“फर्ज़ की चौखट” – मुकेश पटेल

समाज कहता है कि शादी के बाद बेटी ‘पराया धन’ हो जाती है, लेकिन जब उस ‘पराये धन’ के अपने ही माता-पिता बेसहारा हो जाएं, तो क्या एक बेटी को रिवाजों के नाम पर अपना फर्ज़ भूल जाना चाहिए? पढ़िए एक इकलौती बेटी की कहानी, जिसने समाज की दोहरी मानसिकता को आईना दिखाते हुए अपने मायके और ससुराल, दोनों के मायने बदल दिए।

सुबह के आठ बज रहे थे। घर में नाश्ते की खुशबू के बजाय आज फिनाइल और दवाओं की महक तैर रही थी। सोनल अपने हाथों से गेस्ट रूम का कोना-कोना साफ कर रही थी। उसने एक नया मेडिकल बेड मंगवाया था जो अभी-अभी कमरे में लगाया गया था। पास ही ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर और कुछ जरूरी मशीनें रखी थीं।

ड्राइंग रूम में बैठी उसकी सास, शांति देवी, सुबह से ही भुनभुना रही थीं। उनके चेहरे पर असंतोष की लकीरें साफ नजर आ रही थीं। सोनल के पति, विवेक, चुपचाप अखबार के पीछे अपना चेहरा छिपाए बैठे थे, क्योंकि वह जानते थे कि घर में जल्द ही एक बड़ा तूफान आने वाला है।

तभी शांति देवी से रहा नहीं गया। वह गेस्ट रूम के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं और तीखे स्वर में बोलीं, “सोनल, यह सब क्या तमाशा चल रहा है मेरे घर में? यह अस्पताल का पलंग, यह दवाइयों का अंबार… तुमने तो मेरे हँसते-खेलते घर को वार्ड बना दिया है!”

सोनल ने पोछा किनारे रखा और बहुत ही शांत स्वर में कहा, “माँ जी, मैंने आपको कल ही बताया था ना। पापा को कल अस्पताल से छुट्टी मिल रही है। पैरालाइसिस के अटैक के बाद उनके शरीर का दाहिना हिस्सा काम नहीं कर रहा है। डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें चौबीस घंटे देखभाल की जरूरत है। इसलिए मैं उन्हें यहाँ ला रही हूँ।”

शांति देवी का चेहरा तमतमा गया। “यहाँ ला रही हो? मतलब एक ससुर अपने दामाद के घर की रोटियां तोड़ेगा? अरे, हमारे समाज में बेटी के घर का पानी पीना भी पाप माना जाता है, और तुम अपने अपाहिज बाप को यहाँ लाकर बिठाना चाहती हो? लोग क्या कहेंगे कि शांति देवी के घर में उनके समधी पल रहे हैं? और देखभाल करनी है तो कोई नर्स रख दो, उन्हें उनके घर में रहने दो। यह ससुराल है तुम्हारा, कोई धर्मशाला नहीं!”

सोनल की आँखें भर आईं, लेकिन उसने अपने आँसुओं को पलकों के पीछे ही रोक लिया। उसने एक गहरी साँस ली और अपनी सास की आँखों में सीधे देखते हुए कहा:

“माँ जी, मेरा भाई नहीं है, ये तो आप शादी से पहले ही जानती थीं। तो फिर मेरे माँ-बाप के बुढ़ापे का सहारा मैं ही तो बनूँगी। जब आपने विवेक के लिए मेरा रिश्ता तय किया था, तब क्या आपको नहीं पता था कि मैं इकलौती संतान हूँ? शादी में जब मेरे पिता ने अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर आपकी हर मांग पूरी की थी, तब तो समाज ने यह नहीं कहा कि ‘बेटी के बाप का पैसा लेना पाप है।’ तब वह पैसा सम्मान था, और आज जब उन्हें मेरी जरूरत है, तो वह पाप कैसे हो गया?”

शांति देवी सोनल के इस बेबाक जवाब से अवाक रह गईं।

सोनल ने अपनी बात जारी रखी, “माँ दो साल पहले ही गुजर गईं। पापा उस खाली घर में बिल्कुल अकेले हैं। वो खुद से एक गिलास पानी तक नहीं पी सकते। नर्स सिर्फ ड्यूटी करती है, अपनापन नहीं देती। मैं उनकी बेटी हूँ, मेरा खून है उनमें। अगर आज मैं उनके काम नहीं आई, तो धिक्कार है मेरी ऐसी जिंदगी पर। और आप चिंता मत कीजिए माँ जी, उनके इलाज और खाने-पीने का सारा खर्च मैं अपनी सैलरी से उठाऊँगी, आपके बेटे की कमाई पर कोई बोझ नहीं आएगा।”

शांति देवी पैर पटकते हुए वहाँ से चली गईं। विवेक ने पास आकर सोनल के कंधे पर हाथ रखा। वह सोनल के फैसले के साथ था, लेकिन अपनी माँ के स्वभाव के आगे मजबूर था।

अगले दिन सोनल के पिता, श्रीकांत जी, घर आ गए। व्हीलचेयर पर बैठे श्रीकांत जी की आँखों में एक अजीब सी शर्मिंदगी और अपराधबोध था। जो पिता कभी अपनी बेटी के घर का पानी तक नहीं पीता था, आज उसी बेटी के घर में बेबस पड़ा था। उन्हें लगता था कि वे अपनी बेटी की गृहस्थी पर एक बोझ बन गए हैं।

सोनल की दिनचर्या अब मशीन जैसी हो गई थी। सुबह पाँच बजे उठकर पिता की सफाई, उनकी दवाइयाँ, फिर पूरे घर का नाश्ता बनाना, ऑफिस जाना, और शाम को लौटकर फिर से पिता की फिजियोथेरेपी करवाना। शांति देवी दिन भर श्रीकांत जी को तिरस्कार भरी नजरों से देखतीं। अगर कभी श्रीकांत जी के कमरे से खांसने की आवाज भी आ जाती, तो शांति देवी पूरे घर में हंगामा कर देतीं कि “इस घर की तो शांति ही छिन गई है।”

श्रीकांत जी यह सब सुनते और चुपचाप आँसू बहाते। उन्होंने खाना-पीना बहुत कम कर दिया था। सोनल सब समझती थी, लेकिन वह खामोशी से अपना फर्ज निभाती रही।

करीब तीन महीने ऐसे ही बीत गए। एक दिन शांति देवी बाथरूम में नहाते समय बुरी तरह फिसल गईं। उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई। डॉक्टर ने कहा कि कम से कम दो महीने तक उन्हें पूर्ण रूप से बिस्तर पर आराम करना होगा।

विवेक उन दिनों अपनी कंपनी के एक बहुत जरूरी प्रोजेक्ट के लिए पंद्रह दिन के लिए विदेश दौरे पर गया हुआ था। शांति देवी की देखभाल का पूरा जिम्मा अब सोनल के कंधों पर आ गया।

दर्द से कराहती शांति देवी ने एक दिन अपनी विवाहित बेटी, नीता को फोन किया जो दूसरे शहर में रहती थी।

“नीता बेटा, मेरी रीढ़ की हड्डी खिसक गई है। मुझसे हिला भी नहीं जा रहा। तू कुछ दिनों के लिए यहाँ आ जा। मेरा मन बहुत घबरा रहा है।” शांति देवी ने रोते हुए कहा।

उधर से नीता की रुआंसी आवाज आई, “माँ, मैंने अपनी सास से पूछा था। लेकिन वो कह रही हैं कि ‘तू वहाँ जाकर क्या करेगी? तेरी भाभी तो है वहाँ। हमारा घर कौन संभालेगा? और वैसे भी ससुराल की बहू का मायके में ज्यादा दिन टिकना अच्छा नहीं लगता।’ माँ, मुझे माफ कर दो, वो मुझे नहीं आने देंगी।”

