मेहरबान किस्मत – गीता वाधवानी

 सुभद्रा जी, वृद्धाश्रम में अपने साथ रहने वाली एक सहेली विमला  को वापस घर जाते देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि विमला की किस्मत कितनी अच्छी है पोती की समझदारी के कारण उन्हें अपना घर परिवार वापस मिल गया।

दरअसल विमला के पोते को पता चल गया था कि उसकी दादी जी कहीं गम नहीं हुई है बल्कि वह वृद्धाश्रम में रह रही है और उनको वृद्धाश्रम में भेजने के जिम्मेदार उसके माता-पिता है। उसने अपने माता-पिता से कहा कि दादी को वापस लाओ वरना मैं घर छोड़कर जा रहा हूं और आप उनसे माफी भी मांगो। 

 यह सब कुछ होने पर ही विमला के बेटा बहू उन्हें वापस लेने आए थे। सुभद्रा जी सोच रही थीं कि मेरी  ऐसी किस्मत कहाँ, और फिर अपनी बीमारी के कारण मैं खुद भी घर नहीं जाना चाहती। मेरी बीमारी कही ं बच्चों को न लग जाए। न जाने कैसी खांसी पीछे पड़ी है जिसने मेरा सांस लेना भी दुबार कर दिया है। टी बी भी नहीं है। न जाने क्या दिक्कत है समझ नहीं आ रहा। 

 विमला तो अपने घर चली गई। कुछ समय बाद एक वृद्ध व्यक्ति वृद्धाश्रम में रहने आया। सुभद्रा जी उसे दूर से देखती थीं तो उन्हें वह कुछ जाना पहचाना सा लगता था। 

 सुभद्रा जी ने एक दिन उसके पास जाकर बातचीत शुरू की। तब उन्होंने पहचाना कि यह तो उनका दोस्त शुभेंदु है। तब शुभेंदु  ने भी सुभद्रा जी को पहचान लिया। बढ़ती उम्र में नजर कमजोर हो ही जाती है। 

 दोनों मिलकर बहुत ही खुश हुए। 

 सुभद्रा ने हिचकिचाते हुए शुभेंदु से पूछा-” क्या तुम्हारे बच्चों ने तुम्हें यहां छोड़ा है? ” 

 शुभेंदु -” नहीं नहीं, सुभद्रा मेरे दोनों बच्चे बहुत लायक है, वे तो मुझे यहां आने ही नहीं दे रहे थे, पर मेरी पत्नी सुमित्रा के गुजर जाने के बाद मेरा कहीं पर भी मन नहीं लगता है, बहुत ज्यादा ध्यान रखती थी मेरा, तो मैं अकेलापन दूर करने के लिए और अपनी कंपनी पाने के लिए यहां आना ठीक समझा। मेरे बच्चे जब मुझ से मिलने आएंगे, तो मैं तुम्हें उनसे जरूर मिलवाऊंगा,पर तुम यहां कैसे? ”  

 सुभद्रा ने कहा-” मेरे पति के गुजर जाने के बाद मेरे बच्चों ने ही मुझे सहारा दिया। मैं अपनी खांसी के कारण यहां ही रहना चाहती हूं क्योंकि मुझे डर लगता है कि मेरी बीमारी मेरे पोते पोतियो को न लग जाए। ” 

     इसी तरह थोड़ा समय बीता। दोनों दोस्त खूब बातें करते, गप्पे  लड़ाते। कभी कुछ दूर सैर पर निकल जाते, एक साथ चाय पीते, एक साथ खाना खाते। दोनों का अकेलापन खत्म हो गया था। 

 एक दिन शुभेंदु ने कहा-” सुभद्रा, जब हम कॉलेज में पढ़ते थे, तब मैं तुमसे कुछ कहना चाहता था पर कह नहीं पाया था। ” 

 सुभद्रा ने कहा-” हां हां मैं जानती हूं, तुम्हें मुझसे प्यार हो गया था, क्यों है ना? ” 

 शुभेंदु-” अरे!तुम्हें पता था? ” 

 सुभद्रा-” हां, तुम्हारी आंखों में दिखता था। पर मैं क्या करती, पिताजी ने रिश्ता तय कर दिया था और फिर मेरा विवाह हो गया। फिर मैं बच्चों में व्यस्त हो गई और अब पोते पोतियो में। कभी-कभी पहले वाली बातें याद आती थी पर तुम इस तरह,इस जगह मिलोगे, यह कभी नहीं सोचा था। ” 

 इतना कहकर सुभद्रा हंसने लगी और साथ ही शुभेंदु भी हंसने लगे। हंसते-हंसते सुभद्रा को खांसी का ऐसा दौरा पड़ा कि शुभेंदु भी घबरा गए। सुभद्रा से ना बैठा जा रहा था, ना वह खड़ी हो पा रही थी और ना सांस ले पा रही थी। ना तो उसे पानी पिया जा रहा था और ना ही वह कुछ बोल पा रही थी। 

 उसकी ऐसी हालत देखकर शुभेंदु  बहुत घबरा गए। लगभग 1 घंटे बाद खांसी कुछ हल्की हुई। अगले ही दिन शुभेंदु ने अपने एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर को बुलवाया और सुभद्रा की पूरी जांच करवाई। डॉक्टर साहब ने सुभद्रा के सारे परीक्षण किया और एक हफ्ते बाद यह बताया कि सुभद्रा के फेफड़ों में संक्रमण है और हालात गंभीर है। दवाई लंबी चलेगी और बहुत देखभाल करनी पड़ेगी।  

 बहुत लंबे समय तक शुभेंदु ने सुभद्रा की देखभाल की। सुभद्रा के बेटे ने नर्स रखने के लिए कहा लेकिन शुभेंदु ने मना कर दिया। इस इलाज के दौरान दोनों के बच्चे मिलने के लिए आते रहते थे। 

 सुभद्रा बहुत हद तक ठीक हो चुकी थी। उसके ठीक हो जाने पर शुभेंदु ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया और सुभद्रा ने शर्माते हुए हां कर दी। 

 दोनों के विवाह में बच्चे भी शामिल हुए और दोनों विवाह के बाद वृद्धाश्रम से अपने घर चले गए, एक साथ नहीं शुरुआत करने के लिए। सुभद्रा घर जाते समय रास्ते में सोच रही थी कि मैं सोचती थी मेरी ऐसी किस्मत कहां, लेकिन मुझ पर तो किस्मत मेहरबान हो गई। 

 अ प्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली

#ऐसी किस्मत कहां

error: Content is protected !!