्वाति के मुंह से बस इतना ही निकला।
काव्या ने उसे उठाया और पास की बेंच पर बैठाया। उसने थर्मस से गरम चाय निकाली और स्वाति के हाथों में थमा दी। “पी ले। तीन दिन से ठीक से कुछ खाया-पीया नहीं होगा तूने। चेहरा देख अपना, कैसा पीला पड़ गया है।”
स्वाति चाय का कप पकड़े हुए सुबकने लगी। “आपको कैसे पता चला?”
“तेरी पड़ोसन का फोन आया था मेरी सास के पास। पागल लड़की, इतनी बड़ी बात हो गई और तूने घर में एक फोन करना भी जरूरी नहीं समझा? क्या हम इतने पराए हो गए थे?” काव्या की आवाज़ में एक हल्की सी डांट थी, लेकिन उसमें प्यार कूट-कूट कर भरा था।
उस दिन के बाद काव्या ने अस्पताल की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह सुबह घर का सारा काम निपटा कर अस्पताल आ जाती। स्वाति को जबरदस्ती घर भेजकर सोने को कहती। बड़े भैया ने चिराग के ब्लड डोनर्स का इंतजाम किया और अस्पताल का सारा बिल भरा। चिराग को जब होश आया, तो उसने अपने सिरहाने अपनी भाभी को देखकर राहत की सांस ली।
एक हफ्ते बाद चिराग को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। बड़े भैया ने गाड़ी अस्पताल के गेट पर लगाई। स्वाति और चिराग चुपचाप पिछली सीट पर बैठ गए। गाड़ी जब चलने लगी, तो स्वाति ने देखा कि गाड़ी उनके फ्लैट की तरफ नहीं, बल्कि गोमती नगर वाले ‘मिश्रा निवास’ की तरफ जा रही है।
“भैया, हमारा फ्लैट तो पीछे छूट गया,” चिराग ने धीरे से कहा।
बड़े भैया ने गाड़ी चलाते हुए जवाब दिया, “डॉक्टर ने तुझे पंद्रह दिन पूर्ण विश्राम के लिए कहा है। स्वाति अकेली तेरी देखभाल कैसे करेगी? उसका भी ऑफिस होता है। घर चल, वहां माँ जी हैं, काव्या है। सब मिलकर काम बांट लेंगे तो पता भी नहीं चलेगा कि तू कब ठीक हो गया।”
स्वाति कुछ नहीं बोली। उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। आज उसे उन चार दीवारों का सन्नाटा और अपनी ‘आज़ादी’ दोनों ही बेमानी लग रहे थे।
जब वे मिश्रा निवास पहुँचे, तो सासू माँ दरवाजे पर आरती की थाली लिए खड़ी थीं। उन्होंने चिराग की नजर उतारी और स्वाति के सिर पर प्यार से हाथ फेरा। “मेरी बच्ची, कितनी सूख गई है तू इस एक हफ्ते में। जा, कमरे में जाकर आराम कर, मैं तेरे लिए गरमागरम खिचड़ी भिजवाती हूँ।”
स्वाति अपने कमरे में गई। कमरा बिल्कुल वैसा ही साफ-सुथरा था जैसा वो छोड़कर गई थी। बिस्तर पर नई चादर बिछी थी और मेज पर ताजे फूल रखे थे। थोड़ी देर बाद काव्या खिचड़ी का कटोरा लेकर आई। उसने कटोरा मेज पर रखा और जाने के लिए मुड़ी।
तभी स्वाति दौड़कर आई और काव्या के पैरों में गिर पड़ी।
“दीदी! मुझे माफ़ कर दीजिये दीदी! मैं बहुत बड़ी मूर्ख थी।” स्वाति फूट-फूट कर रो रही थी।
काव्या ने घबराकर उसे उठाया और सीने से लगा लिया। “अरे पगली, यह क्या कर रही है? देवरानियां बेटियां होती हैं, और बेटियां कभी माँ के पैरों में नहीं गिरतीं।”
“नहीं दीदी, मैंने आपका बहुत अपमान किया है,” स्वाति हिचकियाँ लेते हुए बोली। “मैंने आपको नौकरानी कहा, इस घर के लोगों को बोझ समझा। मुझे लगता था कि परिवार सिर्फ काम का बोझ देता है। लेकिन आज मुझे समझ आ गया कि परिवार वो छाता है जो धूप और बारिश में सबसे पहले आपके ऊपर तन जाता है। अकेलेपन की उन दीवारों ने मुझे कोई सुकून नहीं दिया दीदी। जब चिराग अस्पताल में था, तब मुझे पता चला कि उस रसोई में आप सिर्फ हमारे लिए पूड़ियां नहीं तलती थीं, आप हम सबको एक धागे में पिरो कर रखती थीं। मैं आपकी अहमियत नहीं समझ पाई।”
काव्या की आँखों में भी आंसू आ गए। उसने स्वाति का माथा चूमा। “स्वाति, जब पेड़ से कोई पत्ता टूटकर अलग होता है, तो उसे लगता है कि वह हवा में उड़ रहा है, आज़ाद है। लेकिन उसे यह नहीं पता होता कि पेड़ से कटकर वह कुछ ही दिनों में सूख जाएगा। परिवार भी उस पेड़ की तरह होता है। यहाँ खटपट होती है, काम का बोझ भी होता है, शिकायतें भी होती हैं… लेकिन जब मुसीबत आती है, तो यही परिवार ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। तूने कोई गुनाह नहीं किया था, बस तुझे दुनिया की समझ नहीं थी।”
उस दिन स्वाति ने तय कर लिया कि वह अब वापस उस किराये के फ्लैट में कभी नहीं जाएगी। उसने अपना सारा सामान वापस मंगवा लिया। चिराग जब पूरी तरह से ठीक हो गया, तो स्वाति ने खुद सुबह पाँच बजे उठकर काव्या के साथ रसोई की जिम्मेदारी संभाल ली। अब उसे प्याज काटने में या रोटियां बेलने में कोई ‘नौकरानी’ होने का एहसास नहीं होता था। उसे एहसास होता था कि वह इस घर की एक मजबूत नींव बन रही है।
मिश्रा निवास में अब अलार्म की आवाज़ नहीं बजती थी, बल्कि दो देवरानी-जेठानी की खिलखिलाहट से पूरा घर गूंजता था। स्वाति ने जान लिया था कि असली आज़ादी अकेलेपन में नहीं, बल्कि अपनों के बीच रहकर उनके सुख-दुख का हिस्सा बनने में है।
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश