*सबसे गहरा ज़ख्म अपने ही देते हैं* – प्रतिमा पाठक

“अरे कलमुही! क्या रोना-धोना लगा रखा है? रोज सुबह-सुबह शुरू हो जाती है। कुछ चाय-नाश्ता मिलेगा या तेरे आँसुओं से ही पेट भरना होगा?”

रमा की सास आशा देवी की कड़वी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। रमा चुपचाप आँसू पोंछकर रसोई में चली गई। शरीर से वह बेहद कमजोर हो चुकी थी। अभी एक सप्ताह पहले ही उसकी छह महीने की दुधमुंही बच्ची ‘खुशी’ तीन दिन के तेज़ बुखार में उसे छोड़कर चली गई थी।

रमा सदमे में थी। अमित ने किसी तरह खुद को संभालकर दफ्तर जाना शुरू कर दिया था, पर रमा का मन हर पल बेटी की याद में डूबा रहता। वह घर के सारे काम करती, पर आँसू थमते नहीं थे। यही बात आशा देवी और ननद रूही को खटकती। रूही अक्सर कह देती-“बेटी ही तो थी, दूसरी आ जाएगी।”

सभी काम निपटाकर रमा अपने कमरे में आई। टेबल पर रखी खुशी की तस्वीर को देखते ही उसका मन भर आया। कितने प्यार से नाम रखा था-खुशी। और वह सारी खुशियाँ समेटकर चली गई।

दो वर्ष पहले रमा की शादी अमित से हुई थी। अमित पढ़ा-लिखा, सभ्य और एक निजी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत था। परिवार में माता-पिता और एक बहन थी। रमा सुंदर, शिक्षित और संस्कारी थी। विवाह के बाद उसने पूरे मन से घर संभाल लिया। सब ठीक चल रहा था। जब वह गर्भवती हुई तो आशा देवी ने उसका खूब ध्यान रखा।

पर बेटी के जन्म के बाद माहौल बदल गया। आशा देवी और रूही उसे ताने देने लगीं-“बेटी ही हुई!” काम में कोई सहयोग नहीं, बच्ची की देखभाल भी अकेले रमा ही करती। फिर भी उसने कभी शिकायत नहीं की।

लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। खुशी को तेज़ ज्वर ने छीन लिया। बुखार में भी रमा घर के कामों में उलझी रही; वह हर पल बेटी के पास न रह सकी। अपनों के इस व्यवहार ने उसके मन में टीस भर दी।सच ही तो है, सबसे गहरे ज़ख्म अपने ही देते हैं। फिर भी उसे इस बात का संबल था कि अमित उसका साथ देता था।

समय बीतता गया। एक वर्ष बाद रमा ने फिर एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। नन्ही किलकारी से घर गूँज उठा। अमित ने भावुक होकर कहा-हमारी खुशी लौट आई है।

रमा ने बेटी को सीने से लगाया। इस बार उसकी आँखों में आँसू नहीं, दृढ़ता थी। उसने मन ही मन संकल्प लिया-यह बेटी सम्मान और प्रेम पाएगी। आशा देवी भी नन्ही बच्ची को देखकर पिघल गईं। शायद उन्हें अपने व्यवहार का आभास हो चुका था।रमा ने मन ही मन महसूस किया- हाँ, सबसे गहरे जख्म अपने ही देते हैं…पर जब वही अपने मरहम बन जाएँ, तो दर्द भी शक्ति में बदल जाता है और जीवन फिर मुस्कुरा उठता है।

✍🏻प्रतिमा पाठक

       दिल्ली

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