फोन कट गया। शांति देवी के हाथ से फोन छूटकर बिस्तर पर गिर पड़ा। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। जिस समाज और रिवाजों का हवाला देकर उन्होंने सोनल को ताने मारे थे, आज उसी समाज के रिवाजों ने उनकी अपनी बेटी को उनके पास आने से रोक दिया था।

तभी दरवाजे की आहट हुई। सोनल हाथ में गर्म सूप का बाउल और दर्द निवारक तेल लेकर कमरे में आई। उसने बिना कुछ कहे सूप का प्याला साइड टेबल पर रखा और शांति देवी के पैरों के पास बैठकर धीरे-धीरे तेल की मालिश करने लगी।

“सोनल, तुम थक गई होगी। सुबह से पापा को देखा, ऑफिस का काम किया, अब मेरे पैर दबा रही हो…” शांति देवी की आवाज कांप रही थी।

“कोई बात नहीं माँ जी, आप भी तो मेरी माँ समान ही हैं। दर्द में मालिश से थोड़ा आराम मिलेगा,” सोनल ने एक मीठी मुस्कान के साथ कहा।

शांति देवी की नजरें झुक गईं। उन्हें याद आया कि पिछले तीन महीनों में उन्होंने इस लड़की को कितने ताने दिए थे। लेकिन सोनल ने उनके बीमार होने पर एक बार भी शिकायत नहीं की। वह जितना ध्यान अपने पिता का रखती थी, उतना ही ध्यान अब अपनी सास का भी रख रही थी।

शांति देवी से रहा नहीं गया। उन्होंने सोनल का हाथ पकड़ लिया और फूट-फूट कर रोने लगीं।

“मुझे माफ कर दे बहू। मैं एक सास के अहंकार में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे एक बेटी का दर्द नजर ही नहीं आया। आज जब मेरी अपनी बेटी मेरे पास नहीं आ सकी, तब मुझे समझ आया कि बुढ़ापे में औलाद की कितनी जरूरत होती है। मैं कितनी गलत थी सोनल… जो बेटियां दो-दो परिवारों को जन्म देती हैं, संवारती हैं, उनके लिए यह समाज कैसे कह सकता है कि उनका अपने ही माता-पिता पर कोई हक नहीं? तूने मेरी आँखें खोल दीं।”

सोनल ने शांति देवी के आँसू पोंछे और उन्हें गले लगा लिया।

अगली सुबह, जब सोनल श्रीकांत जी के कमरे में उन्हें नाश्ता करवाने जा रही थी, तो उसने देखा कि शांति देवी व्हीलचेयर पर बैठकर खुद श्रीकांत जी के कमरे में आई हुई हैं।

“समधी जी,” शांति देवी ने हाथ जोड़कर कहा, “आपने अपनी बेटी को ऐसे संस्कार दिए हैं कि उसने मेरा यह घर स्वर्ग बना दिया। आज से यह घर जितना मेरा है, उतना ही आपका भी है। आप हमारे लिए बोझ नहीं, इस घर के सम्मानित सदस्य हैं। आप बिना किसी संकोच के यहाँ रहिए।”

श्रीकांत जी की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। जो बोझ उनके सीने पर पिछले तीन महीनों से रखा था, वह आज पिघल गया था। सोनल दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसके होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।

उस दिन के बाद त्रिपाठी सदन का माहौल पूरी तरह बदल गया। जो घर कभी पुरानी रूढ़िवादी सोच का शिकार था, आज वहां ममता, सम्मान और समानता की नई सुबह हो चुकी थी। सोनल ने साबित कर दिया था कि बेटियां कभी ‘पराया धन’ नहीं होतीं, वे तो वह अनमोल धरोहर होती हैं जो जहां जाती हैं, वहां अपना फर्ज और प्यार लुटाती हैं।

एक सवाल आप सभी के लिए: क्या शादी के बाद सच में एक बेटी का अपने माता-पिता पर हक खत्म हो जाना चाहिए? क्या समाज के ये नियम सिर्फ बेटियों के लिए ही क्यों हैं? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ जरूर साझा करें।


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लेखक : मुकेश पटेल 

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